स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंध्वस्त हुई प्राचीन शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित किए बिना भारतीय प्रजा एवं संस्कृति का समुद्धार असम्भव है।
अतः इस परम्परा को पुनः प्रस्थापित करनी ही चाहिए। तभी, मैकाले-शिक्षा के दुष्प्रभाव से हमारे देश में आज जो दुर्दशा हुई है, उस से हम भारत को बचा पाएंगे।
अंधेरे में जाती भारत की शिक्षा प्रणाली
वर्तमान की सभी समस्याओं का मूल आधुनिक शिक्षा-प्रणाली ही है। इस शिक्षा को लेने वाले जैसे-जैसे बढ़ते गए... वैसे-वैसे गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, मंहगाई, अनीति, अपराध, आत्महत्याएं, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, अनाचार और बलात्कारों की संख्या बढ़ती गई। वायु, जल, जमीन, जंगल और जानवर सभी आज दूषित हैं। ऐसी भयावह दुर्दशा के सूत्रधार प्रायः मैकाले-शिक्षण प्राप्त शिक्षित ही होते हैं।
आज से दो सौ साल पूर्व तक जो देश विश्व में शिक्षित माने जाने वाले देशों में अग्रसर था, जो विश्व का अग्रगण्य कृषिप्रधान और प्रथम स्तर का उद्योगप्रधान देश था, वही अंग्रेजों के 150 साल के शासन के बाद शिक्षा की दृष्टि से सबसे पिछड़ गया। औद्योगिक रूप से वह टूट गया, बेकारों और बीमारों से भरा देश बन गया। हम अपनी मातृभाषा में शिक्षा देने के बजाय अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने में गौरव महसूस करते हैं। अपने प्रदेश की भाषाओं की लड़ाई में एक दूसरे का गला घोंटने या भारत संघ में से अलग हो जाने के लिए उतारू हो गए हैं। विदेशियों से प्राप्त कर्ज आदि को विदेशियों की सहानुभूति, सद्भावना और सहायता के रूप में स्वीकृत करते हैं। विदेशियों की सहायता बिना कुछ भी कर पाने में असमर्थ प्रमाणित हुए हैं।
भारतीय शिक्षा पद्धति सर्वोत्तम और मोक्षदायिनी थी। उसका प्रसार प्रत्येक घर में था। हमारी शिक्षा के विषय में पूरी जानकारी इकट्ठा करने के बाद, उसे खत्म कर, उन्होंने हिंसक, जुगुप्साप्रेरक, शोषक और विकसलक्षी शिक्षारूपी शस्त्र का हम पर एक प्रयोग किया है जिसे 'मोहास्त' कह सकते हैं। हम उससे द मोहित होकर उसके चक्कर में फँस गए हैं फिर भी उसमें गौरव मानते हैं।
हमारा देश आजाद हुआ, तब देश में 40 लाख लोग बेकार थे। उसके बाद लोगों को रोजगार देने के नाम पर 14,916 करोड़ रूपयों की लागत से कारखाने बनाए गए। बेकारों की संख्या 40 लाख से बढ़कर 4 करोड़ तक पहुँच गई। इन फैक्ट्रियों में मानव संसाधन पूरा करने के लिए समग्र प्रजा पर शिक्षा का राक्षसी और निर्धक बोझ डाला गया। देश के लाखों आशावान् युवकों को आज भी हताश बनाकर बेकारी, बीमारी, अपराध और मंहगाई से पीड़ित समाज में धकेल दिया जाता है।
बढ़ती हुई बेकारी के इस प्रवाह का कारण जनसंख्या वृद्धि बताकर आत्म-प्रवंचना करना सरकार का पुराना शगल है। क्योंकि आबादी में बढ़ावा 50 प्रतिशत है जबकि पब्लिक सैक्टर के ही औद्योगिक कारखानों में पूंजी लगाने का वृद्धि प्रमाण 358 प्रतिशत और बेकारी की वृद्धि 900 प्रतिशत है।
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