स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
आंदोलन को उम्मीद है कि इस पुस्तक के माध्यम से जो विचार वह संप्रषित करना चाहता है वह आम जनता तक अवश्य पहुंचेगा।
आज जब विश्व व्यापार संगठन के कानून पुनः लागू होने जा रहे हैं तब यह आवश्यक हो जाता है कि देश के सभी कोनों से इसके खिलाफ आवाजें उठें और जनता इसके खिलाफ खड़ी हों।
राजीव दीक्षित
आजादी बचाओ आंदोलन
जीवन रक्षा से मौत के व्यापार तक
यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने मानव इतिहास में युगान्तकारी परिवर्तन लाये। कृषि और कारीगरी पर टिके समाज की बुनियादें एक-एक करके ढहने लगीं। उत्पादन शैली, खाने-पीने के तौर-तरीके, पहनावा, भाषा, चिकित्सा पद्धतियों में परिवर्तन आये। ये परिवर्तन सतही नहीं, बुनियादी थे। विनिमय प्रधान कृषि-युगीन व्यवस्था, चलन के बाहर होने लगी और उनका स्थान ले लिया बेजान मशीनीय रिशतों पर टिके व्यापारिक समाज ने।
उद्योग का पेट भरने के लिए जंगल कटे। विशालकाय उद्योगों के रासायनिक कचरों, तेज दौड़ती गाड़ियों एवं रेलगाड़ियों के धुओं ने धरती, पानी और आसमान में जहर घोल दिया। इस विषाक्त वातावरण ने नई-नई बीमारियों को जन्म दिया।
औद्योगिक समाज की पहली जरूरत थी बाजार। इसलिए बाजार की तलाश में इंग्लैण्ड जैसे देशों ने दुनिया के कृषि प्रधान देशों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। युद्ध हुए नये समाज की जटिलताओं ने तमाम तरह के तनावों को जन्म दिया। दुनिया के बड़े चिकित्सा वैज्ञानिकों का मानना है कि हाइपरटेन्शन, हृदय रोग, कैंसर, मस्तिष्क संबंधी तमाम बीमारियों का सबसे बड़ा कारण आधुनिक समाज के तनाव हैं। इस समाज की तेज भाग-दौड़ती जिंदगी में रोगों के इलाज के लिए परम्परागत चिकित्सा पद्धतियां अपर्याप्त साबित होने लगीं और धीरे-धीरे चलन से लगभग बाहर हो गयीं। इन परिस्थितियों में औद्योगिक समाज ने अपनी जरूरतों के मुताबिक 'एलोपैथी' को जन्म दिया। एलोपैथी की पहली दवा एंटीबायटिक के रूप में युद्ध में घायल सिपाहियों के उपचार के लिए खोजी गयी थी।
स्पष्ट रूप से औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप बदली सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों ने नई पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति के लिए आधार-भूमि तैयार किया। बाजार पर कब्जा करने के लिए आग्रेयास्तों के प्रयोग से युक्त युद्ध की नई तकनीकी ने एक ऐसी चिकित्सा पद्धति को मानव इतिहास में जरूरी बना दिया जो घायल और मरते हुए सिपाहियों का उपचार करके उन्हें पुनः किसी समीपस्थ युद्ध के लिए तैयार कर सकें।
--
लेकिन ज्ञान की धारा तो रूकने वाली नहीं थी। इस नई चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत ऐसी दवाओं की खोज की गयी जिसने प्लेग, हैजा और चेचक जैसे संक्रामक रोगों पर काबू पाकर प्रत्येक वर्ष उनसे मरने वाले लाखों इंसानों को जीवनदान दिया। घोर अनिश्चित और कभी भी आ धमकने वाली मौत के खौफ से समूची मानवता को मुक्त करने वाली नई चिकित्सा पद्धति का दुनिया ने किसी न किसी अंश तक तो स्वागत किया ही।
लेकिन 20 वीं सदी के प्रथम चरण में एक बड़ा परिवर्तन आया। पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति अब केवल चिकित्सा प्रणाली ही नहीं रह गयी, यह पश्चिमी देशों के आर्थिक साम्राज्य को विस्तार देने का बहुत बड़ा माध्यम बना ली गयी। दवा उद्योग लाभ की दृष्टि से हथियारों के कारोबार के बाद पहले नंबर का व्यापार माना जाने लगा। फलस्वरूप पश्चिम के साम्राज्यवादी देशों ने औषध बाजार पर अपना कब्जा जमाने के लिए जी-तोड़ कोशिश करनी शुरू कर दी। स्वाभाविक रूप से तीसरी दुनिया के तमाम देश उनके लिए सबसे बड़े बाजार साबित हुए। इसलिए वहाँ अपने कारोबार चलाने के लिए पश्चिमी दवा पद्धति को थोपा गया।
इस पद्धति को स्थायी रूप देने के लिए इन देशों की स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों को खत्म करना जरूरी था, जिनके रहते एलोपैथी का विकास संभव नहीं था। साम्राज्यवादी देशों ने एक-एक करके शासित देशों की चिकित्सा पद्धतियों को यह कहकर नकारना शुरू किया कि वे पुरातनपंथी हैं तथा मानव पीड़ाओं का इलाज कर पाने में सक्षम नहीं हैं। कि साम्राज्यवादी शक्तियों की इन साजिशों के चलते कितनी स्वदेशी औषध प्रणालियों ने दम तोड़ दिया और कितनी आज भी तोड़ रही हैं, इसका आसानी से अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
पश्चिम में यह नई चिकित्सा पद्धति समाज की जरूरतों एवं वहाँ की परिस्थितियों के मुताबिक भले ही उपयोगी ठहरती हो लेकिन भारत जैसे तीसरी दुनिया के तमाम सारे देशों के सामाजिक परिवेश, जलवायु एवं अन्य परिस्थितियों के न तो ये पूरी तरह अनुकूल होती हैं और न ही करोड़ों गरीब मरीजों का इलाज कर पाने में सक्षम हैं। बल्कि उल्टे इसने तमाम स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं को जन्म दिया है।
द्वितीय महायुद्ध के बाद साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की पुरानी दीवारों तो ढह गयीं लेकिन उसके स्थान पर साम्राज्यवादी ताकतों ने नव-स्वाधीन देशों के शोषण के लिए ऐसा रूप अख्तियार किया जो बहुत ही जटिल और अदृश्य-सा था। यह रूप कमोवेश समूची दुनिया को आज अपने कब्जे में ले चुका है। यह रूप कोई और नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का है।
भारत जैसे देश में करोड़ो गरीबों को सस्ता उपचार देने के बहाने घुसने वाली, विदेशी दवा कंपनियाँ मरीजों की जेब काट करके अरबों रुपया प्रतिवर्ष बाहर भेज रही है, और दवा के नाम पर देती हैं क्य – जहर, फालतु टॉनिकों की बोटलें और हजारों-हजार गैर-जस्सी दवाएँ। इन कंपनियों ने भारत समेत तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों को कूड़दान समझ रखा है जहाँ पर ये अपनी उन
31
