भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ
  • डैन्ड्रफ के लिए – नींबू के रस में थोड़ा गुड़ मिलाकर सर में लगाओं डैन्ड्रफ निकल जायेगा।
    • बाल टूटते हैं - ताँबे के बर्तन में 5-6 दिन दही रखे, जब ये हरी हो जाये तो सर पर मालिश करे और एक घंटे बाद शिकाकाई से धो लें।

स्वदेशी शिक्षा

अपनी विलक्षण शिक्षापद्धति के बलबूते पर ही भारत ने हजारों वर्षों तक विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व किया हैं। तदुपरांत उद्योग-व्यवसाय, कला-कौशल्य और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भी वह अग्रगण्य रहा है।

भारतीय ऋषियों ने पदार्थों की रचना का विश्लेषण किया और आत्मतत्व का भी साक्षात्कार किया। उन्होंने तर्क, व्याकरण, खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र, तत्वज्ञान, औषधिविज्ञान, शरीर-रचना- विज्ञान और गणित जैसे गहन विषयों की रचना की। भारतीय शिक्षा का वटवृक्ष उन्होंने धर्म, नीति और ज्ञान के खाद और जल से सींचा था। इसलिए ही तत्कालीन समाज धार्मिक, नीतिमान् और बुद्धिमान् बन सका था। भारतीय समाज के नैतिक गुणों के विषय में ई.स. पूर्व 300 में ग्रीक राजदूत मॅगस्थनीज ने लिखा है, 'कोई भी भारतीय असत्य बोलने का अपराधी नहीं है। सत्यवादिता और सदाचार उनकी दृष्टि में अतीव मूल्यवान वस्तु है' इस प्रकार भारतीय शिक्षापद्धति द्वारा भारत ने केवल ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, परंतु नीतिमत्ता, प्रामाणिकता और सदाचार की दृष्टि से भी नेत्रदीपक विकास किया था।

हमारी भारतीय आर्य पंरपरा में विद्या प्राप्ति की मुख्य व्यवस्था के रूप में गुरुकुलम् एवं पाठशालाएँ केन्द्र स्थान पर थे। सांदीपनि ऋषि के तपोवन में श्रीकृष्ण और सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी। वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋषि के विद्याश्रम भी प्रसिद्ध थे। तप-स्वाध्याय में निरत ऐसे ऋषि ही बच्चों को शिक्षा प्रदान करते थे। उन ऋषियों के संस्कारित जीवन की महक गुरुकुल के सभी विद्यार्थियों के जीवन को सुगंधित कर देती थी। ऐसी शिक्षा पद्धति के विकसित उदाहरण थे, विश्वप्रसिद्ध नालन्दा और तक्षशिला जैसे विश्व विद्यालय। इसके अलावा वल्लभी, विक्रमशिला, ओदन्तपुरी, मिथिला, काशी, कश्मीर और उज्जैन आदि विश्वविद्यालय भी विख्यात शिक्षा केन्द्र थे।

तत्कालीन राजा महाराजा – श्रेष्ठजनों ने अपनी विपुल सम्पत्ति का अनुदान दे कर भारत के ऐसे विराट सरस्वती मंदिरों की स्थापना करने में अपना सहयोग प्रदान किया था। ऐसे विश्वविद्यालयों में

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हजारों की संख्या में विद्यार्थी विविध विषयों का अभ्यास करते थे और विश्वविद्यालय की कीर्तिपताका समूचे विश्व में लहराते थे। भारत के विश्वविद्यालयों में भारत के ही नहीं बल्कि तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, और श्रीलंका जैसे देशों के भी ज्ञान – इच्छुक विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे।

हमारे प्राचीन भारत में शत-प्रतिशत साक्षरता थी। भारत के हर गाँव में एक पाठशाला थी, जहाँ पर सभी वर्ण के बालक एवं बालिकाएँ प्राथमिक अक्षरज्ञान और धर्मनीति की शिक्षा प्राप्त करते थे। पाठशाला चाहे वह गुजरात की हो या बंगाल की, कश्मीर की हो या तमिलनाडू की, सभी पाठशालाओं की शिक्षा का एकमेव विशिष्ट उद्देश्य था – ‘मानव के व्यक्तित्व का उच्चतम विकास’। भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में भारतीय विद्यालयों ने ऐसे ज्ञान का अविष्कार किया की जिस के आगे समूचे विश्व के दार्शनिक और वैज्ञानिक भी नतमस्तक थे।

आज से 200 वर्ष पहले तक जिस प्रकार की उत्तम शिक्षा भारत में दी जाती थी, वैसी विश्व के किसी भी देश में नहीं दी जाती थी। अंग्रेजों के आगमन से पहले शिक्षा और विद्या प्रचार के क्षेत्र में भारत दुनिया के देशों में सबसे अग्रणी माना जाता था।

लेकिन मनुष्य के आंतरिक गुणों के उजागर कर के उस के दोषों का निर्मूलन करने वाली महान भारतीय शिक्षा प्रणाली को विदेशी आक्रमणों का कुठाराघात सहना पड़ा। मुसलमानों के शासनकाल के दौरान भारत के शिक्षाकेन्द्र, गृहशाला, पाठशाला, विद्यालय इत्यादि नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए। फिर भी मुस्लिम शासक – बाबर से लेकर औरंगजेब तक भारतीय शिक्षण व्यवस्था को इतना नुकसान नहीं पहुँचा सके, जितना अंग्रेजों ने पहुँचाया। अंग्रेजों ने मुसलमान शासकों की तरह न तो पाठशाला जलाई, न विद्यालय गिरा कर ध्वस्त किये, परंतु जैसे कोई गुप्तचर गुप्त वेष में शत्रु राज्य में जासूसी करने के लिए प्रवेश करता है, वैसे ही भारत की शिक्षाप्रणाली में प्रविष्ट हुए।

