भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

कर रही हैं, जहाँ विदेशी तकनीक की कोई जरूरत नहीं है। 80 के दशक में सरकार की ओर से एक नीति बनायी गयी थी। इस नीति के अनुसार 850 ऐसी वस्तुएं हैं, जिसके उत्पादन को लघु उद्योगों के लिए सुरक्षित रखा गया है। लेकिन जितनी भी विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं, वे सभी इन्हीं उत्पादों के व्यापार में लगी हुई हैं। लघु उद्योगों के लिये आरक्षित उत्पादों के क्षेत्र में घुसपैठ से बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उच्च विदेशी तकनीक लाने की बात एकदम झूठ साबित होती है।

माल देशी, मुहर विदेशी

कई बार ऐसा भी होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ न तो पूँजी लाती है और न ही कोई उच्च तकनीक। होता यह है कि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कुछ भारतीय कंपनियों के साथ 'फ्रेंचाइज एग्रीमेंट' करती हैं या 'सब कान्ट्रेक्टिंग एग्रीमेंट' करती हैं। इसके तहत उत्पादन का काम तो वह भारतीय कंपनी करती है लेकिन उत्पादित माल पर नाम बहुराष्ट्रीय कंपनी का ही होता है। अर्थात् बाजार में बिकने वाले माल की उत्पादक कोई स्वदेशी कंपनी है लेकिन माल विदेशी कंपनी के नाम से बिकता है। पूँजी लगाये स्वदेशी कंपनी, तकनीक इस्तेमाल करे स्वदेशी कंपनी, उत्पादन कराये स्वदेशी कंपनी, लेकिन माल बिके विदेशी कंपनी के नाम पर। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का यह गोरखधंधा इस देश में खूब चल रहा है।

घटते रोजगार और बढ़ती बेरोजगारी

आँखे मूंदकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से, जब हम बनी-बनायी तकनीक का आयात करते हैं तो हम दरअसल दूसरे देशों के इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों को काम मुहैया कराते हैं। अर्थात् अपने देश से विकसित देशों को रोजगार का निर्यात करते हैं। इस तकनीकी आयात की प्रक्रिया में भारतीय इंजीनियरों व तकनीकी विशेषज्ञों को जो अतिरिक्त कार्य दिया जा सकता था और अधिक रोजगार के अवसर पैदा किये जा सकते थे, वे एकदम समाप्त हो जाते हैं। इससे हमारे देश के इंजीनियर व तकनीकी विशेषज्ञ बेकार रहते हैं, वही दूसरी ओर किसी विकसित औद्योगिक, देश को जहाँ की कंपनी होती है, अतिरिक्त रोजगार के अवसर पैदा हो जाते हैं। इसके अलावा जब बनी बनायी तकनीक आयात होता है तो भारतीय इंजीनियरों का कार्य सिर्फ तंत्र को चालू रखन का होता है। सर्वविदित है कि कारखानों के रख-रखाव के लिए किसी बड़ी प्रतिभा की जरूरत नहीं होती है। जबकि तकनीकी विशेषज्ञता का योगदान नयी विधियाँ विकसित करने में और विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान द्वारा विकास करने में होता है। इस प्रकार जो इंजीनियर या तकनीकी विशेषज्ञ देश में काम में लगे हुए हैं, उनकी प्रतिभा का भी सही उपयोग नहीं हो पाता है।

'सेंटर फॉर प्लानिंग रिसर्च एण्ड एक्शन' (नयी दिल्ली) के अध्ययन के मुताबिक प्रतिभा पलायन के कारण भारत को अब तक 247 अरब रूपये का नुकसान हो चुका है और अगर यह नहीं रूका तो शताब्दी के अंत तक 5 लाख से ज्यादा कुशल और प्रशिक्षित भारतीय विदेशों में काम कर रहे होंगे।

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फिलहाल 4 लाख 10 हजार भारतीय विदेशों में काम कर रहे हैं। अध्ययन के अनुसार भारतीय इंजीनियर विदेशी में 32%, डॉक्टर 28% और वैज्ञानिक 5% हैं।

जब एक डॉक्टर भारत को छोड़कर अमेरिका जाता है तो देश को 35 करोड़ रुपये का नुकसान होता है लेकिन वह अमरीका में 60 करोड़ यानी 20 गुना धन कमा कर उस देश की समृद्धि में भागीदार होता है। जबकि दूसरी ओर भारत एक विकासशील देश है जहाँ डॉक्टरों का अभाव है, जहाँ शहर में 5 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है तथा गाँव में 45 हजार लोगों पर एक डॉक्टर है।

भारत से निकलने वाली प्रतिभाओं की एक बड़ी संख्या अमेरिका चली जाती है। 1957 से 1965 तक अमेरिका में भारतीय वैज्ञानिकों, डॉक्टरों तथा इंजीनियरों की संख्या सिर्फ 1000 थीं वही 1966 से 1968 तक वह संख्या 4000 हो गयी। 1977 तक भारत में 16,849 वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर अमेरिका चले गये।

उदार आर्थिक नीतियों के चलते देश में विदेशी अनुबंधों की बाढ़ आ गयी है। जुलाई 1995 तक देश में 20,000 से अधिक विदेशी अनुबंध चल रहे हैं। जिनके चलते गैर जरूरी क्षेत्रों में आर्थिक विकास ज्यादा हुआ है। पिछले 5 वर्षों में संगठित क्षेत्रों में सबसे अधिक विकास हुआ है जबकि इस क्षेत्र में रोजगार अवसरों की वृद्धि दर मात्र 1.5 प्रतिशत रही है। यानी संगठित क्षेत्र में पूँजी निवेश सबसे अधिक हुआ है लेकिन रोजगार के अवसर उस तुलना में पैदा नहीं हुए।

दूसरी ओर देश का लघु उद्योग का क्षेत्र है जिसमें सबसे कम पूँजी का निवेश किया जाता है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश के जितने भी रोजगार है उनमें से 80 प्रतिशत इन अंसंगठित लघु उद्योगों में है। लघु उद्योगों में 1986-87 में रोजगार प्राप्त व्यक्तियों की संख्या 10.1 करोड़ थी जो वर्ष 1987-88 में बढ़कर 10.7 करोड़ तक पहुँच गयी भारत में 1988 के अंत तक लघु उद्योगों की कुल संख्या 14.6 लाख थी। इसमें से 3 लाख लघु इकाईयाँ इन विशालकाय कंपनियों के बाजार में एकाधिकार के चलते बीमार हो गयी हैं और बंद होने के कगार पर हैं।

चूँकि इन विदेशी कंपनियों ने लघु उद्योग में बनने वाले हर सामान को बनाने के क्षेत्र में घुसपैठ कर रखी हैं, अतः लगभग 10 लाख 30 हजार अन्य छोटी इकाईयाँ इनके सामने प्रतिस्पर्धा में धीरे-धीरे चल रही हैं। हर वर्ष देश में बीमार इकाईयों की संख्या बढ़ती चली जा रही है जिससे लाखों लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 1 करोड़ 84 लाख नये बेरोजगार लोग पैदा हो जाते हैं। इनमें से अधिकांश छोटी इकाईयों के बंद हो जाने की वजह से बेरोजगार हो जाते हैं।

इसके अतिरिक्त इन विदेशी कंपनियों ने विकास के नाम पर सैकड़ों वर्षों से चल रहे हमारे देशी कारोबार, हुनर और हस्त शिल्प को रौंदा हैं, जिसमें लगे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन गयी हैं। आधुनिकीकरण की सबसे ज्यादा मार पड़ी है कारीगरों, दस्तकारों व कुटीर उद्योगों पर। जूता उद्योग का आधुनिकीकरण होगा तो कौन मारा जायेगा? मोची। कपड़ा उद्योग का मशीनीकरण होगा तो कौन बर्बाद होगा? बुनकर। वस्त्र उद्योग का रेडीमेडकरण होगा तो कौन नष्ट होगा? दर्जी। मिठाई

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बनाने के क्षेत्र में जब विदेशी कंपनियाँ घुसेगी तो कौन हैरान होगा? हलवाई। कुल्हड़ की जगह विदेशी कंपनियाँ प्लास्टिक के गिलास बनाने लगेंगी तो कुम्हार किस काम का रह जायेगा? फलों का रस डिब्बा बंद करके बेचने के लिए विदेशी कंपनियाँ आयेगी तो कौन समाप्त होगा? फलों का रस बेचने वाले लोग। पानी बेचने के लिए भी विदेशी कंपनियाँ आयेगी तो आगे कहा नहीं जा सकता, हम लोग स्वयं सोच लें।

गुलाम होती खेती

आजकल देश में एक नारा बहुत जोर शोर से इन कंपनियों द्वारा दिया जा रहा है कि 'खेती को उद्योग बनाओ'। यानि अब खेत को कारखाना बनाने की साजिश देश में चल रही है। अब ये कम्पनियाँ खेती के बल पर और अधिक मालामाल होने के सपने देख रही हैं। हमें याद होना चाहिए कि आज से लगभग 60 वर्ष पहले इन्हीं कंपनियों द्वारा देश में 'हरित क्रान्ति' का नारा दिया गया था। खेती की उन्नति और विकास के नाम पर चले इस नारे ने भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था और उसके साथ जुड़ी हुई, समाज व्यवस्था को चौपट करके रख दिया। उसी तरह अब खेती की उन्नति के नाम पर खेती को उद्योग का दर्जा देने की बात भारत के सामान्य और बहुसंख्यक किसानों के लिए देश की बची कूची कृषि व्यवस्था के लिए घातक सिद्ध होगी।

