भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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कंपनियों को 'सुपरस्टेट' बना डाला है जो प्रकृति और मनुष्य दोनों के शोषण पर टिकी है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में - रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान से लेकर युद्ध के विकराल हथियार बनाने तक - इनकी घुसपैठ हैं। विश्व के पर्यावरण को, विभिन्न क्षेत्रों के उद्भूत संस्कृतियों को इन कंपनियों ने रोड़ रोलर की तरह रौंद डाला है।

यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने पश्चिम के देशों को अपने उपनिवेश बनाने में बड़ी मदद दी। इस उपनिवेशीकरण ने पश्चिम के देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तीसरी दुनिया के देशों में अपना व्यापार जाल फैलाने का भरपूर अवसर दिया। उपनिवेशी ताकतों की छत्र छाया में इन्होंने लातीनी अमरीका, अफ्रीका और एशिया के देशों से सस्ता कच्चा काल बटोरा और अपने मंहगे 'बने बनाए' माल से उनके बाजारों को पाट दिया। नतीजतन इन देशों की टिकाऊ अर्थव्यवस्था टूट गयी और सम्पन्न देश अविकसित देशों की श्रेणी में धकेल दिये गये। द्वितीय महायुद्ध के बाद उपनिवेशीकरण का जाल टूटा, पर विकास के नाम पर ये कंपनियाँ तीसरी दुनिया में अपनी घुसपैठ बनाए रहीं। उपनिवेशकाल में जो काम पुलिस-फौज के हथियार करते थे, उत्तर उपनिवेशकाल में वह काम विश्व बैंक और मुद्राकोष की सहायता से ऋण के हथियार द्वारा किया गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तीसरी दुनिया में निर्बाध रूप से अपने पाँव पसारने का कानूनी हक गैट के यूरूग्ने चक्र की समाप्ति पर बने विश्व व्यापार संगठन ने दे दिया जिसके तहत ये कंपनियाँ इन देशों से 'राष्ट्रीय व्यवहार' पाने की हकदार बन गयी हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तीसरी दुनिया के देशों की आर्थिक स्वायत्ता को नष्ट कर दिया है तथा व्यापक पैमाने पर गैर-बराबरी, और उपभोक्तावादी अपसंस्कृति फैलाई है। अब तो विकसित देश भी इनके कारण बेरोजगारी और उसके फलस्वरूप फैलते सामाजिक तनाव के शिकार हो रहे हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बढ़ता मकड़जाल न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में मानवीय संस्कृति और सभ्यता के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। इसलिए इनके खिलाफ चलने वाले इस अभियान में हम सभी एकजुट होकर आवाज उठायेंगे तो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा कर सकेंगे।

राजीव दीक्षित जी सेवाग्राम, वर्धा

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का इतिहास

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जड़े मध्यकाल में वेनिस, अंग्रेज, डच व फ्रांसीसी व्यापारियों द्वारा स्थापित कंपनियों में मिलती हैं। प्राचीन सभ्यता में भी व्यापारियों द्वारा दूसरे देश में जाकर व्यापार करने के उदाहरण मिलते हैं। देश की सीमाओं को लांघकर दूसरे देशों में व्यापार करने प्रमाण

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