स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंको बहुत सी ऐसी बातें हैं जिसकी जानकारी नहीं हो सकती हैं लेकिन 70 प्रतिशत नंबर पाने वाले को ऐसी बातों की जानकारी हो सकती है। स्पर्धा में जरूर भाग लेने दीजिए लेकिन टॉफी पाने के दबाव में नहीं, स्वतंत्र रूप से। यह कोई जरूरी नहीं है कि माता-पिता बच्चों के भविष्य के बारे में सभी निर्णय ले सकते हैं। ऐसा इसलिए जरूरी नहीं है कि माता-पिता के ऊपर ऐसे निर्णयों में समाज का दबाव होता है और आज-कल के समाज में लोगों को अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर, कंपनी का मैनेजर बनाने की होड़ लगी है। और सामाजिक दबाव में कोई जरूरी नहीं है कि माता-पिता बच्चों के भविष्य के लिए सही निर्णय ले पायें। समाज में इसके अतिरिक्त भी बहुत सारे क्षेत्र हैं जिनमें बच्चा अपने स्वभाव से जा सकता है। किसान क्यों नहीं होना चाहिए? समाज के दबाव में यदि आप बच्चे पर कोई निर्णय थोपेंगे तो बच्चा खुद जो बनना चाहता है वह नहीं बन पायेगा। भविष्य सभी का ईश्वर ने तय किया है। मेरी माँ ने मुझे इंजीनियरिंग की बहुत बड़ी पढ़ाई करवाई। अभी मैं वो सब छोड़कर इस काम में लग गया हूँ, तो मेरी माँ कहती हैं- तेरे नसीब में यही सब था। तो मैंने उसको बोला - मुझे फालतू में इंजीनियरिंग क्यों करवाया, जिसमें 15-16 लाख रूपये खर्च भी हो गये और मेरा 15 साल बर्बाद हो गए। मान लो मैं वो 15 -16 साल अपना बर्बाद नहीं करता और उसकी जगह भजन-कीर्तन करता। मान लो मैं किसी सच्चे सन्त के पास आकर कुछ सीख लेता तो 15 साल में 15 हजार सभायें होतीं और 1 लाख कार्यकर्ता होते। तो सबका नसीब, सबका भविष्य भगवान का तय किया हुआ है और उसके आगे किसी की भी नहीं चल सकती है। बच्चे को क्या करना है बच्चे से पूछकर उसमें सहयोग कीजिए। माता-पिता होते हुए अपने बच्चे को जो सुविधा देने में सक्षम हों वो सुविधा अपने बच्चे को दें।
स्वध्याय के लिए उसे, समाज कैसे चलता है, उसका ज्ञान दें। जैसे अपने बच्चे को एक दिन पोस्ट ऑफिस लेकर जाइये और पोस्ट ऑफिस में A to Z सभी तरह के कार्यों का अध्ययन करवाइये। ऐसे एक दिन उसे रेलवे स्टेशन लेकर जायें और रेलवे स्टेशन में होने वाले सभी तरह के कार्यों का ज्ञान दीजिए। इसी तरह उसे एक बार महानगर पालिका लेकर जाइये, फिर किसी दिन उसे गौ-शाला में लेकर जाइये, ऐसे ही एक दिन उसे मन्दबुद्धि बच्चों के स्कूल या विकलांग बच्चों के स्कूल पर ले जाइये। ऐसी जगहों पर ले जाकर उसे व्यवहारिक ज्ञान दीजिए। इसमें से जो वो सीखेगा उसी में से उसके रास्ते खुलेंगे।
ये जो क्लास की स्टडी है ये दुनिया की सबसे खराब स्टडी हैं। जो हम पढ़ते हैं, वह दुनिया का कोई बच्चा नहीं पढ़ता है, ना फ्रान्स में, ना जापान में, ना जर्मनी में, न स्वीडन में, न स्विट्ज़रलैंड में, न डेनमार्क में, न अमेरिका में। हमको जो पढ़ाया जाता है वह दुनिया में कोई नहीं पढ़ता है।
सर्टिफिकेट की दृष्टि से बच्चे को उतना ही पढ़ाइये जितना सर्टिफिकेट पाने के लिए आवश्यक हो। इससे ज्यादा पढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। ज्यादा ज्ञान अपने बच्चे को समाज का दीजिए, परिवार का दीजिए, दुनिया का दीजिए। ये सब ज्ञान उसके जीवन में जरूर काम आयेगा और उसमें से उसके रास्ते भी निकल आयेंगे। सर्टिफिकेट के लिए एज्युकेशन बिल्कुल बेकार की हैं, उसमें ज्ञान कुछ भी नहीं जो जीवन में काम आये। सर्टिफिकेट की मान्यता तब तक है जब तक आपके बच्चे के पास ज्ञान नहीं है।
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