छह दशक पहले जिस हरित क्रान्ति के नारे के साथ कृषि प्रधान राज्यों ने रसायन और नाइट्रोजन युक्त सस्ता यूरिया खेतों में डालना शुरू किया तब उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनके खेत सिर्फ फसल नहीं बल्कि गंभीर बीमारी और मौत भी बांटेंगे। बीमार होने वालों में दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नाम शीर्ष पर हैं। इन राज्यों ने खेतों में अंधाधुंध नाइट्रोजन युक्त यूरिया का इस्तेमाल किया है। इंडियन नाइट्रोजन ग्रुप के शोध में यह दावा किया गया है कि भारत में नाइट्रोजन प्रदूषण का मुख्य स्रोत कृषि है। वहीं, चावल और गेहूँ की फसलों प्रदूषण का जरिया बन रही हैं। पहली बार नाइट्रोजन के प्रयोग और प्रभाव पर इंडियन नाइट्रोजन ग्रुप ने दस वर्ष का गहन शोध किया है। 120 क्षेत्रों के वैज्ञानिकों ने नाइट्रोजन के विभिन्न स्रोतों का पता लगाया है। चिंता की बात है कि भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर कृषि में सर्वाधिक यूरिया का इस्तेमाल करने वाला देश है। 1960-61 में जहाँ 10 फीसदी नाइट्रोजन उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता था। जो कि 2015-2016 में बढ़कर 82 फीसदी रिकार्ड किया गया है।

एक साल में इतना बिका यूरिया सीएसई के मुताबिक, वर्ष 2015 से 2016 के बीच यूरिया की बिक्री पंजाब में जहाँ 30,86046 टन और हरियाणा ने 21,12981 टन, दिल्ली में 10,792, उत्तर प्रदेश में 57,98991 टन हुई। इस नाइट्रोजन युक्त यूरिया का महज 30 फीसदी ही खेतों तक पहुँचा बाकी पर्यावरण में जहर बनकर घुल गया। यह बच्चों के लिए भी खतरनाक है। नाइट्रेट युक्त पानी यदि छह महीने तक बच्चा पीता है तो वह ब्लू बेबी सिंड्रोम का शिकार हो सकता है। खून संबंधी कई बीमारियाँ भी हो सकती हैं।

बढ़ रहे हैं आईवीएफ सेंटर कुदरती खेती की विधि और सीख देने वाले भगत पूर्ण सिंह फार्म के इंचार्ज राजवीर सिंह बताते हैं कि यूरिया और रसायन के इस्तेमाल से पैदा फसलों ने उपजाऊ जमीन को बर्बाद कर दिया है। फसलों में जिक्र बिल्कुल भी नहीं हैं जिससे लोगों में प्रजनन

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क्षमता कमजोर हुई हैं। पंजाब और हरियाणा में काफी आईवीएफ सेंटर खुल रहे हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में भी इस बात की तस्दीक की गई है। इन फसलों के चलते हमारी मांसपेशियां पूरी तरह विकसित नहीं हो रही हैं। जिसका परिणाम जगह-जगह दिखाई देने वाले आईवीएफ सेंटर हैं।

हरियाणा के भूजल में दुगुना नाइट्रोजन आईएनजी और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट के मूताबिक, मिट्टी में बहुत मात्रा में नाइट्रोजन घुलने से कार्बन तत्व काफी कम हो जाता है। उसमें मौजूद पोषण तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है। नाइट्रोजन प्रदूषण पानी को भी प्रभावित करता है। पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के भूमिगत जल में नाइट्रेट की मौजूदगी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से बहुत अधिक पाई गई है। हरियाणा में यह सर्वाधिक 99.5 एमजी प्रति लीटर है। जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के सामान्य मानक 50 एमजी प्रति लीटर से करीब दोगुना है।

350 थैले यूरिया का इस्तेमाल 1978 में जहाँ एक एकड़ खेत में 7 से 8 थैले यूरिया के इस्तेमाल होते थे। वहीं अब 350 थैले का इस्तेमाल हो रहा है। बावजूद मनचाही फसल की पैदावार किसानों को नहीं मिल रही। हरित क्रांति का नारा जब आया उसी वक्त इसका विरोध हुआ था लेकिन देशभर के लिए अनाज पैदा करने वाला पंजाब प्रयोग की धरती बन कर रह गया। आज खेतों में रहने वाले किसानों में कैंसर, मोतियाबिंद और कई अन्य गंभीर बीमारियां पल रही हैं।

33 फीसदी ही खेत में पहुँचता है यूरिया आईएनजी के अध्यक्ष एन रघुराम बताते हैं कि बीते पांच दशकों में हर भारतीय किसान ने औसत 6 हजार किलों से अधिक यूरिया का इस्तेमाल किया है। सिर्फ 33 प्रतिशत उपभोग ही चावल और गेहूँ की फसलें करती हैं। शेष 67 फीसदी मिट्टी, पानी और पर्यावरण में पहुँचकर उसे तबाह कर रहा है।

कीटनाशकों का कहर

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रायपुरा-जंगला गांव में 15 अप्रैल 1990 की रात को एक समारोह में विषाक्त भोजन खाने से 200 से अधिक लोग मारे गये। इस दर्दनाक हादसे के कारणों का सही-सही पता चला, जब पूरी जांच की गयी, जांच के बाद पाया गया कि लोगों की मौच अत्यंत घातक कीटनाशक पैरथियान और ई.एन.पी के कारण हुई।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में फँसकर यह माना गया कि खेती की उपज बढ़ाने के लिए यदि ढेरों तरह के जहरीले कीटनाशी रसायनों का भरपूर इस्तेमाल जारी नहीं रहा तो कीटाणु सारी फसल को चट कर जायेंगे और सारी मानवता भूखमरी की चपेट में आ जायेगी। इन कंपनियों द्वारा प्रचारित विकास, किसी अन्य विकल्प को प्रकृति प्रेमियों व पर्यावरणवादियों का सुहाना सपना समझकर उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। मिट्टी की हिफाजत का परम्परागत देशी तौर तरीका, खरपतवार, घरेलू व कृषि कूड़ा-कचरा और देशी गाय के मल-मूत्र से बनी खाद, परस्पर मदद पहुँचाने वाली फलसों का बारी-बारी से बोया जाना यानी फसल-चक्र, यह सब विदेशी कंपनियों, द्वारा विकसित तकनीक ने छीन लिया है। मिट्टी, हवा, पानी और फसल के बीच जो प्राणवान, समन्वित और निरापद नाता था, वह बेमानी हो गया है। उसका स्थान ले लिया बेकस मिट्टी और जहरीले रासायनिक द्रव्यों ने।

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‘हरित क्रान्ति’ के बाद खेती रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर पूरी तरह निर्भर होकर रह गयी है। इसका नतीजा यह है कि जो अनाज जीवनदायी माना जाता है, वही उर्वरकों व कीटनाशकों के कारण गुणवत्ता में निम्न स्तर का होकर अस्वास्थ्यकर और जानलेवा तक होने लगा है। ‘हरित क्रान्ति’ के दौरान अनाज उत्पादन में चमत्कारिक वृद्धि असल में एक मिथक है, उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार सन् 1947 के बाद के पहले दशक में जहाँ अन्न उत्पादन में 3.5% प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हुई। वहीं अगले दशक में अर्थात् 60 के दशक में यह दर मात्र 2.25% प्रतिशत रही। यह दर दो दशकों तक जारी रही। एकमात्र गेहूँ ही ऐसा अनाज है जिसका उत्पादन 4.5% वार्षिक दर से बढ़कर 7.62% हो गयी लेकिन दूसरी ओर का सच यह है कि बाकी अन्य सभी अनाजों की वृद्धि दर लगातार घटती गयी। इन आँकड़ों से हरित क्रान्ति के भोजन पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं। हरित क्रान्ति के दौरान गेहूँ का उत्पादन क्षेत्र बढ़ता गया और मोटे अनाजों, दालों, तिलहन आदि का उत्पादन क्षेत्र घटता गया। इस कारण भोजन में प्रोटीन की मात्रा घटती गयी। नये अनाजों का असर पशुओं को भी झेलना पड़ रहा है क्योंकि ज्यादा उपज देने वाली फसलों का भूसा पोषक तत्वों के मामले में कमजोर होता है।

आज अनाज, फल, सब्जियाँ, दलहन, तिलहन, दूध और मांस-मछली तक सभी में विषाक्त तत्वों की भरभरा है जो एक धीमी मौत की ओर हमें धकेल रही है। इसके बावजूद रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल न केवल जारी है बल्कि तेजी से बढ़ भी रहा है। आँकड़ों पर नजर डालें तो विशेषज्ञों का कहना है कि सन् 1960 से 1980 के दौरान भारत में कीटनाशकों की खपत में 20 गुना इजाफा हुआ है। इस दौरान कीटनाशकों के उत्पादन में 14% की बढ़ोतरी हुई है और इनका आयात भी इस बीच 7 गुना बढ़ा।

संस्कृति पर हमला

क्या करें? “इनकी साँस में बदबू है” कहकर एक नयी नवेली पत्नी उदास हो जाती है। फिर उसकी एक सहेली उसे डॉक्टर के पास ले जाती है। डॉक्टर सलाह देते है कि “यदि साँस की बदबू से छूटकारा पाना है तो ‘कॉलगेट का सुरक्षा चक्र’ अपनाइये।

इसी तरह से ‘क्लोज अप फार क्लोजेज अस’। अर्थात् क्लोज-अप के इस्तेमाल से ही पति-पत्नी नजदीक आ सकते हैं सवाल उठता है कि ‘क्या पति-पत्नि का रिश्ता एक 10 रूपल्ली वाली कोलगेट या क्लोज अप के पेस्ट की ट्यूब पर टिका हुआ है?’ इसी तरह बालों को काला बनाने तथा गिरने से बचाने के लिए कई तरह के हेयर ड्राई, तेल तथा दवाओं के विज्ञापन आते हैं। जबकि सच यह है कि अभी तक बालों को गिरने या सफेद होने से रोकने का कोई उपचार नहीं निकला है। लेकिन हर रोज ऐसे विज्ञापन टी.वी पर आते रहते हैं जो लोगों के मन में सिवाय भ्रम के और कुछ नहीं पैदा करते। यही बात दंत मंजन पर भी लागू होती है। अभी तक दुनिया में ऐसा कोई भी मंजन नहीं है जो दांतों की बीमारियों को दूर कर सके या फिर दांतों को रोग लगने से बचाए। फिर भी टी.वी पर या पत्रिकाओं में जिस तरह के चमकते हुए दांतों को दिखाया जाता है, वह किसी खास कंपनी के मंजन के चमत्कार के रूप में होती है। एक के बाद एक सभी दांतों के खराब हो जाने पर भी लोग उपचार की दृष्टि से मंजनों की निरर्थकता को देख नहीं पाते।