अंग्रेजों की इस कुटिलनीति का प्रधान चालबाज खिलाड़ी था मैकाले। उस की अनर्थकारी आधुनिकता शिक्षाप्रणाली की सफलता के परिणाम दिखाते हुए उसने कहा था कि, ‘अंग्रेजी शिक्षापद्धति द्वारा भारतीय केवल नाम का ही भारतीय रहेगा, शरीर से ही भारतवासी होगा, किन्तु मन से, विचार से, वचन और

आचरण से वह पूरा अंग्रेज ही बन जायेगा। ‘इस विचार को, पद्धति को, क्रियान्वित करने के लिए प्राचीन पाठशाला (गुरुकुलम्) पद्धति का विनाश करना अनिवार्य था। इसलिए शकुनी नीति से गाँव-गाँव में चल रहे विद्यालय बंद करवा दिए। प्राचीन शिक्षा का सामाजिक एवं राजकीय मूल्य ही नष्ट कर दिए। इस प्रकार गुरुकुल शिक्षा पद्धति नष्टप्रायः हो गई। फलतः भारत में उत्तम मनुष्य, राष्ट्रभक्त, नीतिमान्, प्रामाणिक व्यक्ति दुर्लभ हो गये और अंग्रेजी शिक्षापद्धति के ढाँचे में ढले हुए निकृष्ट, व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी, रोगी और अप्रामाणिक व्यक्ति, जो परोक्ष रूप से अंग्रेजीयत के समर्थक थे, ऐसे लोग देश का, समाज का नेतृत्व करने लगे तो रही –सही प्राचीन शिक्षाप्रणाली भी नेस्तनाबूत हो गई।

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ध्वस्त हुई प्राचीन शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित किए बिना भारतीय प्रजा एवं संस्कृति का समुद्धार असम्भव है।

अतः इस परम्परा को पुनः प्रस्थापित करनी ही चाहिए। तभी, मैकाले-शिक्षा के दुष्प्रभाव से हमारे देश में आज जो दुर्दशा हुई है, उस से हम भारत को बचा पाएंगे।

अंधेरे में जाती भारत की शिक्षा प्रणाली

वर्तमान की सभी समस्याओं का मूल आधुनिक शिक्षा-प्रणाली ही है। इस शिक्षा को लेने वाले जैसे-जैसे बढ़ते गए... वैसे-वैसे गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, मंहगाई, अनीति, अपराध, आत्महत्याएं, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, अनाचार और बलात्कारों की संख्या बढ़ती गई। वायु, जल, जमीन, जंगल और जानवर सभी आज दूषित हैं। ऐसी भयावह दुर्दशा के सूत्रधार प्रायः मैकाले-शिक्षण प्राप्त शिक्षित ही होते हैं।

आज से दो सौ साल पूर्व तक जो देश विश्व में शिक्षित माने जाने वाले देशों में अग्रसर था, जो विश्व का अग्रगण्य कृषिप्रधान और प्रथम स्तर का उद्योगप्रधान देश था, वही अंग्रेजों के 150 साल के शासन के बाद शिक्षा की दृष्टि से सबसे पिछड़ गया। औद्योगिक रूप से वह टूट गया, बेकारों और बीमारों से भरा देश बन गया। हम अपनी मातृभाषा में शिक्षा देने के बजाय अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने में गौरव महसूस करते हैं। अपने प्रदेश की भाषाओं की लड़ाई में एक दूसरे का गला घोंटने या भारत संघ में से अलग हो जाने के लिए उतारू हो गए हैं। विदेशियों से प्राप्त कर्ज आदि को विदेशियों की सहानुभूति, सद्भावना और सहायता के रूप में स्वीकृत करते हैं। विदेशियों की सहायता बिना कुछ भी कर पाने में असमर्थ प्रमाणित हुए हैं।

भारतीय शिक्षा पद्धति सर्वोत्तम और मोक्षदायिनी थी। उसका प्रसार प्रत्येक घर में था। हमारी शिक्षा के विषय में पूरी जानकारी इकट्ठा करने के बाद, उसे खत्म कर, उन्होंने हिंसक, जुगुप्साप्रेरक, शोषक और विकसलक्षी शिक्षारूपी शस्त्र का हम पर एक प्रयोग किया है जिसे 'मोहास्त' कह सकते हैं। हम उससे द मोहित होकर उसके चक्कर में फँस गए हैं फिर भी उसमें गौरव मानते हैं।

हमारा देश आजाद हुआ, तब देश में 40 लाख लोग बेकार थे। उसके बाद लोगों को रोजगार देने के नाम पर 14,916 करोड़ रूपयों की लागत से कारखाने बनाए गए। बेकारों की संख्या 40 लाख से बढ़कर 4 करोड़ तक पहुँच गई। इन फैक्ट्रियों में मानव संसाधन पूरा करने के लिए समग्र प्रजा पर शिक्षा का राक्षसी और निर्धक बोझ डाला गया। देश के लाखों आशावान् युवकों को आज भी हताश बनाकर बेकारी, बीमारी, अपराध और मंहगाई से पीड़ित समाज में धकेल दिया जाता है।

बढ़ती हुई बेकारी के इस प्रवाह का कारण जनसंख्या वृद्धि बताकर आत्म-प्रवंचना करना सरकार का पुराना शगल है। क्योंकि आबादी में बढ़ावा 50 प्रतिशत है जबकि पब्लिक सैक्टर के ही औद्योगिक कारखानों में पूंजी लगाने का वृद्धि प्रमाण 358 प्रतिशत और बेकारी की वृद्धि 900 प्रतिशत है।