हजारों दवाओं का निर्माण और बिक्री करती हैं जिन पर, प्राण-घातक प्रभावों के कारण, उनके स्वयं के देश के साथ-साथ दुनिया के तमाम देशों में प्रतिबंध लगा होता है।
यह कैसी विडम्बना है कि मानवता को शारीरिक पीड़ाओं से निजात दिलाने के लिए खोजी गई नई चिकित्सा पद्धति को बहुराष्ट्रीय निगमों ने मौत के व्यापार में बदल दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस बात को स्वीकार करता है कि दवा बनाने वाली दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय निगमों अपने मुनाफे के लिए गरीब मुल्कों में हजारों- हजार अनाप सनाप दवाएँ तूँस रही हैं जो रोगों से मुक्ति दिलाने के बजाए रोगियों के प्राण ले लेती हैं।
भारतीय दवा उद्योग पर कब्जा
आजादी के बाद 1948 की राष्ट्रीय औद्योगिक नीति ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत की आर्थिक दुनिया में फलने-फूलने का भरपूर अवसर दिया। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था, पश्चिम के चमचमाते औद्योगिक मॉडल के प्रति उनकी रीझ एवं गांधी की कुटीर अर्थव्यवस्था के प्रति उनके विकर्षण ने भारत को यूरोप की विकासवादी अवधारणा के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिया। संसद में नेहरू के बयान ने विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को और अधिक प्रोत्साहित किया। नेहरू ने विदेशी पूँजी निवेश और विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को स्वागत करते हुए कहा था कि इससे विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में एवं अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी। ऐसी स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था में पश्चिमी देशों को घुसने का पर्याप्त मौका मिला। उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में इंग्लैण्ड और अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने बड़ी तेजी से घुसपैठ करनी शुरू की। अस्त निर्माण के बाद इन कम्पनियों के लिए फायदे का दूसरा बड़ा क्षेत्र औषध का था। मौके का फायदा उठाते हुए इन कम्पनियों ने दवा उद्योग पर कब्जा करना शुरू कर दिया। चूंकि दवा उद्योग के क्षेत्र में भारत की कोई अलग औद्योगिक नीति नहीं थी इसलिए 1948 की औद्योगिकरण की प्रक्रिया तेज करने के लिए सामान्य औद्योगिक नीति में विदेशी एवं भारतीय उद्योगों के बीच कोई भेद-भाव नहीं बरता जायेगा तथा दोनों को समान रूप से सुविधायें मुहैया करायी जायेंगी। इसके पीछे यह भी अवधारणा काम कर रही थी कि देश का नये औषध विज्ञान(एलोपैथी) से परिचय हो सकेगा, यह उसकी तकनीक सीख सकेगा तथा बहुराष्ट्रीय निगमों भारत की करोड़ों बीमार जनता के लिए पूरी तरह से दवाएँ उपलब्ध करायेंगी।
1948 की राष्ट्रीय औद्योगिक नीति ने हमारे देश में बहुराष्ट्रीय निगमों की बाढ़ ला दी। इन निगमों ने स्वदेशी दवा उद्योग पर घातक प्रहार किया, बाजार पर कब्जा किया और संचार माध्यमों के जरिए पाश्चात्य दवा संस्कृति को हमारे अन्दर स्थापित कर दिया।
आजादी के पहले देश में आयुर्वेदिक औषध पद्धति का ही प्रचलन था। यद्यपि अंग्रेजों ने पश्चिमी दवा पद्धति की नींव डाल दी थी। कुछ लाइलाज या प्राणघातक बीमारियों जैसे टी.बी, हैजा, मियादी बुखार का एलोपैथी में इलाज संभव हो सकने के कारण इसे आगे बढ़ने का बल मिला। ऐसा नहीं था कि भारतीय दवा पद्धति में इनका इलाज नहीं था बल्कि अंग्रेजों ने इसके विकास को
32
हतोत्साहित किया। दवा उद्योग के क्षेत्र में अंग्रेजों की घुसपैठ 1924 में शुरू हो गयी थी जब ब्रिटिश कंपनी ग्लैक्सो ने यहाँ अपना कारोबार शुरू किया था। लेकिन फिर भी यहाँ अंग्रेजी दवा कंपनियों की जड़ जम नहीं पायी थी। एलोपैथी के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिक अनभिज्ञ तो थे नहीं। इसके लाभ को मुद्दे नजर रखकर इस सदी की शुरुआत में ही आचार्य पी.सी. राय एवं प्रो.टी. के. गज्जर ने फार्मास्यूटिकल उद्योग की स्थापना की थी। यहाँ की प्रमुख बीमारियों को देखते हुए सेरा, वैक्सिन तथा मलेरिया प्रतिरोधी दवाओं की खोज तथा उसका निर्माण किया गया। बंगाल इसका केन्द्र बना। यही नहीं द्वितीय महायुद्ध के पूर्व यूरिया स्टीबमाइन की खोज तथा राल्फिया सर्पेन्टीना पर शोध चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान साबित हुआ। पश्चिमी बंगाल के डॉ. घोष का पेन्सिलीन के निर्माण में नया योगदान स्वदेशी दवा तकनीक के विकास में काफी महत्व का है। इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अन्य क्षेत्रों की भाँति दवा उद्योग के भी क्षेत्र में राष्ट्रीयता का संचार हुआ था और बिना विदेशी मदद के भारतीय औषध (फार्मास्यूटिकल) उद्योग को विकसित करने का संकल्प लिया गया था।
लेकिन इसके साथ ही साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी अपना कारोबार बढ़ाने के लिए कार्यरत थीं। 1948 की भारत सरकार की औद्योगिक नीति ने तो उनके लिए रास्ता खोल दिया। विज्ञापनों एवं अन्य प्रचार के जरिये बाजारों पर कब्जा करने की पारराष्ट्रीय निगमों की आक्रमणकारी नीति ने आयुर्वेदिक दवा पद्धति को तो प्रचलन से बाहर कर ही दिया, भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग को भी काफी पीछे छोड़ दिया। आत्मनिर्भर राष्ट्रीय दवा उद्योग के विकास के सारे प्रयासों पर पानी फिर गया। 50 के दशक में दवा के क्षेत्र में दुनिया की कुछ बड़ी बहुराष्ट्रीय निगमों ने देश में अपना कब्जा जमा लिया। अमेरिका की फाइजर कंपनी, स्विटजरलैंड रोश, अमेरिका की सीबा गायगी तथा बेयर इण्डिया जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपने को स्थापित कर लिया। इसका एक कारण और था। आधुनिक दवा उद्योग की बुनियाद मूल रासायनिक उद्योग की बुनियाद पर खड़ी है और यह स्पष्ट है कि साम्राज्यवाद ने अपने औपनिवेशिक शोषण के उद्देश्य से इस देश में मूल रासायनिक उद्योग का स्वाभाविक विकास नहीं होने दिया तथा वैज्ञानिक - अनुसंधान और कारीगरी की शिक्षा को पंगु बनाकर रख दिया। नये उपकरणों से सज्जित दवा कंपनियों की तीव्र प्रतियोगिता में घरेलू और देशी दवा उद्योगों का पुनः हास होने लगा।
