भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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याद रही और दादाजी के भूने हुए चने खाने की आदत छूट गई। बच्चे समय की रफ्तार से तेज भाग रहें हैं। बहुत तेज, अपने माँ-बाप की पकड़ से दूर।।

बच्चों की शिक्षा कैसी हो?

बच्चों का दखिला ऐसे स्कूल में न करायें जिसमें होमवर्क बच्चों को ज्यादा मिलता है। बच्चे स्कूल के होमवर्क, ट्यूशन के होमवर्क, घर के होमवर्क के आगे कुछ सोच नहीं पाते हैं,

जिससे उनका मानसिक विकास रुक जाता है। बच्चों को जो होमवर्क में मिलता है जीवन में वह कभी काम नहीं आता है। ऐसे स्कूल में दाखिले से अच्छा नगर परिषद, जिला परिषद के स्कूलों में पढ़ाये। हमारे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति ऐ.पी.जे. अब्दुल कलाम जिला परिषद के स्कूल में पढ़े थे। जब गाँव में थे तो ग्राम पंचायत के स्कूल में पढ़े, नगर परिषद के स्कूल में पढ़े। अब्दुल कलाम कभी कॉन्वेंट स्कूल में नहीं पढ़े और भारत के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में उनका नाम है। पढ़ाई से वैज्ञानिक होने का कोई संबंध नहीं है। वैज्ञानिक होने का संबंध दिमाग से है। आप का दिमाग कितना फ्री है कि चिन्तन कर सकता है, उसी से वह वैज्ञानिक बनता है। ज्यादा पढ़ाई करके, बहुत होमवर्क करके दुनिया में कोई भी वैज्ञानिक नहीं हुआ। आइन्स्टाइन, न्यूटन, एडिसन का नाम सुना है आपने, ये सब स्कूल से भागे हुए थे या स्कूल से निकाल दिये गये थे। आइन्स्टाइन ने कक्षा 9 में स्कूल छोड़ दिया, न्यूटन ने कक्षा 8 में स्कूल छोड़ दिया, एडिसन को स्कूल से कक्षा 3 में निकाल दिया था। मैक्सवेल बहुत बड़ा वैज्ञानिक था कक्षा 7 से ही स्कूल छोड़कर भाग गया था। जबच्चों का स्वतंत्र चिन्तन होता है वही वैज्ञानिक बन सकते हैं। स्कूल की पढ़ाई का बच्चों को जीवन में कोई लाभ नहीं मिलता है फिर भी सबकुछ चल रहा है। बच्चों से किसी को कोई मतलब नहीं है, न तो स्कूल को, न स्कूल के टीचर को और न ही बच्चों के गार्जियन को। सब अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं। इसलिए आप अपने बच्चों को ऐसी शाला में भर्ती करवाइये जहां बच्चा स्वतंत्र चिन्त कर सके, ज्यादा खेले-कूदे, जहाँ बच्चे के ऊपर होमवर्क का भार नहीं हो या कम हो। क्षेत्रीय भाषा या हिन्दी माध्यम के स्कूल में भर्ती करवाइये। अंग्रेजी माध्यम में कभी भर्ती मत करवाइये। बच्चों के ऊपर अंग्रेजी माध्यम की इतनी तकलीफ होती है कि बच्चों का सबसे ज्यादा समय ट्रांसलेशन में बीत जाता है। घर की अपनी भाषा है और स्कूल की अंग्रेजी भाषा है तो हर बार बच्चा अपनी भाषा से अंग्रेजी भाषा में ट्रांसलेशन ही करता रह जायेगा। इसी में बच्चे के जीवन का महत्वपूर्ण समय निकल जाता है। पांचवी कक्षा तक अपनी क्षेत्रीय भाषा ही सिखाइये। जब बच्चे की उम्र 10 से 12 वर्ष की हो जाये तब अंग्रेजी सिखाइये, लेकिन माध्यम के रूप में नही भाषा के रूप में। अंग्रेजी माध्यम कभी अच्छा नहीं है।

बच्चों में नंबर लाने के लिए कभी भी दूसरे बच्चे से तुलना मत कीजिए कि किसी बच्चों का 90 प्रतिशत नंबर आता है और तुम्हारा 70 प्रतिशत नंबर आता है। बच्चों की तुलना इसलिए नही करनी चाहिए कि हर बच्चा अपने आप में यूनिक होता है, विशेष होता है। 90 प्रतिशत नंबर पाने वाले बच्चे

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