किसी विशेष कंपनी की साड़ी में सजी हुई सुन्दर औरत, सूट में सजा हुआ सुन्दर नौजवान, कोका या पेप्सी की बोतल लिए समुद्र तट के रमणीक माहौल में खड़े सुन्दर स्त्री-पुरुष, विशेष कंपनी के स्वीमिंग सूट में समुद्र तट पर क्रीड़ा करती हुई बालायें – ये सब चटकिले-भड़किले

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विज्ञापन ऐसा मानसिक माहौल तैयार करते हैं कि लोग विज्ञापन मॉडलों की सुंदरता का अर्थ खास कंपनी के परिधानों और सजावट में निहित होने लगता है। जबकि सुंदरता किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और स्वभाव से आती है।

इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों ने एक खास किस्म की 'स्टेटस प्रॉब्लम' को जन्म दिया है। अब रोटी, कपड़ा और मकान वाली विचारधारा तो समाप्त हो चुकी है। उसकी जगह ले ली है नये-नये चिप्स, कुकीज, रेंगलर जींस, वॉल पेपर, आधुनिक टाइल्स आदि ने। भले श्रीमती जी दिन भर पड़ी सोती रहें, पर वैक्यूम क्लीनर न होने की वजह से उन्हें वक्त ही नहीं मिलता खाना बनाने का। या फूट प्रोसेसर जब नहीं होगा तो खाना बनाने में देर तो लगेगी ही, इसमें उनकी क्या गलती है। इन सबका परिणाम होता है अतार्किक एवं अनावश्यक व्यय, जो कि धीरे-धीरे आपको तार्किक एवं आवश्यक लगने लगता है। 'स्टेटस सिंबल' पहले से ऊँचा होना रहता है लेकिन वेतन उस अनुपात में बढ़ता नहीं, नतीजा होता है व्यक्ति के भ्रष्टाचारी बनने की कहानी शुरू होती है यानि विज्ञापनों का भारी रहता है। इस तरह एक ईमानदार व्यक्ति के भ्रष्टाचारी बनने की कहानी शुरू होती है यानि विज्ञापनों का रिश्ता भ्रष्टाचार से भी है।

विज्ञापनों में कभी भी वस्तु को गुणवत्ता के आधार पर बेचने की कोशिश नहीं की जाती है। ये विज्ञापन तो माध्यम वर्ग के ग्लैमर को भुनाने की कोशिश करते हैं। ये विज्ञापन व्यक्ति में एक हीन भावना पैदा करते हैं। अधिकांशतः होता यह है कि विज्ञापित वस्तु होती मध्यमवर्ग के इस्तेमाल की है पर विज्ञापन में दिखाया जाता है, विशुद्ध रईसाना पांच सितारों वाली जीवन शैली। मध्यम वर्ग की एक कमजोरी होती है कि उसमें उच्च वर्गीय जीवन के प्रति एक विशेष किस्म की जिज्ञासा तथा वैसा जीवन जीने की दमित इच्छा होती है। विज्ञापन भयंकर सिद्ध होते हैं। एक आम आदमी चाहे जितनी भी विलासिता की वस्तुएं एकत्रित कर ले पर वह कभी भी उस किस्म की जीवन शैली को वहन नहीं कर सकता जैसी कि उसे विज्ञापन में दिखायी जाती है। इसका परिणाम होता है एक भीषण हीन भावना का जन्म, जो बढ़ती जाती है तथा एक सीमा के आगे जाने पर वैयक्तिक विघटन का कारण बन जाती है।

अब तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने मनोरंजन परोसने के नाम पर अपने टेलीविजन नेटवर्क को शुरू कर दिया है। सी. एन.एन., स्टार, ए.टी.एन, एम.टी.वी., एल.टी.वी, यू.टी.वी आदि अनेकों बहुराष्ट्रीय टेलीविजन कंपनियों का जाल पूरे देश में फैल गया है। मनोरंजन के नाम पर बीसियों चैनल देश में चल रहे हैं। इन चैनलों पर दिखाये जाने वाले सीरियल, फिल्में तथा अन्य कार्यक्रम हमारे समाज को सांस्कृतिक रूप से खोखला बना रहे हैं। दो दर्जन से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इन विदेशी टी.वी चैनलों के प्रमुख समय को खरीद लिया है। सीरियल तथा कार्यक्रमों में क्या संस्कृति दिखायी जायेगी, इसका फैसला बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पैसा तय करता है। यह इस देश में पहली बार हो रहा है जब सीरियल तथा अन्य कार्यक्रम कलाकर्मियों और रचनाकारों की कल्पना या भावना से नहीं बन रहे हैं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लुटेरों के निर्देशों पर बन रहे हैं। इस नये सांस्कृतिक उद्योग का सय यही है। आज हमारी संस्कृति एक झटके में ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में चली गयी है। विदेशी चैनलों के कार्यक्रमों में एक समूची नई किस्म की उत्तेजक और भौंड़ी जीवन शैली दिखायी जा रही है। इसे देखकर दीनहीन, थके-हारे और निन्दावे बार असफल रहने वाले लोगों के मन में भी कमावासना जागृत हो जाती है। इन चैनलों पर दिखाये जा रहे कार्यक्रमों या फिल्मों द्वारा एक घोषित सैक्स और हिंसा का युद्ध चलाया जाता रहा है। इसका उद्देश्य व्यभिचार, यौनिक लिप्सा और हिंसा को बढ़ावा देना है।

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हिंसा और सैक्स की कुंठाओं के पनपने पर एक आम व्यक्ति ऐसी कल्पना का ताना-बाना बुन लेता है जो टेलीविजन पर दिखाये जाने वाले दृश्य जैसी ही होती है। जब बार-बार यह कुंठित कल्पना दोहरायी जाती है तो फिर व्यक्ति के दिमाग में यह प्रयोग के रूप में दोहराने के अहसास को जीना चाहता है और यदि वह उसमें असफल रहता है तो फिर उसमें खालीपन और हीनता पनपने लगती है। इसी खालीपन को भरने के लिए व्यक्ति को जब भी मौका लगता है तो वह चूकना नहीं चाहता। कुंठा और हीनता से भरा हुआ व्यक्ति अपना विवेक छोड़ देता है और फिर सैक्स और हिंसा के वही खेल खेलने लगता है जो टेलीविजन पर उसने देखा था। अब विकसित समाजों की भोगवादी संस्कृति की विकृतियाँ हमारे यहाँ फैल रही है। सांस्कृतिक विलगन और आत्मनिर्वासन का संकट बढ़ रहा है। जिससे हमारी अस्मिता को ही गंभीर खतरा पैदा हो गया है। आर्थिक दोहन से अधिक बड़ा खतरा है – मानसिक तौर पर परावलंबी होते जाना, इसी कारण हमारा आत्मविश्वास और अभिक्रम क्षीण हो रहा है।

स्वदेशी चिकित्सा

भारत में जिस शास्त्र की मदद से निरोगी होकर जीवन व्यतीत करने का ज्ञान मिलता है उसे आयुर्वेद कहते है। आयुर्वेद में निरोगी होकर जीवन व्यतीत करना ही धर्म माना गया है। रोगी होकर लंबी आयु को प्राप्त करना या निरोगी होकर कम आयु को प्राप्त करना दोनों ही आयुर्वेद में मान्य नहीं है। इसलिए जो भी नागरिक अपने जीवन को निरोगी रखकर लंबी आयु चाहते हैं, उन सभी को आयुर्वेद के ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। निरोगी जीवन के बिना किसी को भी धन की प्राप्ति, सुख की प्राप्ति, धर्म की प्राप्ति नहीं हो सकती हैं। रोगी व्यक्ति किसी भी तरह का सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। रोगी व्यक्ति कोई भी कार्य करके ठीक से धन भी नहीं कमा सकता है। हमारा स्वस्थ शरीर ही सभी तरह के ज्ञान को प्राप्त कर सकता है। शरीर के नष्ट हो जाने पर संसार की सभी वस्तुएं बेकार हैं। यदि स्वस्थ शरीर है तो सभी प्रकार के सुखों का आनन्द लिया जा सकता है।

दुनिया में आयुर्वेद ही एक मात्र शास्त्र या चिकित्सा पद्धति है जो मनुष्य को निरोगी जीवन देने की गारंटी देता है। बाकी अन्य सभी चिकित्सा पद्धतियों में पहले बीमार बने फिर आपका इलाज किया जायेगा, लेकिन गारंटी कुछ भी नहीं है। आयुर्वेद एक शाश्वत एवं सातत्य वाला शास्त्र है। इसकी उत्पत्ति सृष्टि के रचयिता श्री ब्रह्माजी के द्वारा हुई ऐसा कहा जाता है। ब्रह्माजी ने आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया। श्री दक्ष प्रजापति ने यह ज्ञान अश्विनी कुमारों को दिया। उसके बाद यह ज्ञान देवताओं के राजा इन्द्र के पास पहुँचा। देवराज इन्द्र ने इस ज्ञान को ऋषियों-मुनियों जैसे आत्रेय, पुतर्वसु आदि को दिया। उसके बाद यह ज्ञान पृथ्वी पर फैलता चला गया। इस ज्ञान को पृथ्वी पर फैलाने वाले अनेक महान ऋषि एवं वैद्य हुए हैं। जो समय-समय पर आते रहे और लोगों को यह ज्ञान देते रहे हैं। जैसे चरक ऋषि, सुश्रुत, आत्रेय ऋषि, पुनर्वसु ऋषि, कश्यप ऋषि आदि। इसी श्रृंखला में एक महान ऋषि हुए वाग्भट्ट ऋषि जिन्होंने आयुर्वेद के ज्ञान को लोगों तक पहुँचाने का लिए एक शास्त्र की रचना की, जिसका नाम “अष्टांग हृदयम्”।