सन् 1948 में दवा की कुल बिक्री 10 करोड़ की थी जो 1982 में बढ़कर 1200 करोड़ हो गयी और 1992-93 में 7500 करोड़ हो गयी। इसमें 80 प्रतिशत हिस्सा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में था। 1975 में केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित हाथी कमेटी ने दवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के राष्ट्रीयकरण की सिफारिश की थी। हाथी कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि “सामान्य पूंजी लगा कर ये कंपनियाँ अपनी औषधियों की बिक्री कर अत्यधिक मुनाफा विदेशों को भेज चुकी हैं। तथा बेहिसाब निजी पूंजी में वृद्धि की है”।
३३
गैट समझौता और नया पेटेंट कानून
गैट समझौता होने से और भारतीय पेटेंट कानून - 1970 के बदले जाने से भारतीय दवा उद्योग पूरी तरह नष्ट हो जायेगा और भारतीय दवा बाजार पर एकाधिकारवादी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियाँ छा जायेगी। गैट समझौता में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बौद्धिक सम्पदा कानूनों (ट्रिप्स) को लेकर है जिसके कारण हमारा 1970 का भारतीय पेटेंट कानून पूरी तरह बदल जायेगा। 1 जनवरी 95 को सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए नया पेटेंट कानून लागू भी कर दिया था। हालांकि देशव्यापी विरोध के कारण नया पेटेंट कानून संसद से मंजूरी नहीं पा सका।
1956 में अंग्रेजों ने पेटेंट व्यवस्था लागू की थी। 1911 में भारतीय पेटेंट और डिजाइन एक्ट बनाया गया जिसका उद्देश्य भारतीय बाजार को ब्रिटिश उद्योगों के अधीन बनाना था। ब्रिटिश पेटेंट धारकों ने भारत में ऊँची कीमत वाले निर्यात द्वारा हमारे बाजारों का शोषण किया और करोड़ों रूपये कमाये थे। यह लाजिमी था कि यह शोषण दवा क्षेत्र में भी होता। आजादी के पहले और बाद में भी दवाओं का उत्पादन बहुत और देश मुख्यतः आयात पर ही निर्भर था। कोई नई दवा आती थी तो वह पेटेंट धारकों की मर्जी के अनुसार ही आती थी। ऐतिहासिक दृष्टि से विदेशी कंपनियों ने भारत में अपने पेटेंट पंजीकृत नहीं करवाये। 1947 से 1957 के बीच भारत में कराए गये 1704 दवा पेटेंटों में 99 प्रतिशत पेटेंट विदेशी नागरिकों के पास थे और एक प्रतिशत से कम को भारत में व्यापारिक उपयोग में लाया गया।
1970 का 'भारतीय पेटेंट कानून' हमारे हित के मुख्य क्षेत्रों की रक्षा करने के लिए बनाया गया था। इसमें केवल चार क्षेत्रों- दवा उद्योग, कृषि रसायन, भोजन और विशिष्ट रसायनों के मामले में कानून ने 7 वर्ष के लिए प्रक्रिया पेटेंट की अनुमति दी, लेकिन उत्पाद पेटेंट की अनुमति नहीं दी है। मुख्य बात यह है कि इस कानून में एकाधिकार को रोकने के लिए 'स्वतः लाइसेंस के अधिकार' का प्रावधान किया गया है। 1970 के पेटेंट कानून को अंकटाड ने प्रगतिशील कानून घोषित कर उसे अन्य देशों के लिए भी एक माडल बताया। इसी कानून का नतीजा था कि 1970 के बाद उद्योग आगे बढ़ा। परन्तु भारतीय दवा उद्योग से योग्यता के आधार पर स्पर्धा करने में असमर्थ होने पर ये 'मुक्त बाजार' के वकील अब निराश होकर अपना एकाधिकार जमाने की फिराक में हैं।
भारतीय पेटेंट कानून-1970 के लागू होने के बाद देशी दवा उद्योग में अच्छी प्रगति हुई और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भरता कम होने लगी। 1974 में दवा उत्पादन 500 करोड़ रूपये से बढ़कर 1991 में 4000 करोड़ और 1994 में 6000 करोड़ रूपये का हो गया था। इसी प्रकार 1985-86 से 1991-92 के बीच 6 वर्षों की अवधि में हमारा दवा निर्यात 140 करोड़ रूपये से बढ़कर 1281 करोड़ रूपये का हो गया था। 1991-92 में 76 करोड़ रूपये की दवाइयाँ अमेरिका को निर्यात की गयी। भारतीय दवा कंपनियों को जो भी सफलता मिली उसके पीछे पेटेंट कानून - 70 का बहुत हाथ रहा।
34
गैट समझौते का सहारा लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इस पेटेंट कानून को बदलवाना चाहती हैं, उनका कहना है कि भारतीय दवा कंपनियाँ उनके फार्मूलेशनस चुरा कर दवाइयों का उत्पादन कर रही हैं। हालाँकि यह सही नहीं है। 1970 के पेटेंट कानून के मुताबिक केवल 'प्रक्रिया पेटेंट' का फायदा देशी कंपनियों का मिला। परंतु अब गैट के मुताबिक 'उत्पाद पेटेंट' लागू हो जायेगा तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अधिकतर दवाइयों पर अधिकार हो जायेगा। पेटेन्टीकृत दवाइयों का प्रतिशत नीचे सूची में दिया गया है, जिससे हम अन्दाजा लगा सकते हैं कि नया पेटेंट कानून लागू हो जाने के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों की स्थिति कितनी मजबूत हो जायेगी। भविष्य में बनने वाली सभी दवाइयों पर पेटेंट अधिकार लागू होंगे जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे में रहेगे। नये पेटेंट कानूनों का प्रभाव होगा
- (1) दवाइयों के दाम 5 से 20 गुना और अधिक हो जायेंगे।
- (2) दवाइयों की आपूर्ति प्रभावित होगी क्योंकि अब यह आयात पर ज्यादा निर्भर होगी।
- (3) दवा उद्योग में नये पूंजी निवेश पर असर पड़ेगा।
- (4) सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय स्वास्थ्य रक्षा कार्यक्रम जो उन नागरिकों के लिए चलाए जाते हैं जो अपने स्वास्थ्य की आवश्यकताओं के लिए खर्च नहीं कर सकते, प्रभावित होंगे।
- (5) राष्ट्रीय दवा उद्योग का विकास प्रभावित होगा।
- (6) राष्ट्रीय शोध एवं विकास प्रभावित होगा।
