स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविदेशी पूँजी का धोखा
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जब भी दुनिया के किसी देश में व्यापार करने के लिए जाती हैं तो वे उस देश के लिए भारी सिर दर्द बन जाती हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के किसी भी देश में काम करने से ऐसा नहीं है कि मात्र आर्थिक दुष्प्रभाव ही पड़ते हों अपितु उस देश में इन कंपनियों के व्यापक और गहरे प्रभाव नजर आते हैं। क्योंकि इन कंपनियों का चरित्र ही ऐसा है कि ये देश की नीतियाँ बदलवाने के लिए सीधे राजनैतिक हस्तक्षेप करती हैं। सामाजिक जीवन भी इन कंपनियों के प्रभाव से अछूता नहीं रहता है।
जब ये कंपनियाँ काम करने के लिए अन्य देशों में जाती हैं तो उनके पीछे कुछ मिथ्या धारणायें काम करती हैं जैसे ये अपने साथ पूँजी लायेगी, आधुनिक तकनीक देगी, लोगों के रोजगार के अवसर मुहैया करायेगी, देश का निर्यात बढ़ायेगी, देश के भुगतान संतुलन की स्थिति को चुस्त-दुरुस्त रखेगी, देश की आर्थिक संसाधनों में और अधिक वृद्धि करेगी आदि-आदि। लेकिन असलियत ठीक इन सभी दावों से उल्टी होती है।
विदेशी कंपनियों के पक्ष में सबसे बड़ी दलील दी जाती है कि भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश में पूँजी की बड़ी कमी होती है और पूँजी के अभाव में विकास नहीं हो सकता। इसलिए विदेशों से पूँजी आमन्त्रित करके इस कमी को पूरा किया जा सकता है और पिछड़ेपन के दुष्प्रक को तोड़ा जा सकता है।
लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। ये विदेशी कंपनियाँ बाहर से बहुत कम पूँजी लाती हैं, अधिकांश पूँजी यहां के बैंकों से कर्ज लेकर, यहाँ की जनता से कर्ज लेकर और उनको शेयर बेचकर एकत्रित करती हैं। देश में जितनी भी विदेशी कंपनियाँ कार्य कर रही हैं, वे औसतन 5 प्रतिशत तक पूँजी ही बाहर से लाती हैं। बाकी 90 प्रतिशत से लेकर 95 प्रतिशत तक पूँजी ये भारतीय स्रोतों से ही एकत्रित करती हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा पूँजी निवेश मात्र एक धोखा है। हिन्दुस्तान लीवर, कॉलगेट, सीबागाइगी जैसी सैकड़ों विदेशी कंपनियों ने मात्र कुछ लाख रुपये से भारत में व्यापार शुरू किया। लाभ कमा-कमा कर बोनस शेयर के रूप में इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी शेयर पूँजी करोड़ों रुपये में कर ली। अब ये कंपनियाँ रॉयल्टी, शुद्ध लाभ और टेक्नीकल फीस के रूप में अरबों रुपये भारत से बाहर ले जा रही हैं। इस बात की गंभीरता का अहसास इसी से हो जाता है कि 1967-77 में जहाँ भारत में कार्यरत विदेशी कंपनियाँ 121.54 करोड़ रुपये देश से बाहर ले गयीं, वहीं 1986-87 में यह राशि बढ़कर 494.6 करोड़ रुपये हो गयी। पिछले 11 वर्षों में ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वैधानिक रूप से 3244.15 करोड़ रुपये भारत से बाह ले जा चुकी हैं, जबकि अवैधानिक तरीके से ये कंपनियाँ इससे कई गुनी अधिक राशि देश से बाहर ले जा चुकी हैं। इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भारत में शेयर पूँजी लगभग 675 करोड़ रुपये मात्र है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ देश के खून-पीसने की कमाई विदेशी मुद्रा का निर्यात अपने मूल देशों को
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