इस अष्टांग हृदयम् शास्त्र में लगभग 7000 श्लोक दिये गये हैं। ये श्लोक मनुष्य जीवन को पूरी तरह निरोगी बनाने के लिए हैं। प्रस्तुत पुस्तक में कुछ श्लोक, हिन्दी अनुवाद के साथ दिये जा

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रहे हैं। इन श्लोकों का सामान्य जीवन में अधिक से अधिक उपयोग हो सके इसके लिए विश्लेषण भी सरल भाषा में देने की कोशिश की गयी है।

भारत की जनसंख्या 127 करोड़ है व इनमें से 85% लोग शारीरिक/मानसिक रूप से बीमार हैं अर्थात् लगभग 105 करोड़ लोग बीमार हैं। 29 नवंबर 2011 की भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार भारत में डॉक्टरों और लोगों की संख्या का अनुपात 1:2000 है डॉक्टरों और बीमारों की संख्या का अनुपात 1:1600 है। एक दिन में एक डॉक्टर अधिक से अधिक 50 लोगों का इलाज कर सकता है अतः जब तक, भारत के सभी डॉक्टर एक दिन में 1600 रोगियों का इलाज ना करें तब तक भारत के हर रोगी को चिकित्सा उपलब्ध कराना संभव ही नहीं व अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार भारत के लगभग 80% लोगों की एक दिन की आय 20 रूपये हैं, इतनी सीमित व टुचपूंजी आय से किसी भी अच्छे सरकारी अथवा निजी अस्पतालों में भारत के इन 80% गरीब लोगों के लिए उपचार कराना असंभव ही है।

‘राजीव भाई’ को इस तथ्य का एहसास हो चुका था कि जब तक भारत का हर व्यक्ति अपनी बीमारी स्वयं ठीक ना करे तब तक भारत में रोगियों की संख्या घटेगी नहीं। इस संदर्भ में ‘राजीव भाई’ ने सन् 2007 में चेन्नई में चिकित्सा पर सात दिन का व्याख्यान दिया, इस व्याख्यान का उद्देश्य था कि हर व्यक्ति बिना डॉक्टर के व बिना एलोपैथिक, होम्योपैथिक अथवा आयुर्वेदिक औषधियों के अपनी बीमारी को स्वयं ठीक कर सके। इस पद्धति को स्वदेशी चिकित्सा की संज्ञा दी जिसके अंतर्गत राजीव भाई ने ऐसा विकल्प दिया जो सस्ता है एवं बीमारियों को स्थायी रूप से बिना किसी दुष्प्रभाव के ठीक करता है।

आज आप व हम जिस काल में जी रहे हैं शायद इतिहास का वह सबसे बुरा समय है। जो कुछ भी हम अनाज, दालें, सब्जी, फल आदि का सेवन कर रहे हैं वे सब विषयुक्त हैं। दूध, घी, तेल, मसाले आदि मिलावटी हैं, कुछ दवाईयाँ नकली हैं व जिस हवा से हम साँस लेते हैं वह दूषित है, जीवन तनाव व चिंता से भरा है। दूसरी ओर महंगाई इतनी बढ़तीजा रही है कि जहाँ पेट भरना कठिन होता जा रहा है वहाँ बीमार पड़ने पर मरते दम तक डॉक्टर की फीस, रोगों का परीक्षण व दवाई खरीदने में लगने वाले पैसे जुटा पाना असंभव सा

होता जा रहा है। ऐसे वातावरण में भी क्या हम निरोगी रह सकते हैं? इसका उत्तर है हाँ, और यदि हमें कोई दीर्घकालीन असाध्य बीमारी हो गई है तो क्या वह भी ठीक की जा सकती है? इसका भी उत्तर है हाँ। यह बहुत आवश्यक हो गया था कि रोग से मुक्त होने के लिए कोई सस्ता, प्रभावकारी व बिना किसी दुष्प्रभाव वाला विकल्प निकाला जाये व असाध्य और दीर्घकालीन रोगों से स्थायी रूप से मुक्ति पाई जाये।

बीमारियाँ दो प्रकार की होती हैं -

  1. 1. वे जिनकी उत्पत्ति किसी जीवाणु बैक्टीरिया, पैथोजन, वायरस, फंगस आदि से होती है, उदाहरणार्थ- क्षय रोग(टी.बी), टायफाईड, टिटनेस, मलेरिया, न्यूमोनिया आदि। इन बीमारियों के कारणों का पता परीक्षणों से आसानी से लग जाता है।

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  1. 2. वे जिनकी उत्पत्ति किसी भी जीवाणु, बैक्टीरिया, पैथोजन, वायरस, फंगस आदि से कभी भी नहीं होती। उदाहरणार्थ – अम्लपित्त, दमा, गठिया, जोड़ों का दर्द, कर्क रोग, कब्ज, बवासीर, मधुमेह, हृदय रोग, बवासीर, भगंदर, रक्तार्श, आधीसीसी, सिर दर्द, प्रोस्टेट आदि। इन बीमारियों के कारणों का पता नहीं लग पाता।

जब तक हमारे शरीर में वात, पित्त व कफ का एक प्राकृतिक विशिष्ट संतुलन रहता है, तब तक हम बीमार नहीं पड़ते, यह संतुलन बिगड़ने पर ही हम बीमार पड़ते हैं व यदि संतुलन कहीं ज्यादा बिगड़ जाये तो मृत्यु तक हो सकती है, बीमार होने के कारण निम्नलिखित हैं।

  1. 1. भोजन व पानी का सेवन प्राकृतिक नियमों के अनुसार न करना। इस गलती के कारण शरीर में 80 प्रकार के वात रोग, 40 प्रकार के पित्त रोग व 20 प्रकार के कफ रोग उत्पन्न होते हैं।
  2. 2. भोजन दिनचर्या व ऋतुचर्या के अनुसार ना करना
  3. 3. विरुद्ध आहार का सेवन
  4. 4. रिफाईंड तेल, रिफाईंड नमक, चीनी व मैदा आदि का सेवन
  5. 5. मिलावटी दूध, घी, मसाले, तेल इत्यादि का सेवन।
  6. 6. अनाज, दालें, फल, सब्जी इत्यादि में छिड़के गये रासायनिक खाद, कीटनाशक व जंतुनाशक इत्यादि का शरीर में पहुँचना।
  7. 7. प्राकृतिक/नैसर्गिक वेगों को (भूख, प्यास, मलमूत्र निष्कासन आदि) रोकना।
  8. 8. विकारों (क्रोध, द्वेष, अंहकार) आदि को पनपने देना।
  • ➤ यदि हम 24 घंटे का निरीक्षण करें तो यह पायेंगे कि 24 घंटों में नैसर्गिक भूख दिन में केवल 2 बार लगती है। सूर्योदय से 2 घंटे तक और दूसरी सूर्यास्त के पहले। पेट (जठर) सबेरे 7 बजे से 9 बजे तक अधिक कार्य क्षमता से काम करता है। उसी तरह सूर्यास्त से पहले हमारे पेट की जठर अग्नि तीव्र होती है। इसलिये भोजन सूर्यास्त के पहले समाप्त कर लेना चाहिए।
  • ➤ हमारे पूर्वज बहुत वैज्ञानिक थे, वे अच्छी तरह से उपवास के वैज्ञानिक महत्व को समझ चुके थे इसलिए उन्होंने समय-समय पर व विशेष रूप से बारिश के मौसम में धर्म को आधार बनाकर अधिक से अधिक उपवास करने की परंपरा स्थापित की। क्योंकि बारिश के तीन-चार महीने सूर्योदय ठीक से नहीं होता और सूर्योदय तथा भूख का गहरा नाता है। उपवास करने से यदि पेट घंटे बिना भोजन के कण के रखा जाये तो पेट साफ-सफाई की क्रिया प्रारंभ कर देता है। उपवास के दिन शरीर का तापमान 2 से 3 डिग्री सेण्टीग्रेड कम हो जाता है जिसके कारण हानिकारक जीवाणुओं की वृद्धि में बहुत कमी आ जाती है।
  • ➤ जन्म से लेकर 14 वर्ष की आयु तक हमारे शरीर में कफ की प्रधानता रहती है व कफ का स्थान शरीर में हृदय से सिर तक है, इस प्रधानता के अंतर्गत बहुत भूख लगती है व अधिक नींद भी आती है। आयु के 14 वर्ष से लेकर पचास वर्ष तक पित्त की प्रधानता रहती है व पित्त का स्थान हमारे शरीर में हृदय से नाभि तक है, इसी प्रकार आयु के 50 वर्ष से लेकर मृत्यु तक वात की प्रधानता रहती है व वात का स्थान शरीर में नाभि से नीचे पैरों तक है।