आज दुनिया के दवा उत्पादन के 90% हिस्से पर 30 बड़ी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियाँ अपना अधिकार रखती हैं और अनुचित पेटेंट व्यवस्था और बौद्धिक सम्पदा अधिकारों की रक्षा के नाम पर, 90 विकासशील देशों, जहाँ दवा का स्थानीय उत्पादन नहीं है और वे अधिकतर आयात पर निर्भर करते हैं, की असहाय गरीब और निरीह जनता का शोषण कर रही हैं। इन सभी 90 देशों में विकसित देशों के ही पेटेंट कानून लागू हो चुके हैं जिन्हें मानने का कारण वे 2000% अधिक मूल्य देकर अपना शोषण करवा रहे हैं। इण्डियन ड्रग्स मैनुफैक्चर्स एसोसियेशन के अध्यक्ष श्री.आई.ए. मोदी कहते हैं कि "भारत सहित करीब 15 विकासशील देश ऐसे हैं जो अपनी दवा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए फार्मूलेशन के उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर हैं। इन देशों में भी भारत ही एक मात्र देश है जहाँ दवा उत्पादन अभी भी देशी उत्पादकों के हाथ में है। अन्य 14 देशों में दवाइयों का मुख्य उत्पादन या तो सीधे बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा नियन्त्रित होता है या बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लाइसेंस प्राप्त राष्ट्रीय इकाइयों द्वारा होता है जिनकी दवाइयों के बिक्री मूल्य के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ नियन्त्रित करती हैं। भारत इसका अपवाद है यहाँ 60% से अधिक दवा फार्मूलेशन और 80% से अधिक बल्क दवाएं पूरी तरह से राष्ट्रीय इकाइयों द्वारा उत्पादित के कारण और भारत में 1970 के पेटेंट कानून के कारण दवा मूल्य संसार में सबसे सस्ते हैं। मूल्यों में 500% से 2000% तक का अन्तर है।
35
जान लेवा दवाओं का व्यापार
हमारे देश में इस समय लगभग 515 दवाएँ ऐसी हैं जो बाजार में लगभग 8000 विभिन्न नामों से बिक रही हैं। इन दवाओं पर दुनिया के तमाम देशों में पाबन्दी लगायी जा चुकी है तथा इनके निर्माण और बिक्री को घातक अपराध घोषित किया जा चुका है। डाक्टरों और वैज्ञानिकों का कहना है कि ये दवाएँ प्राणघातक हैं और आदमी के रक्त को प्रदूषित कर कैंसर, लकवा, अंधापन, विकलांगता जैसी भयंकर बीमारियों को जन्म देती हैं तथा शरीर की रोग से लड़ने की क्षमता खत्म कर देती हैं। ये दवाइयाँ आने वाली पीढ़ियों में शारीरिक तथा मानसिक-विकृतियाँ भी पैदा करती हैं। यह गम्भीर चिन्ता का विषय है कि दुनिया के अन्य तमाम देशों में “जहर” घोषित की जाने वाली कुछ दवाएँ हिन्दुस्तान में खुली बिक्री की इजाजत पा चुकी हैं। यहाँ कुछ ऐसी दवाओं के नाम दिये जा रहे हैं जो दूसरे तमाम देशों में प्रतिबंधित हैं लेकिन हमारे यहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनायी और बेची जाती है। इन दवाओं को मुख्य रूप से में एण्ड बेकर, सीबा गायकी, बारोजवेलकम, पार्क डेविस, ज्योफ्रीमैन्स, फाइजर, हेक्स्ट, सैण्डोज, रोस, स्केफ, एस.जी. फार्मास्युटिकल, ग्लैक्सो, बूट्स कंपनी, ईस्ट इंडिया कंपनी तथा इंफार इण्डिया कंपनियाँ बनाती हैं। इन दवाओं को बेचकर ये कंपनियाँ देश का अरबों रूपया प्रतिवर्ष बाहर भेज रही हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ऐसे कई सम्मिश्रण बनाये हैं जो कि निरर्थक होने के साथ-साथ हानिप्रद भी होते हैं। मिसाल के तौर पर क्लोरोफेनिकाल तथा स्ट्रैटोमाइसिन का सम्मिश्रण जो पेचिस में दिया जाता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों का
कहना है कि यह सम्मिश्रण बहुत ही अतर्कसंगत और नुकसानदेह है, फायदा बिल्कुल नहीं औषध सलाहकारी समिति की 1980 की सिफारिश में क्लोरोफेनिकाल के सभी एफ.डी. सम्मिश्रणों पर रोक लगा दी गयी थी। लेकिन दुःख कि बात है कि इस रोग में उक्त सम्मिश्रण शामिल नहीं था। फलतः आज भी यह खुले बाजारों में उपलब्ध है। इसी तरह पेंसिलीन और स्ट्रैटोमाइसिन, पेंसिलीन और सल्फानामाइड्स, विटामिन्स और एनालजिक्स, टेट्रासाइक्लीन एवं विटामिन सी, आदि के सम्मिश्रण भी बेहद नुकसानदेह हैं। लेकिन सारे सम्मिश्रण बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा तैयार किये और आपूर्ति किये जाते हैं।
खतरनाक गर्भ निरोधक बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के गुप्त हथियार
बहुराष्ट्रीय कंपनियों, विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा थोपे गये संरचनात्मक समायोजन · कार्यक्रमों की अनिवार्य शर्त है जनसंख्या नियंत्रण। हालांकि इस शर्त को लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने से कोई मतलब नहीं पर यह शर्त सुनिश्चित करती है कि हर हथकण्डा अपना कर हर हालत में विकासशील देशों की जनसंख्या को नियंत्रित किया जाए और साथ में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाये जा रहे खतरनाक गर्भ निरोधकों को बेचकर भारी मुनाफा भी कमाया जाए। पिछले तीन दशकों से सरकार का परिवार नियोजन कार्यक्रम अमेरिकी आर्थिक सहायता से जुड़ी शर्तों के अनुसार चल रहा था। जिसके लिए सरकार ने गर्भ निरोधकों के स्थान पर नसबंदी पर जोर
36
दिया, परंतु जोर जबरदस्ती नसबंदी करने के राजनैतिक दुष्परिणाम सामने आये तो यह नीति त्याग दी गयी और गर्भ निरोधक दवाइयों को प्रोत्साहन दिया गया।
भारतवासियों को गेहूँ-चावल के बीच चुनाव कर भरपेट खाना दिलाने में असमर्थ रही सरकार इस बात के लिए तैयार थी कि इन भूखी औरतों को दुनिया की नई गर्भ निरोधक दवा मिले। 