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ग्रामीण बच्चों का अधिकांश वर्ग किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण कारीगरों द्वारा बना हुआ है। उन्हें अपने पैतृक धंधे करने होते हैं। इन धंधों को छोड़कर व उन उपाधियों के पीछे दौड़ेगें तो बेकारी का बोलबाला हो जाएगा और कृषि, पशुपालन और ग्रामीण उद्योग नष्ट हो जाएँगे, जो अंधेरगर्दी में परिणत हो सकता है और राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। राष्ट्र को पालने, पोषने और प्रजा की जीवन-जरूरतें पूरी करने का कर्तव्य इन बच्चों को ही निभाना होगा। इस कार्य में उन्हें कॉलेज की उपाधियाँ किसी काम में की नहीं आती। उन्हें कृषि और पशुपालन सीखना हो तो B.Ag. या Veterinary Surgeon की उपाधि लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।

❖ दुनिया में सबसे ज्यादा बेरहम और अमानवीय जाहिर है, ऐसे माँ-बाप आपको हिन्दुस्तान में मिलेंगे।

माँ-बाप आपको कहाँ मिलेंगे? मिलेंगे और सरप्लस में

❖ इन माँ-बापों के पास ढेर सारा पैसा है और ढेर अगर दुनिया में किसी चीज के बारे में सबसे कम जानते हैं, तो अपने बच्चों के बारे में।

सारी मूर्खताएँ हैं। ये माँ-बाप

❖ जैसे, माँ-बाप नहीं जानते कि उनके बच्चों के लिए धूप में रहना बहुत जरूरी है। विटामिन, टॉनिक या सिरप से नहीं, कुदरत से मिलता है और मुफ्त मिलता है।

❖ बच्चा मिट्टी में नहीं खेलेगा, तो बड़ा कैसे होगा? स्वस्थ कैसे रहेगा? बच्चे के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण मिट्टी से होता है। बच्चों को मिट्टी से दूर रखना, बच्चों के साथ दुश्मनी निभाना है।

❖ मौजूदा लाइफ़ स्टाइल का मंत्र है – बच्चे को धूप से दूर रखिए, हवा से दूर रखिए, मिट्टी से दूर रखिए। जी हाँ, अब तो दो साल के बच्चों के लिए जिम खुल गए हैं।

❖ बच्चे को किस उम्र में स्कूल भेजना चाहिए? अपने बचपन के सबसे बेहतरीन चार-पाँच साल, बच्चों के खेलने, मस्ती करने और खाने-पीने के होते हैं। बच्चों का सबसे अनमोल समय उनके माँ-बाप उनसे छीन लेते हैं। प्ले ग्रुप, नर्सरी, जूनियर केजी, सीनियर केजी, स्कैटिंग, डान्स क्लास, चित्रकारी यानी लिस्ट बहुत लम्बी है। तीन साल के बच्चे को गर्मागर्म खाने के बदले टिफिन का खाना?

❖ प्ले ग्रुप से फ़र्स्ट स्टैंडर्ड तक की पाँच साल की यह कवायद बच्चे को कहाँ ले जाती है? बच्चे गिनती या पहाड़े नहीं सीख पाते, लेकिन टीवी पर आने वाला हर विज्ञापन उन्हें याद रहता है। उन्हें पता चल जाता है कि रोटी-सब्जी नहीं, पिज्जा-बर्गर उनका भोजन है।

❖ लड़कियाँ 'प्रियंका चोपड़ा' बनना चाहती है और लड़के ऋतिक रोशन। चार साल का बच्चा मेकडोनलड में जाने के लिए घर सर पर उठा लेता है। पाँच साल की स्वीट बच्ची अभी से फेयर और लवली की डिमांड करती है।

❖ किताबों का बोझ, ट्यूशन, बर्थ-डे पर हर रोज मिलने वाली चॉकलेट, कभी मदर्स डे, तो कभी फादर्स डे, वन डे पिकनिक, चक्करदार फैशन प्रतियोगिताएँ और ऐसी ही ढेर सारी चीजों का अंबार लगा है बच्चों की दुनिया में। सिर्फ़ एक चीज गायब है – 'बचपन'।

❖ कागज की कशती नदी में बहाने नहीं ले जाता कोई। छत पर चाँद दिखाने नहीं ले जाता कोई। लोरी गाकर नहीं सुलाता कोई। गुड़ का गर्म शीरा नहीं खिलाता कोई। न नानी की कहानियाएँ

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याद रही और दादाजी के भूने हुए चने खाने की आदत छूट गई। बच्चे समय की रफ्तार से तेज भाग रहें हैं। बहुत तेज, अपने माँ-बाप की पकड़ से दूर।।

बच्चों की शिक्षा कैसी हो?

