भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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  • डैन्ड्रफ के लिए – नींबू के रस में थोड़ा गुड़ मिलाकर सर में लगाओं डैन्ड्रफ निकल जायेगा।
    • बाल टूटते हैं - ताँबे के बर्तन में 5-6 दिन दही रखे, जब ये हरी हो जाये तो सर पर मालिश करे और एक घंटे बाद शिकाकाई से धो लें।

स्वदेशी शिक्षा

अपनी विलक्षण शिक्षापद्धति के बलबूते पर ही भारत ने हजारों वर्षों तक विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व किया हैं। तदुपरांत उद्योग-व्यवसाय, कला-कौशल्य और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी वह अग्रगण्य रहा है।

भारतीय ऋषियों ने पदार्थों की रचना का विश्लेषण किया और आत्मतत्व का भी साक्षात्कार किया। उन्होंने तर्क, व्याकरण, खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र, तत्वज्ञान, औषधिविज्ञान, शरीर-रचना- विज्ञान और गणित जैसे गहन विषयों की रचना की। भारतीय शिक्षा का वटवृक्ष उन्होंने धर्म, नीति और ज्ञान के खाद और जल से सींचा था। इसलिए ही तत्कालीन समाज धार्मिक, नीतिमान् और बुद्धिमान् बन सका था। भारतीय समाज के नैतिक गुणों के विषय में ई.स. पूर्व 300 में ग्रीक राजदूत मॅगस्थनीज ने लिखा है, 'कोई भी भारतीय असत्य बोलने का अपराधी नहीं है। सत्यवादिता और सदाचार उनकी दृष्टि में अतीव मूल्यवान वस्तु है' इस प्रकार भारतीय शिक्षापद्धति द्वारा भारत ने केवल ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, परंतु नीतिमत्ता, प्रामाणिकता और सदाचार की दृष्टि से भी नेत्रदीपक विकास किया था।

हमारी भारतीय आर्य पंरपरा में विद्या प्राप्ति की मुख्य व्यवस्था के रूप में गुरुकुलम् एवं पाठशालाएँ केन्द्र स्थान पर थे। सांदीपनि ऋषि के तपोवन में श्रीकृष्ण और सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी। वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋषि के विद्याश्रम भी प्रसिद्ध थे। तप-स्वाध्याय में निरत ऐसे ऋषि ही बच्चों को शिक्षा प्रदान करते थे। उन ऋषियों के संस्कारित जीवन की महक गुरुकुल के सभी विद्यार्थियों के जीवन को सुगंधित कर देती थी। ऐसी शिक्षा पद्धति के विकसित उदाहरण थे, विश्वप्रसिद्ध नालन्दा और तक्षशिला जैसे विश्व विद्यालय। इसके अलावा वल्लभी, विक्रमशिला, ओदन्तपुरी, मिथिला, काशी, कश्मीर और उज्जैन आदि विश्वविद्यालय भी विख्यात शिक्षा केन्द्र थे।

तत्कालीन राजा महाराजा – श्रेष्ठजनों ने अपनी विपुल सम्पत्ति का अनुदान दे कर भारत के ऐसे विराट सरस्वती मंदिरों की स्थापना करने में अपना सहयोग प्रदान किया था। ऐसे विश्वविद्यालयों में

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