60 के दशक में इजाद ज्यादातर गर्भ निरोधक, हार्मोन पर आधारित लंबी अवधि तक असर रखने वाले रसायन ही थे। इनमें कृत्रिम हार्मोन इस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रान के अलग-अलग मिश्रणों से बने गर्भ निरोधक शामिल थे, जिन्हें खाने की गोलियों से लेकर सुइयों, चमड़ी के अन्दर रोपे जाने वाले कैप्सूल, योनि में रखे जाने वाले छल्लों, नाक में छिड़की जाने वाली दवाइयों के रूप में इस्तेमाल किया गया। इस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रान के संयोग से बनी ये दवाइयाँ गम्भीर बीमारियों का कारण बनीं, जिनमें दिल व रक्तचाप की बीमारी, थकके जमने की बीमारी, कैंसर, पाचन संबंधी गड़बड़ियाँ, भ्रूण पर विपरीत असर वाली बीमारियाँ शामिल थी। इसी दौरान दो नई प्रकार की सुइयों का भी अविष्कार हुआ। जर्मनी की 'शेरिंग ए जी' नामक कंपनी द्वारा बनायी 'नेट-इन' व अमेरिका की अपजान कंपनी द्वारा बनाई 'डिपो प्रोवेरा'। नेट इन और डिपो प्रोवेरा सुइयों के गंभीर प्रभाव औरतों के शरीर पर पड़ते हैं, सुई लगवाने के बाद औरतों का शरीर फूल जाता है, चक्कर आते हैं, सरदर्द की शिकायत, थकान, भूख न लगना अथवा अत्यधिक भूख लगना, वैवाहिक संबंधों और किसी को हर समय खून रिसता रहता है। अगर वे बच्चे को स्तनपान करा रही हैं तो दूध की मात्रा व गुणवत्ता पर असर पड़ता है। पेट व स्तनों को छूने से दर्द, घबराहट व उदासी की बीमारी, एलर्जी, हृदय रोग खून के थकके जमने की बीमारी भी हो सकती है। कुल मिलाकर डेपो प्रोवेरा के निर्माता ने 78 दुष्प्रभावों को स्वीकार किया है। एक बार लगवाने के बाद दुबारा औरतें इनके पास फटकती भी नहीं। परंतु इनकी निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि इन्होंने विकासशील देशों में अपने बाजार दृढ़ लिये, जहाँ की सरकारें पहले से ही जनसंख्या नियंत्रण के लिए हाथ पैर मार रही थी। डिपो प्रोवेरा के परीक्षणों से ही इतनी ऊपर तक पहुँच थी कि ये गर्भ निरोधक बिक्री के लिए बाजारों में आ गये। अमेरिका में डॉक्टर काली चमड़ी की किशोरियों को उस समय से डिपो प्रोवेरा लगाते चले आ रहे हैं जब वहाँ की सरकार ने इसे स्वीकृति तक नहीं दी थी। इसी तरह न्यूजीलैंड के आदिवासियों व इंग्लैण्ड के अश्वेतों को यह सुई लगाई जा रही है, और अब तीसरी दुनिया के अन्य मुल्कों में इसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। डिपो प्रोवेरा की भुक्त भोगी वे सभी मनुष्य प्रजातियाँ हैं जिनकी संख्या को सीमित रखना श्वेत नस्ल की अगुवाई बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
एड्स और कण्डोम का व्यापार
एड्स का हल्ला मचा कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों (साथ ही साथ देशी कंपनियों ने भी) कण्डोम का बाजार खड़ा किया है और सौ करोड़ रूपये का सालाना मुनाफा कम रही हैं। हालांकि एड्स खतरनाक बीमारी है और यौन संसर्ग के अलावा कई अन्य तरीकों से भी इसका प्रसार होता है। जैसे इन्जेक्शन की सुई द्वारा, रक्त लेने से एवं पसीने के सम्पर्क द्वारा। परन्तु बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शह पर एड्स को रोकने के जिन तरीकों को ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है उनमें हैं सुरक्षित सम्भोग
37
और कण्डोम का प्रयोग। डॉक्टर लार्ड ओ कलिंग्स के अनुसार एक बार के यौन सम्पर्क से 0.1-1 प्रतिशत, सूर्ई से 0.5-1 प्रतिशत, रक्त चढ़ाए जाने से 0.9 प्रतिशत एड्स होने की सम्भावना रहती है। इस तरह संक्रमित व्यक्ति के साथ सम्भोग या सूर्ई के इस्तेमाल और रक्त चढ़ाने से एड्स होने की बराबर सम्भावनाएं रहती हैं। देश में यौन संबंधों के लायक सिर्फ 30% लोग ही हैं जो अधिकतर अपने जीवन साथी के अलावा किसी अन्य से यौन सम्पर्क नहीं बनाते। दूसरी तरफ बच्चे से लेकर बूढ़े तक इन्जेक्शन की सूर्ई का प्रयोग करते हैं अतः इस रास्ते एड्स फैलने की सम्भावनाएं बहुत अधिक हैं। इसके अलावा रक्तदान द्वारा इस बीमारी का होना लगभग तय है और अभी भी हमारे देश में 50% मामलों में रक्त बिना जांच के ही चढ़ा दिये जाते हैं। भारत में विशेष स्थितियों में उपर्युक्त दोनों तरीकों से एड्स प्रसार की ज्यादा सम्भावनाओं को नजर अंदाज कर यौन सम्पर्कों को ही मुख्य जिम्मेदार मानना पश्चिमी का प्रभाव और कण्डोम निर्माता कम्पनियों की पहुंच का ही परिणाम है। विलासी उपभोक्तावादी संस्कृति के इस दौर में कण्डोम संस्कृति और उस का प्रचार विवाहेतर यौन संबंधों को बढ़ाकर इस बीमारी की जड़ को हरा ही बनायेंगे।
हमारे देश में लगभग 40 करोड़ रुपये का कण्डोम देशी कंपनियाँ और इतना ही कण्डोम विदेशी कंपनियाँ बेच रही है। विदेशी कण्डोमों के बारे में यह बात खास तौर से उल्लेखनीय है कि 1982 से ही सरकार ने इनके आयात पर से सीम शुल्क समाप्त कर दिया था और उस फैसले के बाद ही देश का बाजार विदेशी कण्डोमों से भर गया। करीब 25-30 एजेन्सियाँ जापान, कोरिया, ताइवान, हांगकांग, थाइलैण्ड वगैरा से कण्डोम थोक के भाव मंगाती और बेचती हैं। करीब 20 देशी व 80 विदेशी ब्रांडों अर्थात 100 से ज्यादा ब्रांडों में 100 करोड़ से ज्यादा कण्डोम सालाना बिक रहे हैं।
खतरनाक ट्रूथपेस्ट
ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा तैयार किये गये एक अध्ययन में इस बात पर गम्भीर असंतोष व्यक्त किया गया कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के गैंग ने किस प्रकार “दवा और कास्मेटिक एक्ट-1992” की धज्जियाँ उड़ा दी। इस कानून में फ्लोराइड मिले हुए ट्रूथपेस्टों की बिक्री पर कुछ पाबन्दियाँ लगा दी गयी थीं। राष्ट्रीय पेयजल आयोग द्वारा तैयार किये गये इस दस्तावेज में ग्रामीण क्षेत्रों में फ्लोरोसिस नामक बीमारी(जिसमें हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं, दांत गिर जाते हैं) के खिलाफ लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मियों एवं अन्य विशेषज्ञों को सचेत किया गया है। 90 पेज के इस दस्तावेज में कहा गया है कि फ्लोरोसिस नामक बीमारी उन क्षेत्रों में अधिक होती है जहाँ पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होती है।
बूचड़ खाने से खून और हड्डियाँ दवा कंपनियाँ ले जाती हैं
दिल्ली के ईदगाह बूचड़खाने से रोजाना निकलने वाला 13 हजार लीटर खून बड़ी-बड़ी दवार कम्पनियाँ टॉनिक बनाने के लिए ले जाती हैं। खासतौर पर गर्भवती महिलाओं के लिए पशुओं के खून से बनने वाला ‘डेक्सोरेंज’ टॉनिक बहुत लोकप्रिय है। खून ही नहीं, काटे गये पशुओं के
38
तकरीबन हर अंग का इस्तेमाल टूथपेस्ट, सरेस, फेवीकोल, चीनी के बर्तन, सनमाइका, इंसुलिन इंजेक्शन आदि बनाने में होता है। बूचड़ खाने में सब जानवरों का मिला जुला खून इकट्ठा किया जाता है। इसके बावजूद दवा बनाने वाली कंपनियों को खून की कमी पड़ती रहती है।
