स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंफिलहाल 4 लाख 10 हजार भारतीय विदेशों में काम कर रहे हैं। अध्ययन के अनुसार भारतीय इंजीनियर विदेशी में 32%, डॉक्टर 28% और वैज्ञानिक 5% हैं।
जब एक डॉक्टर भारत को छोड़कर अमेरिका जाता है तो देश को 35 करोड़ रुपये का नुकसान होता है लेकिन वह अमरीका में 60 करोड़ यानी 20 गुना धन कमा कर उस देश की समृद्धि में भागीदार होता है। जबकि दूसरी ओर भारत एक विकासशील देश है जहाँ डॉक्टरों का अभाव है, जहाँ शहर में 5 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है तथा गाँव में 45 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है।
भारत से निकलने वाली प्रतिभाओं की एक बड़ी संख्या अमेरिका चली जाती है। 1957 से 1965 तक अमेरिका में भारतीय वैज्ञानिकों, डॉक्टरों तथा इंजीनियरों की संख्या सिर्फ 1000 थीं वही 1966 से 1968 तक वह संख्या 4000 हो गयी। 1977 तक भारत में 16,849 वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर अमेरिका चले गये।
उदार आर्थिक नीतियों के चलते देश में विदेशी अनुबंधों की बाढ़ आ गयी है। जुलाई 1995 तक देश में 20,000 से अधिक विदेशी अनुबंध चल रहे हैं। जिनके चलते गैर जरूरी क्षेत्रों में आर्थिक विकास ज्यादा हुआ है। पिछले 5 वर्षों में संगठित क्षेत्रों में सबसे अधिक विकास हुआ है जबकि इस क्षेत्र में रोजगार अवसरों की वृद्धि दर मात्र 1.5 प्रतिशत रही है। यानी संगठित क्षेत्र में पूँजी निवेश सबसे अधिक हुआ है लेकिन रोजगार के अवसर उस तुलना में पैदा नहीं हुए।
दूसरी ओर देश का लघु उद्योग का क्षेत्र है जिसमें सबसे कम पूँजी का निवेश किया जाता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश के जितने भी रोजगार है उनमें से 80 प्रतिशत इन अंसंगठित लघु उद्योगों में है। लघु उद्योगों में 1986-87 में रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 10.1 करोड़ थी जो वर्ष 1987-88 में बढ़कर 10.7 करोड़ तक पहुँच गयी भारत में 1988 के अंत तक लघु उद्योगों की कुल संख्या 14.6 लाख थी। इसमें से 3 लाख लघु इकाईयाँ इन विशालकाय कंपनियों के बाजार में एकाधिकार के चलते बीमार हो गयी हैं और बंद होने के कगार पर हैं।
चूँकि इन विदेशी कंपनियों ने लघु उद्योग में बनने वाले हर सामान को बनाने के क्षेत्र में घुसपैठ कर रखी हैं, अतः लगभग 10 लाख 30 हजार अन्य छोटी इकाईयाँ इनके सामने प्रतिस्पर्धा में धीरे-धीरे चल रही हैं। हर वर्ष देश में बीमार इकाईयों की संख्या बढ़ती चली जा रही है जिससे लाखों लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 1 करोड़ 84 लाख नये बेरोजगार लोग पैदा हो जाते हैं। इनमें से अधिकांश छोटी इकाईयों के बंद हो जाने की वजह से बेरोजगार हो जाते हैं।
इसके अतिरिक्त इन विदेशी कंपनियों ने विकास के नाम पर सैकड़ों वर्षों से चल रहे हमारे देशी कारोबार, हुनर और हस्त शिल्प को रौंदा हैं, जिसमें लगे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन गयी हैं। आधुनिकीकरण की सबसे ज्यादा मार पड़ी है कारीगरों, दस्तकारों व कुटीर उद्योगों पर। जूता उद्योग का आधुनिकीकरण होगा तो कौन मारा जायेगा? मोची। कपड़ा उद्योग का मशीनीकरण होगा तो कौन बर्बाद होगा? बुनकर। वस्त्र उद्योग का रेडीमेडकरण होगा तो कौन नष्ट होगा? दर्जी। मिठाई
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