भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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बनाने के क्षेत्र में जब विदेशी कंपनियाँ घुसेगी तो कौन हैरान होगा? हलवाई। कुल्हड़ की जगह विदेशी कंपनियाँ प्लास्टिक के गिलास बनाने लगेंगी तो कुम्हार किस काम का रह जायेगा? फलों का रस डिब्बा बंद करके बेचने के लिए विदेशी कंपनियाँ आयेगी तो कौन समाप्त होगा? फलों का रस बेचने वाले लोग। पानी बेचने के लिए भी विदेशी कंपनियाँ आयेगी तो आगे कहा नहीं जा सकता, हम लोग स्वयं सोच लें।

गुलाम होती खेती

आजकल देश में एक नारा बहुत जोर शोर से इन कंपनियों द्वारा दिया जा रहा है कि 'खेती को उद्योग बनाओ'। यानि अब खेत को कारखाना बनाने की साजिश देश में चल रही है। अब ये कम्पनियाँ खेती के बल पर और अधिक मालामाल होने के सपने देख रही हैं। हमें याद होना चाहिए कि आज से लगभग 60 वर्ष पहले इन्हीं कंपनियों द्वारा देश में 'हरित क्रान्ति' का नारा दिया गया था। खेती की उन्नति और विकास के नाम पर चले इस नारे ने भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था और उसके साथ जुड़ी हुई, समाज व्यवस्था को चौपट करके रख दिया। उसी तरह अब खेती की उन्नति के नाम पर खेती को उद्योग का दर्जा देने की बात भारत के सामान्य और बहुसंख्यक किसानों के लिए देश की बची कूची कृषि व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होगी।

छह दशक पहले जिस हरित क्रान्ति के नारे के साथ कृषि प्रधान राज्यों ने रसायन और नाइट्रोजन युक्त सस्ता यूरिया खेतों में डालना शुरू किया तब उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनके खेत सिर्फ फसल नहीं बल्कि गंभीर बीमारी और मौत भी बांटेंगे। बीमार होने वालों में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नाम शीर्ष पर हैं। इन राज्यों ने खेतों में अंधाधुंध नाइट्रोजन युक्त यूरिया का इस्तेमाल किया है। इंडियन नाइट्रोजन ग्रुप के शोध में यह दावा किया गया है कि भारत में नाइट्रोजन प्रदूषण का मुख्य स्रोत कृषि है। वहीं, चावल और गेहूँ की फसलों प्रदूषण का जरिया बन रही हैं। पहली बार नाइट्रोजन के प्रयोग और प्रभाव पर इंडियन नाइट्रोजन ग्रुप ने दस वर्ष का गहन शोध किया है। 120 क्षेत्रों के वैज्ञानिकों ने नाइट्रोजन के विभिन्न स्रोतों का पता लगाया है। चिंता की बात है कि भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर कृषि में सर्वाधिक यूरिया का इस्तेमाल करने वाला देश है। 1960-61 में जहाँ 10 फीसदी नाइट्रोजन उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता था। जो कि 2015-2016 में बढ़कर 82 फीसदी रिकार्ड किया गया है।

एक साल में इतना बिका यूरिया सीएसई के मुताबिक, वर्ष 2015 से 2016 के बीच यूरिया की बिक्री पंजाब में जहाँ 30,86046 टन और हरियाणा ने 21,12981 टन, दिल्ली में 10,792, उत्तर प्रदेश में 57,98991 टन हुई। इस नाइट्रोजन युक्त यूरिया का महज 30 फीसदी ही खेतों तक पहुँचा बाकी पर्यावरण में जहर बनकर घुल गया। यह बच्चों के लिए भी खतरनाक है। नाइट्रेट युक्त पानी यदि छह महीने तक बच्चा पीता है तो वह ब्लू बेबी सिंड्रोम का शिकार हो सकता है। खून संबंधी कई बीमारियाँ भी हो सकती हैं।

बढ़ रहे हैं आईवीएफ सेंटर कुदरती खेती की विधि और सीख देने वाले भगत पूर्ण सिंह फार्म के इंचार्ज राजवीर सिंह बताते हैं कि यूरिया और रसायन के इस्तेमाल से पैदा फसलों ने उपजाऊ जमीन को बर्बाद कर दिया है। फसलों में जिक्र बिल्कुल भी नहीं हैं जिससे लोगों में प्रजनन

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