भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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‘हरित क्रान्ति’ के बाद खेती रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर पूरी तरह निर्भर होकर रह गयी है। इसका नतीजा यह है कि जो अनाज जीवनदायी माना जाता है, वही उर्वरकों व कीटनाशकों के कारण गुणवत्ता में निम्न स्तर का होकर अस्वास्थ्यकर और जानलेवा तक होने लगा है। ‘हरित क्रान्ति’ के दौरान अनाज उत्पादन में चमत्कारिक वृद्धि असल में एक मिथक है, उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार सन् 1947 के बाद के पहले दशक में जहाँ अन्न उत्पादन में 3.5% प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हुई। वहीं अगले दशक में अर्थात् 60 के दशक में यह दर मात्र 2.25% प्रतिशत रही। यह दर दो दशकों तक जारी रही। एकमात्र गेहूँ ही ऐसा अनाज है जिसका उत्पादन 4.5% वार्षिक दर से बढ़कर 7.62% हो गयी लेकिन दूसरी ओर का सच यह है कि बाकी अन्य सभी अनाजों की वृद्धि दर लगातार घटती गयी। इन आँकड़ों से हरित क्रान्ति के भोजन पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं। हरित क्रान्ति के दौरान गेहूँ का उत्पादन क्षेत्र बढ़ता गया और मोटे अनाजों, दालों, तिलहन आदि का उत्पादन क्षेत्र घटता गया। इस कारण भोजन में प्रोटीन की मात्रा घटती गयी। नये अनाजों का असर पशुओं को भी झेलना पड़ रहा है क्योंकि ज्यादा उपज देने वाली फसलों का भूसा पोषक तत्वों के मामले में कमजोर होता है।

आज अनाज, फल, सब्जियाँ, दलहन, तिलहन, दूध और मांस-मछली तक सभी में विषाक्त तत्वों की भरभरा है जो एक धीमी मौत की ओर हमें धकेल रही है। इसके बावजूद रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल न केवल जारी है बल्कि तेजी से बढ़ भी रहा है। आँकड़ों पर नजर डालें तो विशेषज्ञों का कहना है कि सन् 1960 से 1980 के दौरान भारत में कीटनाशकों की खपत में 20 गुना इजाफा हुआ है। इस दौरान कीटनाशकों के उत्पादन में 14% की बढ़ोतरी हुई है और इनका आयात भी इस बीच 7 गुना बढ़ा।

संस्कृति पर हमला

क्या करें? “इनकी साँस में बदबू है” कहकर एक नयी नवेली पत्नी उदास हो जाती है। फिर उसकी एक सहेली उसे डॉक्टर के पास ले जाती है। डॉक्टर सलाह देते है कि “यदि साँस की बदबू से छूटकारा पाना है तो ‘कॉलगेट का सुरक्षा चक्र’ अपनाइये।

इसी तरह से ‘क्लोज अप फार क्लोजेज अस’। अर्थात् क्लोज-अप के इस्तेमाल से ही पति-पत्नी नजदीक आ सकते हैं सवाल उठता है कि ‘क्या पति-पत्नि का रिश्ता एक 10 रूपल्ली वाली कोलगेट या क्लोज अप के पेस्ट की ट्यूब पर टिका हुआ है?’ इसी तरह बालों को काला बनाने तथा गिरने से बचाने के लिए कई तरह के हेयर ड्राई, तेल तथा दवाओं के विज्ञापन आते हैं। जबकि सच यह है कि अभी तक बालों को गिरने या सफेद होने से रोकने का कोई उपचार नहीं निकला है। लेकिन हर रोज ऐसे विज्ञापन टी.वी पर आते रहते हैं जो लोगों के मन में सिवाय भ्रम के और कुछ नहीं पैदा करते। यही बात दंत मंजन पर भी लागू होती है। अभी तक दुनिया में ऐसा कोई भी मंजन नहीं है जो दांतों की बीमारियों को दूर कर सके या फिर दांतों को रोग लगने से बचाए। फिर भी टी.वी पर या पत्रिकाओं में जिस तरह के चमकते हुए दांतों को दिखाया जाता है, वह किसी खास कंपनी के मंजन के चमत्कार के रूप में होती है। एक के बाद एक सभी दांतों के खराब हो जाने पर भी लोग उपचार की दृष्टि से मंजनों की निरर्थकता को देख नहीं पाते।

किसी विशेष कंपनी की साड़ी में सजी हुई सुन्दर औरत, सूट में सजा हुआ सुन्दर नौजवान, कोका या पेप्सी की बोतल लिए समुद्र तट के रमणीक माहौल में खड़े सुन्दर स्त्री-पुरुष, विशेष कंपनी के स्वीमिंग सूट में समुद्र तट पर क्रीड़ा करती हुई बालायें – ये सब चटकिले-भड़किले

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