स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकर रही हैं, जहाँ विदेशी तकनीक की कोई जरूरत नहीं है। 80 के दशक में सरकार की ओर से एक नीति बनायी गयी थी। इस नीति के अनुसार 850 ऐसी वस्तुएं हैं, जिसके उत्पादन को लघु उद्योगों के लिए सुरक्षित रखा गया है। लेकिन जितनी भी विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं, वे सभी इन्हीं उत्पादों के व्यापार में लगी हुई हैं। लघु उद्योगों के लिये आरक्षित उत्पादों के क्षेत्र में घुसपैठ से बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उच्च विदेशी तकनीक लाने की बात एकदम झूठ साबित होती है।
माल देशी, मुहर विदेशी
कई बार ऐसा भी होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ न तो पूँजी लाती है और न ही कोई उच्च तकनीक। होता यह है कि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कुछ भारतीय कंपनियों के साथ 'फ्रेंचाइज एग्रीमेंट' करती हैं या 'सब कान्ट्रेक्टिंग एग्रीमेंट' करती हैं। इसके तहत उत्पादन का काम तो वह भारतीय कंपनी करती है लेकिन उत्पादित माल पर नाम बहुराष्ट्रीय कंपनी का ही होता है। अर्थात् बाजार में बिकने वाले माल की उत्पादक कोई स्वदेशी कंपनी है लेकिन माल विदेशी कंपनी के नाम से बिकता है। पूँजी लगाये स्वदेशी कंपनी, तकनीक इस्तेमाल करे स्वदेशी कंपनी, उत्पादन कराये स्वदेशी कंपनी, लेकिन माल बिके विदेशी कंपनी के नाम पर। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का यह गोरखधंधा इस देश में खूब चल रहा है।
घटते रोजगार और बढ़ती बेरोजगारी
आँखे मूंदकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से, जब हम बनी-बनायी तकनीक का आयात करते हैं तो हम दरअसल दूसरे देशों के इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों को काम मुहैया कराते हैं। अर्थात् अपने देश से विकसित देशों को रोजगार का निर्यात करते हैं। इस तकनीकी आयात की प्रक्रिया में भारतीय इंजीनियरों व तकनीकी विशेषज्ञों को जो अतिरिक्त कार्य दिया जा सकता था और अधिक रोजगार के अवसर पैदा किये जा सकते थे, वे एकदम समाप्त हो जाते हैं। इससे हमारे देश के इंजीनियर व तकनीकी विशेषज्ञ बेकार रहते हैं, वही दूसरी ओर किसी विकसित औद्योगिक, देश को जहाँ की कंपनी होती है, अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हो जाते हैं। इसके अलावा जब बनी बनायी तकनीक आयात होता है तो भारतीय इंजीनियरों का कार्य सिर्फ तंत्र को चालू रखन का होता है। सर्वविदित है कि कारखानों के रख-रखाव के लिए किसी बड़ी प्रतिभा की जरूरत नहीं होती है। जबकि तकनीकी विशेषज्ञता का योगदान नयी विधियाँ विकसित करने में और विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान द्वारा विकास करने में होता है। इस प्रकार जो इंजीनियर या तकनीकी विशेषज्ञ देश में काम में लगे हुए हैं, उनकी प्रतिभा का भी सही उपयोग नहीं हो पाता है।
'सेंटर फॉर प्लानिंग रिसर्च एण्ड एक्शन' (नयी दिल्ली) के अध्ययन के मुताबिक प्रतिभा पलायन के कारण भारत को अब तक 247 अरब रूपये का नुकसान हो चुका है और अगर यह नहीं रूका तो शताब्दी के अंत तक 5 लाख से ज्यादा कुशल और प्रशिक्षित भारतीय विदेशों में काम कर रहे होंगे।
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