बच्चों का दखिला ऐसे स्कूल में न करायें जिसमें होमवर्क बच्चों को ज्यादा मिलता है। बच्चे स्कूल के होमवर्क, ट्यूशन के होमवर्क, घर के होमवर्क के आगे कुछ सोच नहीं पाते हैं,

जिससे उनका मानसिक विकास रुक जाता है। बच्चों को जो होमवर्क में मिलता है जीवन में वह कभी काम नहीं आता है। ऐसे स्कूल में दाखिले से अच्छा नगर परिषद, जिला परिषद के स्कूलों में पढ़ाये। हमारे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति ऐ.पी.जे. अब्दुल कलाम जिला परिषद के स्कूल में पढ़े थे। जब गाँव में थे तो ग्राम पंचायत के स्कूल में पढ़े, नगर परिषद के स्कूल में पढ़े। अब्दुल कलाम कभी कॉन्वेंट स्कूल में नहीं पढ़े और भारत के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में उनका नाम है। पढ़ाई से वैज्ञानिक होने का कोई संबंध नहीं है। वैज्ञानिक होने का संबंध दिमाग से है। आप का दिमाग कितना फ्री है कि चिन्तन कर सकता है, उसी से वह वैज्ञानिक बनता है। ज्यादा पढ़ाई करके, बहुत होमवर्क करके दुनिया में कोई भी वैज्ञानिक नहीं हुआ। आइन्स्टाइन, न्यूटन, एडिसन का नाम सुना है आपने, ये सब स्कूल से भागे हुए थे या स्कूल से निकाल दिये गये थे। आइन्स्टाइन ने कक्षा 9 में स्कूल छोड़ दिया, न्यूटन ने कक्षा 8 में स्कूल छोड़ दिया, एडिसन को स्कूल से कक्षा 3 में निकाल दिया था। मैक्सवेल बहुत बड़ा वैज्ञानिक था कक्षा 7 से ही स्कूल छोड़कर भाग गया था। जबच्चों का स्वतंत्र चिन्तन होता है वही वैज्ञानिक बन सकते हैं। स्कूल की पढ़ाई का बच्चों को जीवन में कोई लाभ नहीं मिलता है फिर भी सबकुछ चल रहा है। बच्चों से किसी को कोई मतलब नहीं है, न तो स्कूल को, न स्कूल के टीचर को और न ही बच्चों के गार्जियन को। सब अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं। इसलिए आप अपने बच्चों को ऐसी शाला में भर्ती करवाइये जहां बच्चा स्वतंत्र चिन्त कर सके, ज्यादा खेले-कूदे, जहाँ बच्चे के ऊपर होमवर्क का भार नहीं हो या कम हो। क्षेत्रीय भाषा या हिन्दी माध्यम के स्कूल में भर्ती करवाइये। अंग्रेजी माध्यम में कभी भर्ती मत करवाइये। बच्चों के ऊपर अंग्रेजी माध्यम की इतनी तकलीफ होती है कि बच्चों का सबसे ज्यादा समय ट्रांसलेशन में बीत जाता है। घर की अपनी भाषा है और स्कूल की अंग्रेजी भाषा है तो हर बार बच्चा अपनी भाषा से अंग्रेजी भाषा में ट्रांसलेशन ही करता रह जायेगा। इसी में बच्चे के जीवन का महत्वपूर्ण समय निकल जाता है। पांचवी कक्षा तक अपनी क्षेत्रीय भाषा ही सिखाइये। जब बच्चे की उम्र 10 से 12 वर्ष की हो जाये तब अंग्रेजी सिखाइये, लेकिन माध्यम के रूप में नही भाषा के रूप में। अंग्रेजी माध्यम कभी अच्छा नहीं है।

बच्चों में नंबर लाने के लिए कभी भी दूसरे बच्चे से तुलना मत कीजिए कि किसी बच्चों का 90 प्रतिशत नंबर आता है और तुम्हारा 70 प्रतिशत नंबर आता है। बच्चों की तुलना इसलिए नही करनी चाहिए कि हर बच्चा अपने आप में यूनिक होता है, विशेष होता है। 90 प्रतिशत नंबर पाने वाले बच्चे

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को बहुत सी ऐसी बातें हैं जिसकी जानकारी नहीं हो सकती हैं लेकिन 70 प्रतिशत नंबर पाने वाले को ऐसी बातों की जानकारी हो सकती है। स्पर्धा में जरूर भाग लेने दीजिए लेकिन टॉफी पाने के दबाव में नहीं, स्वतंत्र रूप से। यह कोई जरूरी नहीं है कि माता-पिता बच्चों के भविष्य के बारे में सभी निर्णय ले सकते हैं। ऐसा इसलिए जरूरी नहीं है कि माता-पिता के ऊपर ऐसे निर्णयों में समाज का दबाव होता है और आज-कल के समाज में लोगों को अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर, कंपनी का मैनेजर बनाने की होड़ लगी है। और सामाजिक दबाव में कोई जरूरी नहीं है कि माता-पिता बच्चों के भविष्य के लिए सही निर्णय ले पायें। समाज में इसके अतिरिक्त भी बहुत सारे क्षेत्र हैं जिनमें बच्चा अपने स्वभाव से जा सकता है। किसान क्यों नहीं होना चाहिए? समाज के दबाव में यदि आप बच्चे पर कोई निर्णय थोपेंगे तो बच्चा खुद जो बनना चाहता है वह नहीं बन पायेगा। भविष्य सभी का ईश्वर ने तय किया है। मेरी माँ ने मुझे इंजीनियरिंग की बहुत बड़ी पढ़ाई करवाई। अभी मैं वो सब छोड़कर इस काम में लग गया हूँ, तो मेरी माँ कहती हैं- तेरे नसीब में यही सब था। तो मैंने उसको बोला - मुझे फालतू में इंजीनियरिंग क्यों करवाया, जिसमें 15-16 लाख रूपये खर्च भी हो गये और मेरा 15 साल बर्बाद हो गए। मान लो मैं वो 15 -16 साल अपना बर्बाद नहीं करता और उसकी जगह भजन-कीर्तन करता। मान लो मैं किसी सच्चे सन्त के पास आकर कुछ सीख लेता तो 15 साल में 15 हजार सभायें होतीं और 1 लाख कार्यकर्ता होते। तो सबका नसीब, सबका भविष्य भगवान का तय किया हुआ है और उसके आगे किसी की भी नहीं चल सकती है। बच्चे को क्या करना है बच्चे से पूछकर उसमें सहयोग कीजिए। माता-पिता होते हुए अपने बच्चे को जो सुविधा देने में सक्षम हों वो सुविधा अपने बच्चे को दें।