खून के साथ-साथ बाकी अंगों का इस्तेमाल भी दवाई और कई दूसरी चीजें बनाने में किया जाता है। इनकी हड्डियों को जलाकर उसका पाउडर टूथपेस्ट, चीनी के बर्तन और सनमाइका बनाने में इस्तेमाल किया जाता है।
मच्छर मार दवाएं घातक हैं
एक तरफ जहाँ अनुसंधानकर्ता मच्छरों से मुक्ति के लिए परेशान हैं वहीं दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय उद्योग मच्छर भगाने वाली दवाएं और अन्य उपकरण काफी बड़े पैमाने पर बनाने में लगे हुए हैं। मच्छरमार दवाओं और उपकरणों को बड़े पैमाने पर उत्पादित, विज्ञापित और बिक्री किया जा रहा है। करोड़ों अरबों डॉलर का इनका कारोबार हो गया है उपकरणों और दवाओं से मच्छर तो भागते हैं परंतु मानव स्वास्थ्य पर इनका गंभीर असर पड़ता है।
पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि मच्छरों से बचने के लिए निकली अधिकतर दवाओं में मेलफोक्कीन नामक रसायन होता है जो दिमाग और शरीर के लिए घातक हो सकता है। हमारे देश में मच्छरमार दवाओं में कुछ ऐसे कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है जो अन्य देशों में प्रतिबंधित हैं। इसी कारण निर्माता कंपनियाँ कीटनाशक उत्पादों की संरचना की जानकारी का खुलासा भी नहीं करतीं।
बाजार में बिक रहे इन मच्छरमार ब्रांडों में विपैले रसायन 'डी-एथीलीन' का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसके लगातार उपयोग से स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बिजली से चलने वाले उपकरणों में जो धुँआ निकलता है उसमें फोसफीन नामक गैस से सिरदर्द, एलर्जी, नाक में खुशकी, होठों का सूखना, गले में खराश वगैरा हो जाती है। इसके लगातार प्रयोग से दम घुटने और साँस रूकने की स्थिति बन जाती है जो दिल और दमा के मरीजों के लिए घातक हो सकती है।
अनावश्यक दवाओं व गैर-जरूरी टॉनिकों का उत्पादन
भारत पारराष्ट्रीय निगमों द्वारा प्रतिबंधित अनावश्यक और नुकसानदेह दवाओं को खपाने का बहुत बड़ा बाजार रहा है। देश की जलवायु और यहाँ फैलने वाले विभिन्न रोगों के मुताबिक इन्होंने कभी भी दवाओं का निर्माण नहीं किया। भारत में मुख्य रूप से टी.बी., कुछ रोग, आंत्रज्वर, पेचिस, फाइलेरिया के मरीज अधिक हैं। इस समय बाजार में 50 से 60 हजार प्रकार के फार्मूलेशन उपलब्ध हैं। लेकिन विडम्बना है कि टी.बी मलेरिया, पेचिस तथा फाइलोरिया जैसे रोगों की दवाओं की बाजार में कमी है। हाथी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 117 या 150 दवाएँ ही अत्यावश्यक हैं जो 89-90 प्रतिशत लोगों की रोग के व्याधि में काम आती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के
39
मुताबिक भारत में प्रचलित रोगों के इलाज के लिए मात्र 250 दवाओं की जरूरत है मूल उत्पादन जो व्यापक पैमाने पर दवाओं की जरूरतों को पूरा करता है, वह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा बहुत ही कम तैयार किया जाता रहा है, यहाँ तक की लघु क्षेत्र से भी कम। सन् 1973 में इस देश में 5300 टन मूल रसायन (ब्लक) का उत्पादन हुआ, इनमें से मात्र 10 प्रतिशत का उत्पादन साधन सम्पन्न टेक्नॉलाजी के माध्यम से इन विदेशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने किया था। बाकि 90 प्रतिशत का उत्पादन भारतीय जनता और निजी संस्थाओं ने किया था। राष्ट्रीय क्षेत्र में 33 प्रतिशत उत्पादन हुआ।
इस बात में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं कि विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने दवा उद्योग पर अपना एकाधिकार स्थापित करने एवं बेतहाशा मुनाफा कमाने की नीयत से समूचे नैतिक मानदंडों, राष्ट्रीय कानूनों और वायदों को तोड़ा है। भारत समेत गरीब मुल्कों को इन कम्पनियों ने अपनी जागीर बना रखा है। हमारे देश में जिन रोगों की बहुलता है और उनके इलाज के लिए दवाएँ आवश्यक हैं उनका उत्पादन ये कम्पनियाँ अपने फायदे की गणित सही करने के लिए न के बराबर करती हैं। इसके बदले ये ऐसी दवाओं और टॉनिकों का उत्पादन करती हैं जो गैर-जरूरी होता है। लेकिन जिसमें मुनाफे का प्रतिशत अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा होता है।
आर्थिक दोहन
आजादी के बाद खासकर दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्योतने के पीछे जो उद्देश्य था वह एक साल के अन्दर चकनाचूर हो गया। देश को करोड़ो मरीजों के लिए पर्याप्त दवाओं की पूर्ति तो हो ही नहीं सकी, उल्टे एक वर्ष की अवधि (1951-52) के दौरान भारत को 15.6 करोड़ रुपये के मूल्य के बराबर दवायें आयात करनी पड़ी। इस गरीब देश की जनता की जेब से करोड़ों-अरबों रूपया रॉयल्टी के नाम पर इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जरिये विदेश चला जाता है। साथ ही साथ इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मुनाफे की राशि साल-दर-साल बढ़ती गयी।
स्वास्थ्य के व्यावसायीकरण की उनकी नीतियों ने भारतीय दवा कम्पनियों का भट्टा बैठा दिया है। दवा के लाइसेंस पर प्रसाधन सामग्रियाँ तथा 90 फीसदी से अधिक गैर-जरूरी दवाएँ बनाने वाली कम्पनियाँ सबसे भ्रष्ट और क्रूर तरीके अपनाकर भारतीय बाजारों पर अपना कब्जा जमायी है। दूसरी तरफ सस्ती और अधिक उपयोगी विकल्प देने वाली भारतीय दवा कम्पनियाँ लगातार घाटे का शिकार होती जा रही हैं।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से मुक्त दवा-उद्योग की जरूरत
हमारे देश में एक से अधिक चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलन में हैं। सर्वप्रथम इस देश की मिट्टी और आबो-हवा से पैदा और यहाँ की परम्परागत सोच और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति हैं। इसी से मिलती यूनानी पद्धति है। अंग्रेजी, फ्रांसीसी एवं पुर्तगालियों के सम्पर्क
40