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  • ➤ हमारी पाचन संस्था में दो चक्कियाँ हैं जो भोजन को पीसकर इतना महीन बना देती है कि जिससे भोजन का प्रत्येक कण पाचक रस से संपूर्ण लिप्त होकर पूरी तरह से पच जाये। हली चक्की दाँत हैं जो भोजन को 80% तक पीसते हैं व दूसरी चक्की पेट का ऊपरी भाग हैं जिसे फंडस कहते हैं जो भोजन को केवल 20% ही पीस सकता है। यदि भोजन दाँतों की सहायता से ठीक से न चबाया जाये तो भोजन का काफी बड़ा भाग वैसे ही बिना पीसे रह जायेगा, ऐसे भोजन का पाचन ठीक से नहीं हो पायेगा। परिणामस्वरूप, कब्ज व बड़ी आँत से संबंधित अनेक बीमारियाँ पैदा होती हैं।
    • ➤ महर्षि वाग्भट के नियमानुसार जिस भोजन को पकाते समय सूर्य का प्रकाश व पवन का स्पर्श ना मिले वह भोजन विष के समान है। प्रेशर कुकर में भोजन पकाते समय सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता। भोजन पकते सूर्य का प्रकाश मिलने के लिए बर्तन को बिना ढके भोजन पकाना होगा और बिना ढके पकाने से हवा का दबाव सामान्य रहता है परिणामस्वरूप प्रोटीन खराब नहीं होते। प्रेशर कुकर के अंदर भोजन पकाते समय हवा का दबाव वातावरण से दुगुना हो जाता है व तापमान 120 डिग्री सेण्टीग्रेड तक पहुँच जाता है जिसके फलस्वरूप दाल और सब्जी के प्रोटीन हानिकारक प्रोटीन हो जाते हैं। 'राजीव भाई' ने प्रेशर कुकर में पकाई दाल का जब परीक्षण कराया तो यह पाया कि 87% प्रोटीन नष्ट हो जाते हैं व आरोग्य के लिए हानिकारक हो जाते हैं।
    • ➤ मिट्टी ऊष्णता की कुचालक है अतः मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से भोजन को धीरे-धीरे ऊष्णता प्राप्त होती है व परिणामस्वरूप भोजन के तत्व जैसे दाल-सब्जी आदि का प्रोटीन नहीं होने पाता व 100% प्रोटीन सुरक्षित रहते हैं। यदि काँसे के बर्तन में पकाया जाये तो कुछ प्रोटीन नष्ट हो जायेंगे व एल्युमीनियम के बर्तन में पकाने से 87% प्रोटीन आरोग्य के लिए हानिकारक हो जायेंगे और भोजन में कुछ एल्युमीनियम की मात्रा भी चली जायेगी जो अनेक बीमारियाँ भी उदाहरणार्थ- पार्किन्सन्स, एल्जाईमर आदि को उत्पन्न करेगी। मिट्टी के अंदर शरीर को आवश्यक सारे खनिज तत्व हैं। मिट्टी के बर्तन में भोजन पकाने से मिट्टी का कुछ अंश भोजन में चला जाता है व यह मिट्टी पेट में जाने के बाद घुल जाती है व मिट्टी में उपस्थित सारे तत्व भोजन पचने के बाद रस में मिल जाते हैं व रक्त में पहुँच जाते हैं इस प्रकार मल-मूत्र द्वारा होने वाला खनिजों के क्षति की पूर्ति रोज हो जाया करती है व शरीर निरोगी रहता है। मुख्यतः खनिजों की पूर्ति भोज्य पदार्थ(अनाज, दालें, फल, सब्जियाँ) आदि के द्वारा होती है।
    • ➤ सुबह उठते ही, पेशाब करने के बाद बिना मुँह धोए अपनी संतुष्टि तक पानी पियें। रात भर में हमारे मुख में Lysozyme नामक एक Antibiotic तैयार होता है शायद भगवान ने हमारी जीवाणुओं से रक्षा करने के लिए यह विधान बनाया हो। यह पानी पेट में जाकर पूरे पाचन संस्था को रोग के जीवाणु रहित कर देता है, दूसरे यह पूरे पाचन तंत्र को धोकर स्वच्छ कर देता है। कम से कम एक से दो ग्लास गुनगुना पानी पीना ही चाहिए। कई लोगों की धारणा है कि कम से कम आधे से एक लीटर पानी पियें पर अनुभव यह कहता है कि पानी की कोई

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मात्रा ना बांधी जाये। आपका अंतःकरण सबसे अच्छा डॉक्टर है और वह पानी की मात्रा मौसम व शारीरिक अवस्था के अनुसार निर्धारित करता है।

  • ➤ पानी खाना खाने के डेढ़ से दो घंटे के बाद ही अवश्य पीना चाहिए, क्योंकि खाना पचने के बाद वह एक रस में रूपान्तरित होता है। यह रस छोटी आँत में पहुँचने के बाद इसका रक्त में शोषण होता है और इस रस का शोषण यदि पानी वहाँ न हो तो हो ही नहीं सकता। भोजन के तुरन्त बाद और भोजन से तुरन्त पहले पानी पीना विष के समान है।
  • ➤ पानी गुनगुना ही पियें क्योंकि हमारे पाचन तंत्र का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस रहता है। यदि हम ठंडा पानी पी लें तो हमारे पेट को व पाचन तंत्र को फिर से 37 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करने के लिए आस-पास के किसी भी अवयव से अतिरिक्त रक्त लेना पड़ेगा। परिणाम स्वरूप जो अवयव अधिक बार रक्त भेजेगा वह अवयव (हार्ट, आंत, किडनी आदि) कमजोर हो जायेगा व उससे संबंधित रोग हो जायेंगे। गर्मियों में आप मिट्टी के घड़े का पानी अवश्य पी सकते हैं।
  • ➤ पानी खड़े हो कर ना पियें, बैठकर ही पियें व घूँट-घूँट पियें- क्योंकि जब हम ठोस पदार्थ निगलते हैं तो उसको मुख से पेट तक धीरे-धीरे एक क्रमांकुचन मूवमेंट द्वारा ही पेट तक पहुँचाया जाता है। वह मुख से पेट में धड़ाम से नहीं गिरता। लेकिन पानी जब मुख से पेट की ओर जाता है तो उसे रोकने वाला कोई नहीं, वह तो पहाड़ पर से जमीन पर गिरने वालों झरने की तरह गिरता है। उसी प्रकार यदि हम खड़े होकर पानी पीयें तो उसके धक्के को झेलने के लिए पेट डायफ्राम को कड़ा कर देता है। यदि हम बार-बार ऐसे ही पानी पीते रहें तो हमें हार्निया, पार्प्लस, प्रोस्टेट, अर्थरायटिस जैसी बीमारियाँ अवश्य होंगी।
  • ➤ हमारे शरीर में, नींद आना, भूख, प्यास, छींक, मल निष्कासन, मूत्र निष्कासन, पादना, खाँसी, हँसना, रोना, हिचकी आना, डकार आना, जम्हाई लेना इत्यादि चौदह प्रकार के वेग हैं। यदि इन वेगों को रोका गया तो अनेक प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। हमारी समझ में यह डाल दिया गया है (पाश्चात्य संस्कृति के द्वारा) कि जोर से इन वेगों का निकालना जंगलीपन या असभ्यता की निशानी है। इसीलिए आज कल खास करके लड़कियाँ/स्त्री वर्ग व कुछ आधुनिक कहलाने वाले युवक, कर्मचारी वर्ग छींकते, खाँसते इत्यादि समय कम से कम आवाज में व मुख पर रूमाल रखकर ही छींकते, खाँसते हैं, इस प्रकार के वेग शरीर की किसी नाड़ी तंत्र को दुरुस्त करने के लिए हैं और ये लोग उसके लाभ को 75% नष्ट कर देते हैं।
  • ➤ यह समस्या मल्टीनेशनल की देन हैं आज से कुछ दशकों पूर्व, जब यह मल्टीनेशनल का कल्चर भारत तक नहीं पहुँचा था, लोग सबेरे 10 बजे भरपेट खाना खाकर ऑफिस, स्कूल,

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कॉलेज आदि जाते थे व शाम को 6 बजे तक घर लौट कर भोजन कर लेते थे। उनका कार्यकाल अधिक से अधिक 8 घंटे हुआ करता था अतः वे निरोगी व दीर्घायु थे। आजकल मल्टीनेशनल ने अपने कार्यकाल को 8 घंटों से बढ़ाकर तेरह-चौदह घंटों तक कर दिया है और उनकी देखा-देखी भारत के सभी छोटे-बड़े उद्योग करने वालों ने भी कार्यकाल बढ़ा दिये, इसके अलावा खास करके शहरों में ऑफिस, स्कूल, कॉलेज, आने-जाने में दो से तीन घंटे अलग लग जाते हैं। जिसके कारण स्वस्थ मनुष्य के पास नींद, भोजन, स्नान, आदि के लिए लगभग 8 ही घंटे बचते हैं। अब ऐसे व्यक्तियों का स्वास्थ्य कैसा रहता है खुद ही सोच लो।। इसी कारण वह आरोग्य से काफी दूर होता जायेगा व दीर्घकालीन असाध्य रोग का शिकार हो जायेगा।

  • ➤ नमक बदल दो, रिफाइन्ड नमक कभी न खाए। बाजार में मिलने वाले नमक को रिफाइन्ड करने पर उसमें से पोषक तत्व निकल जाते हैं। आयोडिन नमक हमेशा ब्लड प्रेशर बढ़ाता है और नपुंसक बनाता है। वीर्य की ताकत कम करता है। खाने में सदैव काला नमक या सेंधा नमक ले, इसमें सोडियम की मात्रा कम होती है। मैग्नीशियम, कैल्शियम, पोटेशियम आदि का अनुपात बराबर होता है। सेंधा नमक शरीर के अंदर के विष को कम करता है और थाइराइड, लकवा एवं मिरगी जैसे रोगों को दूर रखता है।
  • ➤ चीनी ना खाये, चीनी बनते ही फोस्फोरस खत्म हो जाता है और एसिड बनता है। एसिड पचता नहीं, चीनी खून को गाढ़ा करती है और कोलेस्ट्रॉल बढ़ाती है। बिना सल्फर के चीनी नहीं बनती और पटाखों में भी सल्फर का इस्तेमाल होता है। अगर खाने के बाद चीनी खायी तो आपका भोजन पचने नहीं देगी और आपको 103 बीमारियाँ होने का खतरा बढ़ेगा।
  • ➤ रिफाइंड और डबल रिफाइंड तेल का उपयोग बिल्कुल ना करें, तेल को रिफाइंड करने के लिए उसमें से सारे प्रोटीन निकाल लिए जाते हैं। इसलिए आप शुद्ध चीज नहीं पर कचरा खाते हैं। रिफाइंड तेल काफी रोगों का कारण बनता है। इस तेल में पाम तेल भी डाला जाता है जो खतरनाक है। खाने में हमेशा शुद्ध तेल का इस्तेमाल करें। घाणी का तेल खाने में श्रेष्ठ है। शुद्ध तेल वायु को शांत करने में मदद करता है।
  • ➤ मैदा से बनी वस्तुओं का सेवन कभी ना करें, मैदा गेहूँ से ही बनता है पर मैदे में से सारे आवश्यक फाइबर निकाल लिए जाते हैं। नूडल्स, पिज्जा, बर्गर, पाँव रोटी, डबल रोटी, बिस्कुट वगैरह कभी ना खाये, जो सड़े हुए मैदे से बनते हैं। मैदे की रोटी रबर जैसी होती है जो खाने के बाद आँतों में चिपक जाती है। जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।