स्वध्याय के लिए उसे, समाज कैसे चलता है, उसका ज्ञान दें। जैसे अपने बच्चे को एक दिन पोस्ट ऑफिस लेकर जाइये और पोस्ट ऑफिस में A to Z सभी तरह के कार्यों का अध्ययन करवाइये। ऐसे एक दिन उसे रेलवे स्टेशन लेकर जायें और रेलवे स्टेशन में होने वाले सभी तरह के कार्यों का ज्ञान दीजिए। इसी तरह उसे एक बार महानगर पालिका लेकर जाइये, फिर किसी दिन उसे गौ-शाला में लेकर जाइये, ऐसे ही एक दिन उसे मन्दबुद्धि बच्चों के स्कूल या विकलांग बच्चों के स्कूल पर ले जाइये। ऐसी जगहों पर ले जाकर उसे व्यवहारिक ज्ञान दीजिए। इसमें से जो वो सीखेगा उसी में से उसके रास्ते खुलेंगे।

ये जो क्लास की स्टडी है ये दुनिया की सबसे खराब स्टडी हैं। जो हम पढ़ते हैं, वह दुनिया का कोई बच्चा नहीं पढ़ता है, ना फ्रान्स में, ना जापान में, ना जर्मनी में, न स्वीडन में, न स्विट्ज़रलैंड में, न डेनमार्क में, न अमेरिका में। हमको जो पढ़ाया जाता है वह दुनिया में कोई नहीं पढ़ता है।

सर्टिफिकेट की दृष्टि से बच्चे को उतना ही पढ़ाइये जितना सर्टिफिकेट पाने के लिए आवश्यक हो। इससे ज्यादा पढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। ज्यादा ज्ञान अपने बच्चे को समाज का दीजिए, परिवार का दीजिए, दुनिया का दीजिए। ये सब ज्ञान उसके जीवन में जरूर काम आयेगा और उसमें से उसके रास्ते भी निकल आयेंगे। सर्टिफिकेट के लिए एज्युकेशन बिल्कुल बेकार की हैं, उसमें ज्ञान कुछ भी नहीं जो जीवन में काम आये। सर्टिफिकेट की मान्यता तब तक है जब तक आपके बच्चे के पास ज्ञान नहीं है।

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हिन्दुस्तान में जिन लोगो को ज्ञान हो जाता है उनकी डिग्री कोई नहीं पूछता है। जैसे- सन्त ज्ञानेश्वर की डिग्री किसी ने नहीं पूछी, समर्थ गुरु रामदास की डिग्री कभी देखी आपने, छत्रपति शिवाजी महाराज की डिग्री पूछी आप ने, शम्भा जी महाराज की डिग्री पूछी आपने, तुकड़ो जी महाराज की डिग्री कभी पूछी आपने। इसलिए जब व्यक्ति को ज्ञान हो जाता है तो हम उसके ज्ञान को पूजते हैं उसकी डिग्री कभी नहीं पूछते हैं। डिग्री तभी तक पूछी जाती है जब तक उसके ज्ञान का आपको पता नहीं है।

दुनिया में किसी की भी पूजा हुई है, समाज ने किसी को भी महान बनाया है तो बिना डिग्री के हुई है। इन्दिरा गाँधी 8 वी कक्षा में फेल थी। इन्दिरा गाँधी रवीन्द्र नाथ टैगोर के गुरुकुल में पढ़ती थी और 8वीं में दो बार फेल हुई और वह भारत की 17 वर्ष तक प्रधानमंत्री रहीं। इन्दिरा गाँधी की डिग्री को कोई नहीं पूछता है। उसने जो किया है उसको पूछते हैं। ज्ञान हमेशा डिग्री से बड़ा होता है। ऐसा पूरी दुनिया में होता है।

धीरू भाई अम्बानी की डिग्री, 9वीं फेल थे, उनके पिता ने स्कूल से निकाल दिया और उससे पूछा तू क्या करेगा तो धीरू भाई ने कहा मैं पैसा कमाऊंगा तो धीरू भाई के पिता जी ने अपने दोस्त के पेट्रोल पम्प पर उनको नौकरी पर रखवा दिया, गुजरात में जूनागढ़ नाम के शहर में। वही धीरू भाई अम्बानी पेट्रोल भरा करते थे और धीरू भाई का आज लाखों करोड़ रुपये का एम्पायर है। धीरू भाई नौवीं फेल थे लेकिन उनके नीचे काम करने वाले लोग बड़े-बड़े इंजीनियर, पी.एच.डी., एम.डी., जैसी बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले लोग हैं, नौकर की तरह। ऐसे ही घनश्याम दास बिड़ला चौथी फेल थे और उसके बाद स्कूल छोड़कर व्यवसाय में लग गये और वो भी लाखों करोड़ के एम्पायर के मालिक हैं। ऐसे ही जमशेद जी टाटा एक भी क्लास पढ़ने नहीं गया। कभी स्कूल नहीं गये। उनको घर पर एक टीचर पढ़ाता था। आज उनका एम्पायर लाखों करोड़ों का है।