की बदौलत एलोपैथी एवं होम्योपैथी आयी। दो सौ सालों के औपनिवेशिक शासन और आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के शिकंजे ने हमारी अस्मिता को तोड़ा और वैज्ञानिक धरोहर को रौंदा। नतीजा यह कि एलैपैथी के मुकाबले भारतीय पद्धतियाँ पिछड़ते-पिछड़ते गुलामी की हालत में रह गयी हैं। सरकार ने आजाद भारत में सर्वप्रथम एलोपैथी पद्धति की शिक्षा एवं चिकित्सालयों के नियमन के लिए 1956 में भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (इण्डियन मेडिकल काउंसिल) का गठन संसद से पारित एक आधिनयम के तहत किया। आधुनिक पद्धति में ही अनुसंधान हेतु आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (मेडिकल रिसर्च काउंसिल) पहले से ही गठित थी। कुछ अर्से बाद भारतीय एवं होम्योपैथी अनुसंधान की केन्द्रीय परिषद(सी.सी.आर.एम.एच.) का गठन किया गया। लोकतान्त्रित दबावों के चलते 1970 में केन्द्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद (सी.सी.आई.एच.) का गठन किया गया। इसके बाद भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी में अनुसंधान के लिए 1977 में आयुर्वेद एवं सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथी, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों हेतु अलग-अलग केन्द्रीय अनुसंधान परिषदों का गठन किया गया। इस प्रकार वर्तमान में केन्द्रीय स्तर पर विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शिक्षा एवं चिकित्साभ्यास हेतु तीन परिषदें एवं अनुसंधान हेतु 6 परिषदें कार्य कर रही हैं। इसके अलावा सी.एस.आई.आर के साथ-साथ आई.सी.एल.आर भी कभी-कभी ऐसे कार्यक्रमों के साथ आगे आती हैं जो चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से जुड़े हैं। देश में आधुनिक, भारतीय एवं होम्योपैथी के लगभग 104,120 एवं 94 कालेज चल रहे हैं।
कीटनाशकों का भी निशाना है हमारा स्वस्थ
कीटनाशक दवाइयों के छिड़काव वाले गेहूँ के आटे की तली हुई पूरियाँ खाने वाले उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के करीब डेढ़ सौ व्यक्तियों के मौत के शिकार बनने की घटना अभी जेहन में बरकरार है। हालत यह है कि इस तरह के छोटे-बड़े समाचार आये दिन सुर्खियों में पढ़ने को मिल जाते हैं। इन समाचारों से विचारक एक बार फिर चिंतित होने लगे हैं। संकर बीज के आगमन के बाद कीटनाशकों के उपयोग में तेजी से वृद्धि होने के कारण आज कुल खेती योग्य जमीन के चौथे भाग में इस जह का इस्तेमाल शुरू हो गया है। उसमें आधे से अधिक भाग तो डी.डी.टी.बी.एच.सी और मैलाथियोन का ही है। पचास के दशक में इन दवाइयों का वार्षिक उपयोग सिर्फ दो हजार टन था, जो आज बढ़ कर अस्सी हजार टन तक पहुँच चुका है। फिर भी ताज्जुब तो यह है कि जीव-जन्तु, रोग आदि से फसल को जो नुकसान होता था, उसका आकंड़ा, जो सन् 1976 में 3300 करोड़ टन था, वह आज बढ़कर छः हजार करोड़ टन हो गया है। सन् 1960-61 में 64 लाख हेक्टेअर में यह जहर डाला जाता था, अब उसके स्थान पर आठ करोड़ हेक्टेअर में डालने का यह नतीजा है। ओटावा स्थिति इंटरनेशनल डेवेलपमेंट रिसर्च सेंटर का दावा है कि तथाकथित विकसित देशों में ही कीटनाशकों के जहर से हर वर्ष दस हजार आदमी मर जाते हैं और दूसरे चार लाख आदमी तरह-तरह के विपरीत परिणामों से पीड़ित होते हैं। ऐसे जहरों को हम क्या कहेंगे- कीटनाशक या मानव भक्षक? इनके मुख्य शिकार खेत मजदूर होते हैं। पाश्चात्य देशों में जिन पर पांबदी लगाई गयी है, वैसे रसायन तीसरे विश्व में उड़ेले जाने के कारण यह परिस्थिति पैदा हुई है। महाराष्ट्र तथा आंध्रप्रदेश
41
में रूई(कपास) उगाने वाली पट्टी में इन कीटनाशकों के कारण खेत मजदूरों में अन्धत्व, कैंसर, अंगविकृतियाँ, लीवर के रोग तथा ज्ञानतन्तुओं के रोग होने के उदाहरण पाये गये हैं।
पेप्सी कोला-कोका कोला का सच सपनों के सौदागर
5 अगस्त 2003 को भारत के सभी टी.वी चैनलों एवं समाचार पत्रों में पेप्सी-कोला एवं कोका-कोला के बारे में एक भंयकर सत्य उद्घाटित हुआ। दिल्ली की एक वैज्ञानिक संस्था “सेन्टर फॉर सायनस एण्ड एनवायरमेंट” की खोजी रिपोर्ट में बताया गया कि पेप्सी एवं कोका-कोला के सभी ठंडे पेयों में अत्यन्त जहरीले एवं खतरनाक कीटनाशक रसायन मिले हुए हैं। उपर्युक्त संस्था की प्रयोगशाला में पेप्सी एवं कोका-कोला के 12 नमूनों की जांच की गयी। इसमें पाया गया कि इन सभी नमूनों में बहुत अधिक मात्रा में रासायनिक कीटनाशक जैसे क्लोरोपायरीफास, मैलाथियान, डी.डी.टी., लिन्डेन आदि मिले हुए हैं। ये सभी कीटनाशक शरीर के लिए अत्यन्त ही हानिकारक होते हैं। इन कीटनाशकों का शरीर के स्वास्थ्य पर बहुत ही खराब असर होता है। इन कीटनाशकों का लीवर, किडनी, शरीर के प्रतिरोधक तंत्र, प्रजनन तंत्र, तंत्रिका तंत्र, श्वसन तंत्र आदि पर बहुत बुरा असर होता है। उदाहरण के लिए लिन्डेन नामक कीटनाशक से शरीर में कैंसर होता है तथा शरीर की सभी ग्रंथियों को भारी नुकसान पहुँचता है। लिन्डेन कीटनाशक की 40 मिली मात्रा किसी भी महिला या पुरुष की क्षमता को समाप्त कर देती है। इस लिन्डेन से लीवर का कैंसर तथा किडनी का कैंसर भी होता है। शरीर के हृदय को रक्त देने वाली नलियों को भी लिन्डेन क्षतिग्रस्त कर देता है। इसी तरह डी.डी.टी. नाम का रासायनिक कीटनाशक पुरुषों के वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या को बहुत कम कर देता है तथा स्त्रियों में वक्ष कैंसर को पैदा करता है। क्लोरोपायरीफॉस नामक जहरीला कीटनाशक मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को नष्ट कर सकता है तथा दिमागी विकास को रोक देता है। इस जहरीले कीटनाशक से मनुष्य शरीर में मांसपेशियाँ अत्यंत कमजोर हो जाती है। मैलाथियान नाम के रासायनिक जहर से जन्मजात शारीरिक विकलांगता आती है तथा शरीर के किसी भी हिस्से में पक्षाघात हो सकता है। 6 अगस्त 2003 को इस विषय पर लोकसभा में काफ़ी हंगामा हुआ। लोकसभा के अनेक सदस्यों ने सरकार से मांग की, कि इस विषय पर स्पष्टीकरण दे और पूरे देश को बताये कि सच क्या है?