निरोगी रहने के महामंत्र

  1. 1. सुबह उठते ही बासी मुँह से जितना ज्यादा पी सको गुनगुना पानी पीए।
  2. 2. जब भी पानी पीये नीचे बैठ कर एक-एक घूँट मुँह में गोल गोल घुमा के पीए।

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  1. 3. भोजन बनाते समय सूर्य प्रकाश और पवन का स्पर्श भोजन को जरूर मिलना चाहिए।
  2. 4. भोजन पकने के बाद जितना जल्दी हो सके उसका उपभोग हो जाना चाहिए।
  3. 5. सुबह का भोजन सूर्योदय से ढाई घंटे के अंदर करें, जो सबसे ज्यादा पंसद है वो खाये। दोपहर का भोजन सुबह से थोड़ा कम करें। शाम का भोजन सूर्यास्त होने से पहले बिल्कुल कम करें (ना ही करे तो अच्छा)।
  4. 6. खाने के 45 मिनट पहले और खाने के डेढ़ घंटे बाद तक पानी ना पीए।
  5. 7. खाने के बाद सुबह किसी भी फल का रस, दोपहर को छाछ और रात को देशी गाय का दूध पीए।
  6. 8. हमेशा संधा नमक का रसोई में उपयोग करे। इससे शरीर को बहुत से पोषक तत्व मिलते हैं।
  7. 9. भोजन में मैदे का उपयोग ना करें। गेहूँ का आटा 10 दिन और मकाई, बाजरा और जुआर का आटा सात दिन से पुराना ना खाये।
  8. 10. सुबह और दोपहर का भोजन करके 10 मिनट वज्रासन में बैठे और 20-25 मिनट वाम कुक्षी (बायीं ओर) अवस्था में सोये। इससे भोजन पचता है और काम करने की क्षमता बढ़ती है।
  9. 11. ठंडे पेय, शराब और चाय ना पीए, उसकी जगह पीने पिलाने की बहुत सी चीजे हैं। जैसे नींबू पानी, नारियल पानी, संतरे का जूस आदि।
  10. 12. सोते समय पारिवारिक व्यक्ति को दक्षिण दिशा में सन्यासी, ब्रह्मचारी और विद्यार्थी को पूर्व दिशा में सर रखकर सोना चाहिए
  11. 13. भोजन खूब चबा चबा कर करे। आयुर्वेद में निवाले को 32 बार चबाने का विधान है।
  12. 14. घर में एल्युमीनियम के बर्तनों का उपयोग ना करें। उसकी जगह मिट्टी के बर्तन या तांबे, पित्तल, लोहे और स्टील का उपयोग कर सकते है।
  13. 15. भोजन के बाद बिना सुपारी, बिना तंबाकू और बिना कल्था का पान जरूर खाये। ये कफ, वात और पित्त को बराबर रखता है।
  14. 16. 40 साल की उम्र के बाद हर व्यक्ति को गेहूँ के दाने जितना चूना, पानी या छाछ या दही के साथ जरूर लेना चाहिए। चूना वात के रोगो का नाश करता है। इससे कमर, घुटने व जोड़ों के दर्द नहीं होते। (पथरी वाले चूना ना खाये।)

कुछ आवश्यक बातें –

  • • बीमारी जितनी देर से आती हैं उतनी ही देर से जाती हैं।
  • • सदैव ठण्डे पानी से नहाना चाहिए और गुनगुना पानी पीना चाहिए
  • • जिन लोगों का ब्लड प्रेशर कम हैं उन लोगों के लिए चाय औषधि हैं और जिन लोगों का ब्लड प्रेशर सामान्य या अधिक होता हैं उनके लिए चाय विष के समान हैं।
  • • दही में नमक मिलाकर कभी न खायें नमक मिलाने से दही के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, दही में गुड़ डालकर खाना चाहिए।
  • • फ्रिज में रखे हुए भोजन को फिर कभी वापस गर्म ना करें। फ्रिज में रखी वस्तु को फ्रिज से 50 मिनट बाहर रखकर उपयोग में लें या खायें।

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  • • सब्जी, दाल या अन्य खाने की वस्तुओं में बाद में नमक डालने से ब्लड प्रेशर बढ़ता है।
    • • घर जितना खुला होगा दिल दिमाग उतना ही अच्छा रहेगा।
    • • बालों में नारियल तेल अवश्य लगाये।

रोग एवं उनके उपचार

  • मुधमेह – दो चम्मच मेथी के दाने दो गिलास पानी में रात को डालकर सुबह-सुबह बासी मुँह घूँट मार-मार कर पी लें, मेथी दाना चबा-चबा कर खाइये। यदि डायबिटी ज्यादा है तो करेले के बीज और जामुन की गुठली का पाउडर बना लें और गर्म पानी के साथ एक चम्मच ले, रात में दूध के साथ त्रिफला चूर्ण खायें।
  • कैंसर – देशी गाय का मूत्र आधा कप, आधा चम्मच हल्दी इतना गर्म करना उबाल ना आये फिर चाय की तरह पिलाना, पुनर्वा आधा चम्मच मिलाकर काँच की बोटल में आधा या एक लीटर बना कर रखे। फ्रिज व धूप में ना रखे।
  • पथरी - पाषाण भेद का काढ़ा 15-20 दिन पिये, या फिर बर्बेरिस-वल्लोरीस (होम्योपैथिक) दवा की 10-15 बूँद एक कप पानी में डालकर दिन में चार बार ले। पथरी जिसको है वह चूना ना खाये।
  • अर्थराइटिस (जोड़ों का दर्द) – चूना और मेथी दाना खाइये प्रतिदिन सुबह, हारसिंगार का पौधा जिसे रात की रानी भी कहते हैं, फूल सफेद और नारंगी डण्डी आती हैं, 6-7 पत्ते पीसकर एक गिलास पानी में आधा गिलास पानी रहने तक खूब गर्म करना, रत को ही बनाकर रख लें, सुबह-सुबह खाली पेट घूँट मारकर पी लें, 10-12 दिन में आराम हो जायेगा।
  • बवासीर, पाईल्स, फिस्टुला, भगन्दर - एक कप मूली का रस खाने के बाद पी लें। दोपहर के खाने के बाद छाछ में पाव चम्मच सौंठ डालकर पीयें।
  • सर्दी, खाँसी, जुकाम - अदरक, सौंठ, हल्दी, चूना, किशमिश, दालचीनी, काली मिर्च, तुलसी, गुड़, शहद आदि कई औषधियाँ इन रोगों में काम आती हैं।
  • टॉन्सिल – 1 चम्मच हल्दी मुँह में डालकर उसे लार के साथ पेट में जाने दे।
  • कब्ज, ऐसीडिटी – एक चम्मच गुड़ के साथ आधा चम्मच कच्ची अजवाईन रात को सोने से पहले लें ऊपर से गर्म पानी पियें। या फिर दूध में गाय का घी व त्रिफला चूर्ण लें।
  • कमरदर्द, घुटनों का दर्द, गठिया – सौंठ+हल्दी+मेथी दाना बराबर मात्रा में लेकर तीनों पीस कर पाउडर बना लें, एक चम्मच सुबह खाली पेट लें, ऊपर से हल्का गर्म पानी पिये।
  • दस्त, डायरिया – आधा चम्मच कच्चा जीरा चबाकर खायें फिर पानी पी लें।
  • चिकनगुनिया, डेंगू, ब्रेन मलेरिया - हारश्रिंगार के 5 पत्ते पीसकर एक गिलास पानी में गर्म करके पीये।

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  • बुखार – काली तुलसी, अदरक, गुड़, हल्दी का रस खराब से खराब बुखार उतार देता है।
    • पित्त बढ़ने पर – देशी गाय का घी, अजवाइन व काला नमक का सेवन करें।
    • थायराइड - ताजी हरी धनिया की चटनी बिना नमक मसाले के बनाकर खाओ।
    • अनिद्रा - गाय का घी गर्म करके नाक में डालें।
    • रक्त की अम्लता बढ़ने पर – क्षारीय चीजें खायें – मेथी, गाजर, फल जिसमें रस नहीं होते जैसे – सेव, केला, अमरूद, सब्जी-पालक, बैंगन, लौकी।
    • लो ब्लड प्रेशर - काला नमक पानी में जालकर दिन में 4 बार पियें।
    • अस्थमा – एक चम्मच दालचीनी शहद के साथ या गुड़ के साथ मसल कर लें।
    • छालें - बड़ी आँत की सफाई करें सुहागा आँत को सबसे तेजी से साफ करता है।
    • कफ नाशक - पान का पत्ता, शहद, गुड़ खाइये।
    • छोंक - नाक में गाय का घी डालें।
    • बिस्तक पर पेशाब - दूध में 8-10 खजूर डालकर उबालकर पीयें।

सुबह की बासी लार से उपचार –

  • ➤ ना भरने वाले घाव भरेंगे।
  • ➤ आँखों में लगाने से चश्मे का नम्बर 4-6 महीने में उतर जायेगा।
  • ➤ भेगापन, मोतियाबिंद, रेटीना की कोई तकलीफ, आँखों में पानी आना, आँखे लाल रहना, आँखों में खजली आना आदि।
  • ➤ घाव, फोड़े-फुंसी, आँखे त्वचा के रोग, दाद, जले हुए धब्बे सारे रोग बासी लार से ठीक हो जाते हैं।

सौन्दर्य चिकित्सा

  • स्नान के लिए – पाव कटोरी कच्चा दूध में आधा नींबू निचोड़ लें, दूध गाढ़ा हो जायेगा। शरीर पर साबुन की तरह लगा लें, फिर पानी से नहा लें, त्वचा मुलायम रहेगी व शरीर के अंदर का सारा कचरा निकल जायेगा।
  • दाढी बनाने के लिए – हल्के गर्म पानी से गाल पर मालिश करें फिर कच्चा दूध गाल पर लगाकर दाढ़ी बनायें।
  • मुहासों के लिए – ग्लिसरीन, नींबू का रस तथा गुलाब जल बराबर मात्रा में मिलाकर शीशी में भर लें, प्रतिदिन हल्की हल्की मालिश करें