दुनिया में डिग्री लेकर कोई महान हुआ है ऐसे दो-चार ही मिलेंगे। बिना डिग्री के बहुत ऊँचाई पर गये ऐसे सैकड़ों लोग हैं। पुणे में किलोस्कर कंपनी है, इसका मूल संस्थापक 5वीं पास है। डिग्री का महत्व है नौकरी पाने के लिए, सिपाही होने के लिए, क्लर्क होने के लिए, नौकर बनने के लिए। अपने बच्चे को यदि नौकर बनाना है तो डिग्री पर ध्यान दीजिए और यदि समाज में कोई ऐसा स्थान दिलाना है जिसकी सब इज्जत करें तो ज्ञान को महत्व दीजिए। इसलिए 10-15 साल महत्वपूर्ण समय है जो स्कूलों में एवं उनके होमवर्क में व्यर्थ चला ता है। इसमें अपने बच्चों को वेद पढ़ाइयें, उपनिषद पढ़ाइये, गीता पढ़ाइये, भारत के और दूसरे शास्त्रों को पढ़ाइयें। उसके साथ में 10वीं-12वीं की परीक्षा दिलवाइये, नंबर के लिए नहीं बल्कि डिग्री के लिए। इसके बाद उनको ज्ञान सिखाने की कोशिश करें। सर्टिफिकेट ज्यादातर 10वीं और 12वीं का ही लगता है। उसके पहले का कोई नहीं पूछता है तो 5वीं, 6वीं, 7वीं, 8वीं की डिग्री के पीछे पड़ कर टाइम क्यों खराब करना।

अभी मैं जो काम कर रहा हूँ वह डिग्री वालों ने नहीं सिखाया है। मैंने स्वधाय से सीखा है। जो मैंने स्वधाय से सीखा है वही मुझे काम आ रहा है। डिग्री वाला तो कभी काम नहीं आ रहा है।

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बच्चों को भारतीय संगीत का अभ्यास कराना चाहिए। चाहें तो भारतीय गायन, भारतीय वादन या भारतीय नृत्य तीनों में से कोई एक जरूर सिखाना चाहिए। पेन्टिंग/चित्रकला का अभ्यास करवाना चाहिए, मूर्तिकला का अभ्यास करवाना चाहिए।

भारतवर्ष में गुरुकुल कैसे खत्म हो गए?

1858 में Indian Education Act बनाया गया। इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकाले ने की थी। लेकिन उसके पहले उसने वहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W. Litnar और दूसरा अधिकारी था Thomas Munro दोनों ने अलग-अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। 1823 के आस-पास की बात है। Litnar जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा था कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है, और उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता थी और मैकॉले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी 'देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था' को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह 'अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था' लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे और मैकॉले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा हैं - 'जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।' इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता, जो समाज की तरफ से होती थी, वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम-घूम कर खत्म कर दिया, उनमें आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला।

1850 तक इस देश में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे '7 लाख 50 हजार, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में 'Higher Learning Institute' हुआ करते थे, और ये गुरुकुल समाज के लोग मिलकर चलाते थे, न कि राजा, महाराजा।

इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। किन्तु सारे गुरुकुलों को खत्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे 'फ्री स्कूल' कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी, बम्बई यूनिवर्सिटी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के जमाने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।

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मैकॉले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी, बहुत मशहूर चिट्ठी है वो। उसमें वो लिखता है कि, 'इन कॉन्वेंट स्कूलों में ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में, अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे। जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।' उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ-साफ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरो पर रोब पड़ेगा, अरे! हम तो खुद हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा। लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है किन्तु दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर यह कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं, दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी, वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, वहाँ का सारा काम फ्रेंच में होता है। जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है, उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकॉले की रणनीति थी।

स्वदेशी कृषि

जैविक खेती जीवों के सहयोग से की जाने वाली खेती के तरीके को कहते हैं। प्रकृति ने स्वयं संचालन के लिए जीवों का विकास किया है जो प्रकृति को पुनः ऊर्जा प्रदान करने वाले जैव संयंत्र भी हैं। यही जैविक व्यवस्था खेतों में कार्य करती है। खेतों में रसायन डालने से ये जैविक व्यवस्था नष्ट होने को हैं तथा भूमि और जल-प्रदूषण बढ़ रहा है। खेतों में हमें उपलब्ध जैविक साधनों की मदद से खाद, कीटनाशक दवाई, चूहा नियंत्रण हेतु दवा बगैरह बनाकर उनका उपयोग करना होगा। इन तरीकों के उपयोग से हमें पैदावार भी अधिक मिलेगी एवं अनाज, फल सब्जियां भी विषमुक्त एवं उत्तम होंगी। प्रकृति की सूक्ष्म जीवाणुओं एवं जीवों का तंत्र पुनः हमारी खेती में सहयोगी कार्य कर सकेगा।

एक सरल सूत्र बताता हूँ जिसको भारत में पिछले 15-17 वर्षों में हजारों किसानों ने अपनाया है और बहुत लाभ उनको हुआ है। एक एकड़ खेत के लिए किसी भी फसल के लिए खाद बनाने की विधि –

    1. एक बार में 15 किलो गोबर लगता है और ये गोबर किसी भी देशी गौमाता या देशी बैल का ही होना चाहिए। विदेशी या जर्सी गायें का नहीं होना चाहिए।
    1. इसमें मिलायें 15 लीटर मूत्र, उसी जानवर का जिसका गोबर लिया है। दोनों मिला लीजिए, प्लास्टिक के एक ड्रम में रख दें।

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    1. फिर इसमें एक किलो गुड़ डाल दीजिए और गुड़ ऐसा डाल दीजिए जो गुड़ हम नहीं खा सकते, जानवर नहीं खा सकते, जो बेकार हो गया हो, वो गुड़ खाद बनाने में सबसे अच्छा काम में आता है। तो एक किलो गुड़ 15 किलो गोमूत्र, 15 किलो गोबर इसमें डालिए।
    1. फिर एक किलो किसी भी दाल का आटा (बेसन)।
    1. अंत में एक किलो मिट्टी किसी भी पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे से उठाकर इसमें डालना।

