भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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हजारों की संख्या में विद्यार्थी विविध विषयों का अभ्यास करते थे और विश्वविद्यालय की कीर्तिपताका समूचे विश्व में लहराते थे। भारत के विश्वविद्यालयों में भारत के ही नहीं बल्कि तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, और श्रीलंका जैसे देशों के भी ज्ञान – इच्छुक विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे।

हमारे प्राचीन भारत में शत-प्रतिशत साक्षरता थी। भारत के हर गाँव में एक पाठशाला थी, जहाँ पर सभी वर्ण के बालक एवं बालिकाएँ प्राथमिक अक्षरज्ञान और धर्मनीति की शिक्षा प्राप्त करते थे। पाठशाला चाहे वह गुजरात की हो या बंगाल की, कश्मीर की हो या तमिलनाडू की, सभी पाठशालाओं की शिक्षा का एकमेव विशिष्ट उद्देश्य था – ‘मानव के व्यक्तित्व का उच्चतम विकास’। भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में भारतीय विद्यालयों ने ऐसे ज्ञान का अविष्कार किया की जिस के आगे समूचे विश्व के दार्शनिक और वैज्ञानिक भी नतमस्तक थे।

आज से 200 वर्ष पहले तक जिस प्रकार की उत्तम शिक्षा भारत में दी जाती थी, वैसी विश्व के किसी भी देश में नहीं दी जाती थी। अंग्रेजों के आगमन से पहले शिक्षा और विद्या प्रचार के क्षेत्र में भारत दुनिया के देशों में सबसे अग्रणी माना जाता था।

लेकिन मनुष्य के आंतरिक गुणों के उजागर कर के उस के दोषों का निर्मूलन करने वाली महान भारतीय शिक्षा प्रणाली को विदेशी आक्रमणों का कुठाराघात सहना पड़ा। मुसलमानों के शासनकाल के दौरान भारत के शिक्षाकेन्द्र, गृहशाला, पाठशाला, विद्यालय इत्यादि नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए। फिर भी मुस्लिम शासक – बाबर से लेकर औरंगजेब तक भारतीय शिक्षण व्यवस्था को इतना नुकसान नहीं पहुँचा सके, जितना अंग्रेजों ने पहुँचाया। अंग्रेजों ने मुसलमान शासकों की तरह न तो पाठशाला जलाई, न विद्यालय गिरा कर ध्वस्त किये, परंतु जैसे कोई गुप्तचर गुप्त वेष में शत्रु राज्य में जासूसी करने के लिए प्रवेश करता है, वैसे ही भारत की शिक्षाप्रणाली में प्रविष्ट हुए।

अंग्रेजों की इस कुटिलनीति का प्रधान चालबाज खिलाड़ी था मैकाले। उस की अनर्थकारी आधुनिकता शिक्षाप्रणाली की सफलता के परिणाम दिखाते हुए उसने कहा था कि, ‘अंग्रेजी शिक्षापद्धति द्वारा भारतीय केवल नाम का ही भारतीय रहेगा, शरीर से ही भारतवासी होगा, किन्तु मन से, विचार से, वचन और

आचरण से वह पूरा अंग्रेज ही बन जायेगा। ‘इस विचार को, पद्धति को, क्रियान्वित करने के लिए प्राचीन पाठशाला (गुरुकुलम्) पद्धति का विनाश करना अनिवार्य था। इसलिए शकुनी नीति से गाँव-गाँव में चल रहे विद्यालय बंद करवा दिए। प्राचीन शिक्षा का सामाजिक एवं राजकीय मूल्य ही नष्ट कर दिए। इस प्रकार गुरुकुल शिक्षा पद्धति नष्टप्रायः हो गई। फलतः भारत में उत्तम मनुष्य, राष्ट्रभक्त, नीतिमान्, प्रामाणिक व्यक्ति दुर्लभ हो गये और अंग्रेजी शिक्षापद्धति के ढाँचे में ढले हुए निकृष्ट, व्यसनी, व्यभिचारी, आलसी, रोगी और अप्रामाणिक व्यक्ति, जो परोक्ष रूप से अंग्रेजीयत के समर्थक थे, ऐसे लोग देश का, समाज का नेतृत्व करने लगे तो रही –सही प्राचीन शिक्षाप्रणाली भी नेस्तनाबूत हो गई।

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