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  • डैन्ड्रफ के लिए – नींबू के रस में थोड़ा गुड़ मिलाकर सर में लगाओं डैन्ड्रफ निकल जायेगा।
    • बाल टूटते हैं - ताँबे के बर्तन में 5-6 दिन दही रखे, जब ये हरी हो जाये तो सर पर मालिश करे और एक घंटे बाद शिकाकाई से धो लें।

स्वदेशी शिक्षा

अपनी विलक्षण शिक्षापद्धति के बलबूते पर ही भारत ने हजारों वर्षों तक विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व किया हैं। तदुपरांत उद्योग-व्यवसाय, कला-कौशल्य और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी वह अग्रगण्य रहा है।

भारतीय ऋषियों ने पदार्थों की रचना का विश्लेषण किया और आत्मतत्व का भी साक्षात्कार किया। उन्होंने तर्क, व्याकरण, खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र, तत्वज्ञान, औषधिविज्ञान, शरीर-रचना- विज्ञान और गणित जैसे गहन विषयों की रचना की। भारतीय शिक्षा का वटवृक्ष उन्होंने धर्म, नीति और ज्ञान के खाद और जल से सींचा था। इसलिए ही तत्कालीन समाज धार्मिक, नीतिमान् और बुद्धिमान् बन सका था। भारतीय समाज के नैतिक गुणों के विषय में ई.स. पूर्व 300 में ग्रीक राजदूत मॅगस्थनीज ने लिखा है, 'कोई भी भारतीय असत्य बोलने का अपराधी नहीं है। सत्यवादिता और सदाचार उनकी दृष्टि में अतीव मूल्यवान वस्तु है' इस प्रकार भारतीय शिक्षापद्धति द्वारा भारत ने केवल ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, परंतु नीतिमत्ता, प्रामाणिकता और सदाचार की दृष्टि से भी नेत्रदीपक विकास किया था।

हमारी भारतीय आर्य पंरपरा में विद्या प्राप्ति की मुख्य व्यवस्था के रूप में गुरुकुलम् एवं पाठशालाएँ केन्द्र स्थान पर थे। सांदीपनि ऋषि के तपोवन में श्रीकृष्ण और सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी। वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋषि के विद्याश्रम भी प्रसिद्ध थे। तप-स्वाध्याय में निरत ऐसे ऋषि ही बच्चों को शिक्षा प्रदान करते थे। उन ऋषियों के संस्कारित जीवन की महक गुरुकुल के सभी विद्यार्थियों के जीवन को सुगंधित कर देती थी। ऐसी शिक्षा पद्धति के विकसित उदाहरण थे, विश्वप्रसिद्ध नालन्दा और तक्षशिला जैसे विश्व विद्यालय। इसके अलावा वल्लभी, विक्रमशिला, ओदन्तपुरी, मिथिला, काशी, कश्मीर और उज्जैन आदि विश्वविद्यालय भी विख्यात शिक्षा केन्द्र थे।

तत्कालीन राजा महाराजा – श्रेष्ठजनों ने अपनी विपुल सम्पत्ति का अनुदान दे कर भारत के ऐसे विराट सरस्वती मंदिरों की स्थापना करने में अपना सहयोग प्रदान किया था। ऐसे विश्वविद्यालयों में

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हजारों की संख्या में विद्यार्थी विविध विषयों का अभ्यास करते थे और विश्वविद्यालय की कीर्तिपताका समूचे विश्व में लहराते थे। भारत के विश्वविद्यालयों में भारत के ही नहीं बल्कि तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, और श्रीलंका जैसे देशों के भी ज्ञान – इच्छुक विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे।

हमारे प्राचीन भारत में शत-प्रतिशत साक्षरता थी। भारत के हर गाँव में एक पाठशाला थी, जहाँ पर सभी वर्ण के बालक एवं बालिकाएँ प्राथमिक अक्षरज्ञान और धर्मनीति की शिक्षा प्राप्त करते थे। पाठशाला चाहे वह गुजरात की हो या बंगाल की, कश्मीर की हो या तमिलनाडू की, सभी पाठशालाओं की शिक्षा का एकमेव विशिष्ट उद्देश्य था – ‘मानव के व्यक्तित्व का उच्चतम विकास’। भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में भारतीय विद्यालयों ने ऐसे ज्ञान का अविष्कार किया की जिस के आगे समूचे विश्व के दार्शनिक और वैज्ञानिक भी नतमस्तक थे।

आज से 200 वर्ष पहले तक जिस प्रकार की उत्तम शिक्षा भारत में दी जाती थी, वैसी विश्व के किसी भी देश में नहीं दी जाती थी। अंग्रेजों के आगमन से पहले शिक्षा और विद्या प्रचार के क्षेत्र में भारत दुनिया के देशों में सबसे अग्रणी माना जाता था।

लेकिन मनुष्य के आंतरिक गुणों के उजागर कर के उस के दोषों का निर्मूलन करने वाली महान भारतीय शिक्षा प्रणाली को विदेशी आक्रमणों का कुठाराघात सहना पड़ा। मुसलमानों के शासनकाल के दौरान भारत के शिक्षाकेन्द्र, गृहशाला, पाठशाला, विद्यालय इत्यादि नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए। फिर भी मुस्लिम शासक – बाबर से लेकर औरंगजेब तक भारतीय शिक्षण व्यवस्था को इतना नुकसान नहीं पहुँचा सके, जितना अंग्रेजों ने पहुँचाया। अंग्रेजों ने मुसलमान शासकों की तरह न तो पाठशाला जलाई, न विद्यालय गिरा कर ध्वस्त किये, परंतु जैसे कोई गुप्तचर गुप्त वेष में शत्रु राज्य में जासूसी करने के लिए प्रवेश करता है, वैसे ही भारत की शिक्षाप्रणाली में प्रविष्ट हुए।

अंग्रेजों की इस कुटिलनीति का प्रधान चालबाज खिलाड़ी था मैकाले। उस की अनर्थकारी आधुनिकता शिक्षाप्रणाली की सफलता के परिणाम दिखाते हुए उसने कहा था कि, ‘अंग्रेजी शिक्षापद्धति द्वारा भारतीय केवल नाम का ही भारतीय रहेगा, शरीर से ही भारतवासी होगा, किन्तु मन से, विचार से, वचन और

आचरण से वह पूरा अंग्रेज ही बन जायेगा। ‘इस विचार को, पद्धति को, क्रियान्वित करने के लिए प्राचीन पाठशाला (गुरुकुलम्) पद्धति का विनाश करना अनिवार्य था। इसलिए शकुनी नीति से गाँव-गाँव में चल रहे विद्यालय बंद करवा दिए। प्राचीन शिक्षा का सामाजिक एवं राजकीय मूल्य ही नष्ट कर दिए। इस प्रकार गुरुकुल शिक्षा पद्धति नष्टप्रायः हो गई। फलतः भारत में उत्तम मनुष्य, राष्ट्रभक्त, नीतिमान्, प्रामाणिक व्यक्ति दुर्लभ हो गये और अंग्रेजी शिक्षापद्धति के ढाँचे में ढले हुए निकृष्ट, व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी, रोगी और अप्रामाणिक व्यक्ति, जो परोक्ष रूप से अंग्रेजीयत के समर्थक थे, ऐसे लोग देश का, समाज का नेतृत्व करने लगे तो रही –सही प्राचीन शिक्षाप्रणाली भी नेस्तनाबूत हो गई।

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ध्वस्त हुई प्राचीन शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित किए बिना भारतीय प्रजा एवं संस्कृति का समुद्धार असम्भव है।

अतः इस परम्परा को पुनः प्रस्थापित करनी ही चाहिए। तभी, मैकाले-शिक्षा के दुष्प्रभाव से हमारे देश में आज जो दुर्दशा हुई है, उस से हम भारत को बचा पाएंगे।

अंधेरे में जाती भारत की शिक्षा प्रणाली

वर्तमान की सभी समस्याओं का मूल आधुनिक शिक्षा-प्रणाली ही है। इस शिक्षा को लेने वाले जैसे-जैसे बढ़ते गए... वैसे-वैसे गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, मंहगाई, अनीति, अपराध, आत्महत्याएं, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, अनाचार और बलात्कारों की संख्या बढ़ती गई। वायु, जल, जमीन, जंगल और जानवर सभी आज दूषित हैं। ऐसी भयावह दुर्दशा के सूत्रधार प्रायः मैकाले-शिक्षण प्राप्त शिक्षित ही होते हैं।

आज से दो सौ साल पूर्व तक जो देश विश्व में शिक्षित माने जाने वाले देशों में अग्रसर था, जो विश्व का अग्रगण्य कृषिप्रधान और प्रथम स्तर का उद्योगप्रधान देश था, वही अंग्रेजों के 150 साल के शासन के बाद शिक्षा की दृष्टि से सबसे पिछड़ गया। औद्योगिक रूप से वह टूट गया, बेकारों और बीमारों से भरा देश बन गया। हम अपनी मातृभाषा में शिक्षा देने के बजाय अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने में गौरव महसूस करते हैं। अपने प्रदेश की भाषाओं की लड़ाई में एक दूसरे का गला घोंटने या भारत संघ में से अलग हो जाने के लिए उतारू हो गए हैं। विदेशियों से प्राप्त कर्ज आदि को विदेशियों की सहानुभूति, सद्भावना और सहायता के रूप में स्वीकृत करते हैं। विदेशियों की सहायता बिना कुछ भी कर पाने में असमर्थ प्रमाणित हुए हैं।

भारतीय शिक्षा पद्धति सर्वोत्तम और मोक्षदायिनी थी। उसका प्रसार प्रत्येक घर में था। हमारी शिक्षा के विषय में पूरी जानकारी इकट्ठा करने के बाद, उसे खत्म कर, उन्होंने हिंसक, जुगुप्साप्रेरक, शोषक और विकसलक्षी शिक्षारूपी शस्त्र का हम पर एक प्रयोग किया है जिसे 'मोहास्त' कह सकते हैं। हम उससे द मोहित होकर उसके चक्कर में फँस गए हैं फिर भी उसमें गौरव मानते हैं।