ये पाँच वस्तुओं को एक प्लास्टिक के ड्रम में मिला देना, डंडे से या हाथ से मिलाने के बाद इसको 15 दिनों तक छाव में रखना। पन्द्रह दिनों तक इसका सुबह शाम डंडे से घुमाते रहना। पन्द्रह दिनों में ये खाद बनकर तैयार हो जाएगा। फिर इस खाद में लगभग 150 से 200 लीटर पानी मिलाना। पानी मिलाकर अब जो घोल तैयार होगा, ये एक एकड़ के लिए पर्याप्त खाद है। अगर दो एकड़ के लिए पर्याप्त खाद है तो सभी मात्राओं को दो गुणा कर दीजिए।

अब इसके खेत में कैसे डालना है?

अगर खेत खाली है तो इसको सीधे स्प्रे कर सकते हैं मिट्टी को भिगाने के हिसाब से। डब्बे में भर-भर के छिड़क सकते हैं या स्प्रे पम्प में भरकर छिड़क सकते हैं, स्प्रे पम्प का नोजर निकाल देंगे तो ये छिड़कना आसान होगा।

फसल अगर खेत में खड़ी हुई है तो फसल में जब पानी लगाएंगे तो पानी के साथ इसको मिला देना है।

खेत में यह खाद कब-कब डालनी है?

इसका आप हर 21 दिन में दोबारा में डाल सकते हैं आज अपने डाला तो दोबारा 21 दिन बाद डाल सकते हैं, फिर 2 दिन बाद डाल सकते हैं। मतलब इसका है कि अगर फसल तीन महीने की है तो कम से कम 4-5 बार डाल दीजिए। चार महीने की है तो पांच से छह बार डाल दीजिए। 6 महीने की फसल है तो सात-आठ बार डाल दीजिए, साल की फसल है तो उसमें आप इसको 14-15 बार डाल दीजिए। हर 21 दिन में जालते जाना हैं। इस खाद से आप किसी भी फसल को भरपूर उत्पादन ले सकते हैं- गेहूँ, धन, चना, गन्ना, मूंगफली, सब्जी सब तरह की फसलों में ये डालकर देखा गया है। इसके बहुत अच्छे और बहुत अद्भुत परिणाम हैं। सबसे अच्छा परिणाम क्या आता है इसका? आपकी जिंदगी का खाद का जो खर्चा है 60 प्रतिशत, वो एक झटके में खत्म हो गया। फिर दूसरा खर्चा क्या खत्म होता है, जब आप ये गोबर-गौमूत्र का खाद डालेंगे तो खेत में विष कम हो जाएगा, तो जन्तुनाशक डालना और कम हो जायेगा, कीटनाशक डालना और कम हो जायेगा। यूरिया डी.ए.पी. का असर जैसे-जैसे मिट्टी से कम हो जाएगा, बाहर से आने वाले कीट और जंतु भी आपके खेत में कम होते जाएंगे, तो जंतुनाशक और कीटनाशक डालने का खर्च भी कम होता जाएगा, और लगातार तीन-चार साल में ये खाद बनाकर अपने डाल दिया तो लगभग तय मानिए आपके खेत में कोई भी जहरीला कीट और जंतु आया नहीं, तो उसको मारने के लिए किसी भी दवा की आवश्यकता नहीं पड़ेगी तो 20 प्रतिशत जो कीटनाशक का खर्चा था वो भी बच जाएगा। खेती का 80 प्रतिशत खर्चा आपका बच जाएगा। दूसरी बात इस खाद के बारे में ये है कि ये सभी फसलों के लिए

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हैं। जानवरों का गोबर और गौमूत्र गाँव में आसानी से मिल जाता है। गोबर इकट्ठा करना तो बहुत आसान है। जानवरों का मूत्र इकट्ठा करना भी आसान है।

देशी गौमाता या देशी बैल का मूत्र कैसे इकट्ठा करें?

सभी देशी गौमाता या देशी बैल मूत्र देते हैं। आप ऐसा करिए कि उनको बांधने का जो स्थान है वो थोड़ा पक्का बना दीजिए, सीमेंट या पत्थर लगा दीजिए और स्थान को थोड़ा ढाल दे दीजिए और उसमें एक नाली बना दीजिए और बीच में एक खड्डा बना दीजिए। तो जानवर जो भी मूत्र करेंगे वो सब नाली में आकर खड़े में इकट्ठा हो जाएगा। अब देशी गौमाता या देशी बैल के मूत्र की एक विशेषता है कि इसकी कोई एक्सपायरी डेट नहीं है। 3 महीने, एक साल, दो साल, पाँच साल, दस साल कितने भी दिन पड़ा रहे खड़े में, वो खराब बिल्कुल नहीं होता। इसलिए बिल्कुल निश्चित तरीके से आप इसका इस्तेमाल करें, मन में हिचक मत लायें कि ये पुराना है या नया। हमने तो ये पाया है कि जितना देशी गौमाता या देशी बैल का मूत्र पुराना होता जाता है उसकी गुणवत्ता उतनी ही अच्छी होती जाती है। ये जितने भी मल्टीनेशनल कंपनियों के जंतुनाशक है उन सबकी एक्सपायरी डेट है और उसके बाद भी कीड़े मरते नहीं है और किसान उसको कई बार चख कर देखते हैं कि कहीं नकली तो नहीं है, तो किसान मर जाते हैं, कीड़े नहीं मरते हैं तो मल्टीनेशनल कम्पनियों के कीटनाशक लेने से अच्छा है देशी गौमाता या देशी बैल के मूत्र का उपयोग करना। तो इसको खाद में इस्तेमाल करिए ये एक तरीका है। लगातार तीन साल इस्तेमाल करने पर आपके खेत की मिट्टी को एकदम पवित्र और शुद्ध बना देगा, मिट्टी में एक कण भी जहर का नहीं बचेगा, और उत्पादन भी पहले से अधिक होगा। फसल का उत्पादन पहले साल कुछ कम होगा परन्तु खाद का खर्चा एक ही झटके में कम हो जायेगा और उत्पादन भी हर साल बढ़ता जायेगा।

