भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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हिंसा और सैक्स की कुंठाओं के पनपने पर एक आम व्यक्ति ऐसी कल्पना का ताना-बाना बुन लेता है जो टेलीविजन पर दिखाये जाने वाले दृश्य जैसी ही होती है। जब बार-बार यह कुंठित कल्पना दोहरायी जाती है तो फिर व्यक्ति के दिमाग में यह प्रयोग के रूप में दोहराने के अहसास को जीना चाहता है और यदि वह उसमें असफल रहता है तो फिर उसमें खालीपन और हीनता पनपने लगती है। इसी खालीपन को भरने के लिए व्यक्ति को जब भी मौका लगता है तो वह चूकना नहीं चाहता। कुंठा और हीनता से भरा हुआ व्यक्ति अपना विवेक छोड़ देता है और फिर सैक्स और हिंसा के वही खेल खेलने लगता है जो टेलीविजन पर उसने देखा था। अब विकसित समाजों की भोगवादी संस्कृति की विकृतियाँ हमारे यहाँ फैल रही है। सांस्कृतिक विलगन और आत्मनिर्वासन का संकट बढ़ रहा है। जिससे हमारी अस्मिता को ही गंभीर खतरा पैदा हो गया है। आर्थिक दोहन से अधिक बड़ा खतरा है – मानसिक तौर पर परावलंबी होते जाना, इसी कारण हमारा आत्मविश्वास और अभिक्रम क्षीण हो रहा है।

स्वदेशी चिकित्सा

भारत में जिस शास्त्र की मदद से निरोगी होकर जीवन व्यतीत करने का ज्ञान मिलता है उसे आयुर्वेद कहते है। आयुर्वेद में निरोगी होकर जीवन व्यतीत करना ही धर्म माना गया है। रोगी होकर लंबी आयु को प्राप्त करना या निरोगी होकर कम आयु को प्राप्त करना दोनों ही आयुर्वेद में मान्य नहीं है। इसलिए जो भी नागरिक अपने जीवन को निरोगी रखकर लंबी आयु चाहते हैं, उन सभी को आयुर्वेद के ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। निरोगी जीवन के बिना किसी को भी धन की प्राप्ति, सुख की प्राप्ति, धर्म की प्राप्ति नहीं हो सकती हैं। रोगी व्यक्ति किसी भी तरह का सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। रोगी व्यक्ति कोई भी कार्य करके ठीक से धन भी नहीं कमा सकता है। हमारा स्वस्थ शरीर ही सभी तरह के ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। शरीर के नष्ट हो जाने पर संसार की सभी वस्तुएं बेकार हैं। यदि स्वस्थ शरीर है तो सभी प्रकार के सुखों का आनन्द लिया जा सकता है।

दुनिया में आयुर्वेद ही एक मात्र शास्त्र या चिकित्सा पद्धति है जो मनुष्य को निरोगी जीवन देने की गारंटी देता है। बाकी अन्य सभी चिकित्सा पद्धतियों में पहले बीमार बने फिर आपका इलाज किया जायेगा, लेकिन गारंटी कुछ भी नहीं है। आयुर्वेद एक शाश्वत एवं सातत्य वाला शास्त्र है। इसकी उत्पत्ति सृष्टि के रचयिता श्री ब्रह्माजी के द्वारा हुई ऐसा कहा जाता है। ब्रह्माजी ने आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया। श्री दक्ष प्रजापति ने यह ज्ञान अश्विनी कुमारों को दिया। उसके बाद यह ज्ञान देवताओं के राजा इन्द्र के पास पहुँचा। देवराज इन्द्र ने इस ज्ञान को ऋषियों-मुनियों जैसे आत्रेय, पुतर्वसु आदि को दिया। उसके बाद यह ज्ञान पृथ्वी पर फैलता चला गया। इस ज्ञान को पृथ्वी पर फैलाने वाले अनेक महान ऋषि एवं वैद्य हुए हैं। जो समय-समय पर आते रहे और लोगों को यह ज्ञान देते रहे हैं। जैसे चरक ऋषि, सुश्रुत, आत्रेय ऋषि, पुनर्वसु ऋषि, कश्यप ऋषि आदि। इसी श्रृंखला में एक महान ऋषि हुए वाग्भट्ट ऋषि जिन्होंने आयुर्वेद के ज्ञान को लोगों तक पहुँचाने का लिए एक शास्त्र की रचना की, जिसका नाम “अष्टांग हृदयम्”।

इस अष्टांग हृदयम् शास्त्र में लगभग 7000 श्लोक दिये गये हैं। ये श्लोक मनुष्य जीवन को पूरी तरह निरोगी बनाने के लिए हैं। प्रस्तुत पुस्तक में कुछ श्लोक, हिन्दी अनुवाद के साथ दिये जा

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