भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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विज्ञापन ऐसा मानसिक माहौल तैयार करते हैं कि लोग विज्ञापन मॉडलों की सुंदरता का अर्थ खास कंपनी के परिधानों और सजावट में निहित होने लगता है। जबकि सुंदरता किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और स्वभाव से आती है।

इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों ने एक खास किस्म की 'स्टेटस प्रॉब्लम' को जन्म दिया है। अब रोटी, कपड़ा और मकान वाली विचारधारा तो समाप्त हो चुकी है। उसकी जगह ले ली है नये-नये चिप्स, कुकीज, रेंगलर जींस, वॉल पेपर, आधुनिक टाइल्स आदि ने। भले श्रीमती जी दिन भर पड़ी सोती रहें, पर वैक्यूम क्लीनर न होने की वजह से उन्हें वक्त ही नहीं मिलता खाना बनाने का। या फूट प्रोसेसर जब नहीं होगा तो खाना बनाने में देर तो लगेगी ही, इसमें उनकी क्या गलती है। इन सबका परिणाम होता है अतार्किक एवं अनावश्यक व्यय, जो कि धीरे-धीरे आपको तार्किक एवं आवश्यक लगने लगता है। 'स्टेटस सिंबल' पहले से ऊँचा होना रहता है लेकिन वेतन उस अनुपात में बढ़ता नहीं, नतीजा होता है व्यक्ति के भ्रष्टाचारी बनने की कहानी शुरू होती है यानि विज्ञापनों का भारी रहता है। इस तरह एक ईमानदार व्यक्ति के भ्रष्टाचारी बनने की कहानी शुरू होती है यानि विज्ञापनों का रिश्ता भ्रष्टाचार से भी है।

विज्ञापनों में कभी भी वस्तु को गुणवत्ता के आधार पर बेचने की कोशिश नहीं की जाती है। ये विज्ञापन तो माध्यम वर्ग के ग्लैमर को भुनाने की कोशिश करते हैं। ये विज्ञापन व्यक्ति में एक हीन भावना पैदा करते हैं। अधिकांशतः होता यह है कि विज्ञापित वस्तु होती मध्यमवर्ग के इस्तेमाल की है पर विज्ञापन में दिखाया जाता है, विशुद्ध रईसाना पांच सितारों वाली जीवन शैली। मध्यम वर्ग की एक कमजोरी होती है कि उसमें उच्च वर्गीय जीवन के प्रति एक विशेष किस्म की जिज्ञासा तथा वैसा जीवन जीने की दमित इच्छा होती है। विज्ञापन भयंकर सिद्ध होते हैं। एक आम आदमी चाहे जितनी भी विलासिता की वस्तुएं एकत्रित कर ले पर वह कभी भी उस किस्म की जीवन शैली को वहन नहीं कर सकता जैसी कि उसे विज्ञापन में दिखायी जाती है। इसका परिणाम होता है एक भीषण हीन भावना का जन्म, जो बढ़ती जाती है तथा एक सीमा के आगे जाने पर वैयक्तिक विघटन का कारण बन जाती है।

अब तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने मनोरंजन परोसने के नाम पर अपने टेलीविजन नेटवर्क को शुरू कर दिया है। सी. एन.एन., स्टार, ए.टी.एन, एम.टी.वी., एल.टी.वी, यू.टी.वी आदि अनेकों बहुराष्ट्रीय टेलीविजन कंपनियों का जाल पूरे देश में फैल गया है। मनोरंजन के नाम पर बीसियों चैनल देश में चल रहे हैं। इन चैनलों पर दिखाये जाने वाले सीरियल, फिल्में तथा अन्य कार्यक्रम हमारे समाज को सांस्कृतिक रूप से खोखला बना रहे हैं। दो दर्जन से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इन विदेशी टी.वी चैनलों के प्रमुख समय को खरीद लिया है। सीरियल तथा कार्यक्रमों में क्या संस्कृति दिखायी जायेगी, इसका फैसला बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पैसा तय करता है। यह इस देश में पहली बार हो रहा है जब सीरियल तथा अन्य कार्यक्रम कलाकर्मियों और रचनाकारों की कल्पना या भावना से नहीं बन रहे हैं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लुटेरों के निर्देशों पर बन रहे हैं। इस नये सांस्कृतिक उद्योग का सय यही है। आज हमारी संस्कृति एक झटके में ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में चली गयी है। विदेशी चैनलों के कार्यक्रमों में एक समूची नई किस्म की उत्तेजक और भौंड़ी जीवन शैली दिखायी जा रही है। इसे देखकर दीनहीन, थके-हारे और निन्दावे बार असफल रहने वाले लोगों के मन में भी कमावासना जागृत हो जाती है। इन चैनलों पर दिखाये जा रहे कार्यक्रमों या फिल्मों द्वारा एक घोषित सैक्स और हिंसा का युद्ध चलाया जाता रहा है। इसका उद्देश्य व्यभिचार, यौनिक लिप्सा और हिंसा को बढ़ावा देना है।

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