स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंक्षमता कमजोर हुई हैं। पंजाब और हरियाणा में काफी आईवीएफ सेंटर खुल रहे हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में भी इस बात की तस्दीक की गई है। इन फसलों के चलते हमारी मांसपेशियां पूरी तरह विकसित नहीं हो रही हैं। जिसका परिणाम जगह-जगह दिखाई देने वाले आईवीएफ सेंटर हैं।
हरियाणा के भूजल में दुगुना नाइट्रोजन आईएनजी और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट के मूताबिक, मिट्टी में बहुत मात्रा में नाइट्रोजन घुलने से कार्बन तत्व काफी कम हो जाता है। उसमें मौजूद पोषण तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है। नाइट्रोजन प्रदूषण पानी को भी प्रभावित करता है। पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के भूमिगत जल में नाइट्रेट की मौजूदगी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से बहुत अधिक पाई गई है। हरियाणा में यह सर्वाधिक 99.5 एमजी प्रति लीटर है। जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के सामान्य मानक 50 एमजी प्रति लीटर से करीब दोगुना है।
350 थैले यूरिया का इस्तेमाल 1978 में जहाँ एक एकड़ खेत में 7 से 8 थैले यूरिया के इस्तेमाल होते थे। वहीं अब 350 थैले का इस्तेमाल हो रहा है। बावजूद मनचाही फसल की पैदावार किसानों को नहीं मिल रही। हरित क्रांति का नारा जब आया उसी वक्त इसका विरोध हुआ था लेकिन देशभर के लिए अनाज पैदा करने वाला पंजाब प्रयोग की धरती बन कर रह गया। आज खेतों में रहने वाले किसानों में कैंसर, मोतियाबिंद और कई अन्य गंभीर बीमारियां पल रही हैं।
33 फीसदी ही खेत में पहुँचता है यूरिया आईएनजी के अध्यक्ष एन रघुराम बताते हैं कि बीते पांच दशकों में हर भारतीय किसान ने औसत 6 हजार किलों से अधिक यूरिया का इस्तेमाल किया है। सिर्फ 33 प्रतिशत उपभोग ही चावल और गेहूँ की फसलें करती हैं। शेष 67 फीसदी मिट्टी, पानी और पर्यावरण में पहुँचकर उसे तबाह कर रहा है।
कीटनाशकों का कहर
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रायपुरा-जंगला गांव में 15 अप्रैल 1990 की रात को एक समारोह में विषाक्त भोजन खाने से 200 से अधिक लोग मारे गये। इस दर्दनाक हादसे के कारणों का सही-सही पता चला, जब पूरी जांच की गयी, जांच के बाद पाया गया कि लोगों की मौच अत्यंत घातक कीटनाशक पैरथियान और ई.एन.पी के कारण हुई।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में फँसकर यह माना गया कि खेती की उपज बढ़ाने के लिए यदि ढेरों तरह के जहरीले कीटनाशी रसायनों का भरपूर इस्तेमाल जारी नहीं रहा तो कीटाणु सारी फसल को चट कर जायेंगे और सारी मानवता भूखमरी की चपेट में आ जायेगी। इन कंपनियों द्वारा प्रचारित विकास, किसी अन्य विकल्प को प्रकृति प्रेमियों व पर्यावरणवादियों का सुहाना सपना समझकर उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। मिट्टी की हिफाजत का परम्परागत देशी तौर तरीका, खरपतवार, घरेलू व कृषि कूड़ा-कचरा और देशी गाय के मल-मूत्र से बनी खाद, परस्पर मदद पहुँचाने वाली फलसों का बारी-बारी से बोया जाना यानी फसल-चक्र, यह सब विदेशी कंपनियों, द्वारा विकसित तकनीक ने छीन लिया है। मिट्टी, हवा, पानी और फसल के बीच जो प्राणवान, समन्वित और निरापद नाता था, वह बेमानी हो गया है। उसका स्थान ले लिया बेकस मिट्टी और जहरीले रासायनिक द्रव्यों ने।
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