बाजार से किसी विदेशी कम्पनी का 15000 रूपए लीटर का कीटनाशक लाने से अच्छा है इन देसी गौमाता या देसी बैले के मूत्र से ही कीटनाशक बना सकते हैं। अगर किसी फसल में कोई कीट या जंतु लग गया, उसको खत्म करना है, मारना है तो उसके लिए एक सूत्र आप लिख लीजिए कि कीटनाशक बनाना भी बेहद आसान है, कोई भी किसान भाई अपने घर में बना सकते हैं।

कीटनाशक बनाने के लिए क्या करना पड़ता है ?

एक एकड़ खेत के लिए अगर कीटनाशक तैयार करना है तो :-

    1. 20 लीटर किसी भी देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र चाहिए।
    1. 20 लीटर मूत्र में लगभग ढाई किलो ( आधा किलो कम या ज्यादा हो सकता है ) नीम की पत्ती को पीसकर उसकी चटनी मिलाइए, 20 लीटर मूत्र में। नीम के पत्ते से भी अच्छा होता है नीम की निम्बोली की चटनी।
    1. इसी तरह से एक दूसरा पत्ता होता है धतूरे का पत्ता। लगभग ढाई किलो धतूरे के पत्ते की चटनी मिलाइए उसमें।
    1. एक पेड़ होता है जिसको आक या आँकड़ा कहते हैं, अर्कमदार कहते हैं आयुर्वेद में। इसके भी पत्ते लगभग ढाई किलो लेकर इसकी चटनी बनाकर मिलाए।
    1. जिसको बेलपत्री कहते हैं, जिसके पत्र आप शंकर भगवान के उपर चढ़ाते हैं। बेलपत्री या विल्वपत्रा के पत्ते की ढाई किलो की चटनी मिलाए उसमें।
    1. फिर सीताफल या शरीफा के ढाई किलो पत्तों की चटनी मिलाए उसमें।
    1. आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना।

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  1. इसमें 1 किलो लाल मिर्च का पाऊडर भी डाल दें।

  2. इसमें बेशर्म के पत्ते भी ढाई किलो डाल दें।

तो ये पांच-छह तरह के पेड़ों के पत्ते आप ले लो ढाई- ढाई किलो। इनको पीसकर 20 लीटर देसी गौमाता या देसी बैले मूत्र में डालकर उबालना हैं, और इसमें उबालते समय आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना। ये डालकर उबाल लेना हैं उबालकर इसको ठंडा कर लेना है और ठंडा करके छानकर आप इसको बोटलों में भर ले रख लीजिए। ये कभी भी खराब नहीं होता। ये कीटनाशक तैयार हो गया। अब इसको डालना कैसे है? जितना कीटनाशक लेंगे उसका 20 गुना पानी मिलाएं। अगर एक लीटर कीटनाशक लिया तो 20 लीटर पानी, 10 लीटर कीटनाशक लिया तो 200 लीटर पानी, जितना कीटनाशक आपका तैयार हो, उसका अंदाजा लगा लीजिए आप, उसका 20 गुना पानी मिला दीजिए। पानी मिलकर उसको आप खेत में छिड़क सकते हैं किसी भी फसल पर। इसको छिड़कने का परिणाम ये है कि दो से तीन दिन के अंदर जिस फसल पर आपने स्प्रे किया, उस पर कीट और जंतु आपको दिखाई नहीं देंगे, कीड़े और जंतु सब पूरी तरह से दो-तीन दिन में ही खत्म हो जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। इतना प्रभावशाली ये कीटनाशक बनकर तैयार होता है। ये बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों के कीटनाशक से सैकड़ों गुणा ज्यादा ताकतवर है और एकदम फोकट का है, बनाने में कोई खर्चा नहीं। देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र मुफ्त में मिल जाता है, नीम के पत्ते, निम्बोली, आक के पत्ते, आड़ू के पत्ते- सब तरह के पत्ते मुफ्त में हर गाँव में उपलब्ध हैं। तो ये आप कीटनाशक के रूप में, जंतुनाशक के रूप में आप इस्तेमाल करें।

अंतिम शब्दों में राजीव भाई को एक भाव पूर्ण श्रद्धांजलि ....

जिसने भारत का सोया स्वाभिमान जगा दिया....

भारत सोने की चिडिया था.. है.. और आगे कैसे होगा

हम-सब को फिर से बता दिया....

आज जब सत्य बोलना नामुमकिन हो,

उसने उस डगर पे चलना हमे सिखा दिया...

भारत का सोया स्वाभिमान जगा दिया...

वो आया था “विवेकानन्द” बन कर

अपने सत् कर्मों से बता दिया...

पर अफसोस कि देश आज भरा गद्दारो से,

जिस कारण “माँ भारतीय के लाल को,

शास्त्री जी” की तरह विदा किया।

Three stars arranged horizontally as a decorative separator.

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