हमारा देश आजाद हुआ, तब देश में 40 लाख लोग बेकार थे। उसके बाद लोगों को रोजगार देने के नाम पर 14,916 करोड़ रूपयों की लागत से कारखाने बनाए गए। बेकारों की संख्या 40 लाख से बढ़कर 4 करोड़ तक पहुँच गई। इन फैक्ट्रियों में मानव संसाधन पूरा करने के लिए समग्र प्रजा पर शिक्षा का राक्षसी और निर्धक बोझ डाला गया। देश के लाखों आशावान् युवकों को आज भी हताश बनाकर बेकारी, बीमारी, अपराध और मंहगाई से पीड़ित समाज में धकेल दिया जाता है।

बढ़ती हुई बेकारी के इस प्रवाह का कारण जनसंख्या वृद्धि बताकर आत्म-प्रवंचना करना सरकार का पुराना शगल है। क्योंकि आबादी में बढ़ावा 50 प्रतिशत है जबकि पब्लिक सैक्टर के ही औद्योगिक कारखानों में पूंजी लगाने का वृद्धि प्रमाण 358 प्रतिशत और बेकारी की वृद्धि 900 प्रतिशत है।

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ग्रामीण बच्चों का अधिकांश वर्ग किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण कारीगरों द्वारा बना हुआ है। उन्हें अपने पैतृक धंधे करने होते हैं। इन धंधों को छोड़कर व उन उपाधियों के पीछे दौड़ेगें तो बेकारी का बोलबाला हो जाएगा और कृषि, पशुपालन और ग्रामीण उद्योग नष्ट हो जाएँगे, जो अंधेरगर्दी में परिणत हो सकता है और राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। राष्ट्र को पालने, पोषने और प्रजा की जीवन-जरूरतें पूरी करने का कर्तव्य इन बच्चों को ही निभाना होगा। इस कार्य में उन्हें कॉलेज की उपाधियाँ किसी काम में की नहीं आती। उन्हें कृषि और पशुपालन सीखना हो तो B.Ag. या Veterinary Surgeon की उपाधि लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।

❖ दुनिया में सबसे ज्यादा बेरहम और अमानवीय जाहिर है, ऐसे माँ-बाप आपको हिन्दुस्तान में मिलेंगे।

माँ-बाप आपको कहाँ मिलेंगे? मिलेंगे और सरप्लस में

❖ इन माँ-बापों के पास ढेर सारा पैसा है और ढेर अगर दुनिया में किसी चीज के बारे में सबसे कम जानते हैं, तो अपने बच्चों के बारे में।

सारी मूर्खताएँ हैं। ये माँ-बाप

❖ जैसे, माँ-बाप नहीं जानते कि उनके बच्चों के लिए धूप में रहना बहुत जरूरी है। विटामिन, टॉनिक या सिरप से नहीं, कुदरत से मिलता है और मुफ्त मिलता है।

❖ बच्चा मिट्टी में नहीं खेलेगा, तो बड़ा कैसे होगा? स्वस्थ कैसे रहेगा? बच्चे के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण मिट्टी से होता है। बच्चों को मिट्टी से दूर रखना, बच्चों के साथ दुश्मनी निभाना है।

❖ मौजूदा लाइफ़ स्टाइल का मंत्र है – बच्चे को धूप से दूर रखिए, हवा से दूर रखिए, मिट्टी से दूर रखिए। जी हाँ, अब तो दो साल के बच्चों के लिए जिम खुल गए हैं।

❖ बच्चे को किस उम्र में स्कूल भेजना चाहिए? अपने बचपन के सबसे बेहतरीन चार-पाँच साल, बच्चों के खेलने, मस्ती करने और खाने-पीने के होते हैं। बच्चों का सबसे अनमोल समय उनके माँ-बाप उनसे छीन लेते हैं। प्ले ग्रुप, नर्सरी, जूनियर केजी, सीनियर केजी, स्कैटिंग, डान्स क्लास, चित्रकारी यानी लिस्ट बहुत लम्बी है। तीन साल के बच्चे को गर्मागर्म खाने के बदले टिफिन का खाना?

❖ प्ले ग्रुप से फ़र्स्ट स्टैंडर्ड तक की पाँच साल की यह कवायद बच्चे को कहाँ ले जाती है? बच्चे गिनती या पहाड़े नहीं सीख पाते, लेकिन टीवी पर आने वाला हर विज्ञापन उन्हें याद रहता है। उन्हें पता चल जाता है कि रोटी-सब्जी नहीं, पिज्जा-बर्गर उनका भोजन है।

❖ लड़कियाँ 'प्रियंका चोपड़ा' बनना चाहती है और लड़के ऋतिक रोशन। चार साल का बच्चा मेकडोनलड में जाने के लिए घर सर पर उठा लेता है। पाँच साल की स्वीट बच्ची अभी से फेयर और लवली की डिमांड करती है।

❖ किताबों का बोझ, ट्यूशन, बर्थ-डे पर हर रोज मिलने वाली चॉकलेट, कभी मदर्स डे, तो कभी फादर्स डे, वन डे पिकनिक, चक्करदार फैशन प्रतियोगिताएँ और ऐसी ही ढेर सारी चीजों का अंबार लगा है बच्चों की दुनिया में। सिर्फ़ एक चीज गायब है – 'बचपन'।

❖ कागज की कशती नदी में बहाने नहीं ले जाता कोई। छत पर चाँद दिखाने नहीं ले जाता कोई। लोरी गाकर नहीं सुलाता कोई। गुड़ का गर्म शीरा नहीं खिलाता कोई। न नानी की कहानियाएँ

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याद रही और दादाजी के भूने हुए चने खाने की आदत छूट गई। बच्चे समय की रफ्तार से तेज भाग रहें हैं। बहुत तेज, अपने माँ-बाप की पकड़ से दूर।।

बच्चों की शिक्षा कैसी हो?

बच्चों का दखिला ऐसे स्कूल में न करायें जिसमें होमवर्क बच्चों को ज्यादा मिलता है। बच्चे स्कूल के होमवर्क, ट्यूशन के होमवर्क, घर के होमवर्क के आगे कुछ सोच नहीं पाते हैं,

जिससे उनका मानसिक विकास रुक जाता है। बच्चों को जो होमवर्क में मिलता है जीवन में वह कभी काम नहीं आता है। ऐसे स्कूल में दाखिले से अच्छा नगर परिषद, जिला परिषद के स्कूलों में पढ़ाये। हमारे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति ऐ.पी.जे. अब्दुल कलाम जिला परिषद के स्कूल में पढ़े थे। जब गाँव में थे तो ग्राम पंचायत के स्कूल में पढ़े, नगर परिषद के स्कूल में पढ़े। अब्दुल कलाम कभी कॉन्वेंट स्कूल में नहीं पढ़े और भारत के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में उनका नाम है। पढ़ाई से वैज्ञानिक होने का कोई संबंध नहीं है। वैज्ञानिक होने का संबंध दिमाग से है। आप का दिमाग कितना फ्री है कि चिन्तन कर सकता है, उसी से वह वैज्ञानिक बनता है। ज्यादा पढ़ाई करके, बहुत होमवर्क करके दुनिया में कोई भी वैज्ञानिक नहीं हुआ। आइन्स्टाइन, न्यूटन, एडिसन का नाम सुना है आपने, ये सब स्कूल से भागे हुए थे या स्कूल से निकाल दिये गये थे। आइन्स्टाइन ने कक्षा 9 में स्कूल छोड़ दिया, न्यूटन ने कक्षा 8 में स्कूल छोड़ दिया, एडिसन को स्कूल से कक्षा 3 में निकाल दिया था। मैक्सवेल बहुत बड़ा वैज्ञानिक था कक्षा 7 से ही स्कूल छोड़कर भाग गया था। जबच्चों का स्वतंत्र चिन्तन होता है वही वैज्ञानिक बन सकते हैं। स्कूल की पढ़ाई का बच्चों को जीवन में कोई लाभ नहीं मिलता है फिर भी सबकुछ चल रहा है। बच्चों से किसी को कोई मतलब नहीं है, न तो स्कूल को, न स्कूल के टीचर को और न ही बच्चों के गार्जियन को। सब अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं। इसलिए आप अपने बच्चों को ऐसी शाला में भर्ती करवाइये जहां बच्चा स्वतंत्र चिन्त कर सके, ज्यादा खेले-कूदे, जहाँ बच्चे के ऊपर होमवर्क का भार नहीं हो या कम हो। क्षेत्रीय भाषा या हिन्दी माध्यम के स्कूल में भर्ती करवाइये। अंग्रेजी माध्यम में कभी भर्ती मत करवाइये। बच्चों के ऊपर अंग्रेजी माध्यम की इतनी तकलीफ होती है कि बच्चों का सबसे ज्यादा समय ट्रांसलेशन में बीत जाता है। घर की अपनी भाषा है और स्कूल की अंग्रेजी भाषा है तो हर बार बच्चा अपनी भाषा से अंग्रेजी भाषा में ट्रांसलेशन ही करता रह जायेगा। इसी में बच्चे के जीवन का महत्वपूर्ण समय निकल जाता है। पांचवी कक्षा तक अपनी क्षेत्रीय भाषा ही सिखाइये। जब बच्चे की उम्र 10 से 12 वर्ष की हो जाये तब अंग्रेजी सिखाइये, लेकिन माध्यम के रूप में नही भाषा के रूप में। अंग्रेजी माध्यम कभी अच्छा नहीं है।

बच्चों में नंबर लाने के लिए कभी भी दूसरे बच्चे से तुलना मत कीजिए कि किसी बच्चों का 90 प्रतिशत नंबर आता है और तुम्हारा 70 प्रतिशत नंबर आता है। बच्चों की तुलना इसलिए नही करनी चाहिए कि हर बच्चा अपने आप में यूनिक होता है, विशेष होता है। 90 प्रतिशत नंबर पाने वाले बच्चे

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