सराकर की ओर से जवाब देते हुए स्वस्थ एवं परिवार कल्याण मंत्री सुषमा स्वराज्य ने लोकसभा में कहा कि जल्दी ही सरकार इस विषय पर जांच करायेगी। इसी तरह 21 अगस्त 2003 को राज्यसभा में भी बहस हुई। वहाँ भी मंत्री महोदया ने इसी तरह का आश्वासन दिया। अंत में लोकसभा अध्यक्ष के निर्देश पर संयुक्त संसदी समिति गठन करने का फैसला किया गया। यह संयुक्त संसदीय समिति पेप्सी-कोक में मिले हुए कीटनाशक रसायनों की जांच करने के लिए बनाने का तय किया गया। इस तरह 22 अगस्त 2003 को सरकार द्वारा पेप्सी-कोका कोला की जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन की अधिसूचना जारी की गयी। इस संसदीय समिति में 10 सांसद लोकसभा से एवं 5 सांसद राज्यसभा से लिये गये, समिति के अध्यक्ष शरद पंवार को बनाया
42
गया। समिति में लोकसभा से अनंत कुमार, डा. सुधा यादव, रमेश चैत्रीथला, अवतार सिंह भड़ाना, के. येरत्रनायडु, ई. अहमद, रंजीत कुमार पांजा, अखिलेश यादव और अनिल बसु को लिया गया। इसी तरह समिति में राज्यसभा से एस.एस. अहलवालिया, पृथ्वीराज च्हाण, संजय निरूपम, प्रेमचन्द गुप्ता, प्रशांत चर्टजी को लिया गया। समिति को यह जांच करने की जिम्मेदारी दी गयी कि पेप्सी कोका-कोला के जो भी ब्रांड भारत में बिक रहे हैं उनमें कीटनाशक हैं या नहीं? साथ ही साथ समिति को यह जिम्मेदारी दी गयी कि सरकार को ठंडे पेयों की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए भी सुझाव दे। इस समिति के लिए डा.एस.के.खन्ना, डा. एन.पी. अग्रिहोत्री, डा.जी. त्यागराजन को विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया। इस समिति ने 4 फरवरी 2004 को अपनी रिपोर्ट संसद के सामने पेश की। इस रिपोर्ट को बनाने में संयुक्त संसदीय समिति के सामने कई मंत्रालय पेश हुए। देश के कई विशेषज्ञ एवं संस्थाओं की ओर से भी समिति को काफी जानकारी दी गयी।
सेंटर फॉर सायन्स एण्ड एनवायरमेंट द्वारा मई 2003 में पेप्सी एवं कोका कोला के सभी ब्रांडों की जांच की गयी। जिसमें पाया गया कि यूरोपीय मानकों की तुलना में भारतीय पेप्सी एवं कोक में 21 गुना अधिक लिन्डेन (खतरनाक रासायनिक कीटनाशक), 42 गुना अधिक डी.डी.टी. , 72 गुना अधिक क्लोरोपायरीफॉस, 196 गुना अधिक मैलाथियान उपस्थित है। सी.एस.ई. संस्था की प्रयोगशाला में अमेरिक से लाये हुए पेप्सी एवं कोकाकोला के सभी ब्रांडों की भी जांच की गयी। लेकिन इन अमरीकी नमूनों में कुछ भी रासायनिक कीटनाशक नहीं पाये गये।
संसदीय समिति के अनुसार भारत में कोका-कोला के 52 कारखाने हैं, जिनमें से 27 कारखाने कोका-कोला कंपनी के हैं तथा बाकी 25 कारखाने अन्य दूसरी भारतीय कंपनियों के हैं, लेकिन इनमें 38 कारखाने हैं जिनमें से 17 कारखाने कंपनी के स्वयं के हैं एवं 21 कारखाने अन्य दूसरी भारतीय कंपनियों के हैं, जिनमें पेप्सी-कोला के लिए उत्पादन होता है। पेप्सी एवं कोका-कोला कंपनियों द्वारा संसदीय समिति को दी गयी जानकारी के अनुसार पेप्सी एवं कोका-कोला के ठंडे पेयों की एक साल की कुल बिक्री 4000 करोड़ रुपये से अधिक है।
बहुराष्ट्रीय कंपनी का मकड़जाल
मानव समाज के लम्बे इतिहास में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का उदय एक ऐसी घटना है जिसने मनुष्य की जीवन शैली और अनुभव से परखे टिकाऊ मूल्यों को झकझोर दिया है। नवजात शिशु के भरपूर पोषण के लिए प्रकृति प्रदत्त माँ के स्तनपान की चिरकाल से चली आयी स्वास्थ्य परम्परा के स्थान पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा 'बेबी फूड' को स्थापित करवा देना इसका एक उदाहरण मात्र है। राज्य, राष्ट्रीयता, धर्म, ईमान इन सब से ऊपर उठकर मुनाफा और आर्थिक साम्राज्य की हवस ने इन
43
कंपनियों को 'सुपरस्टेट' बना डाला है जो प्रकृति और मनुष्य दोनों के शोषण पर टिकी है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में - रोजमर्रा के उपभोक्ता सामान से लेकर युद्ध के विकराल हथियार बनाने तक - इनकी घुसपैठ हैं। विश्व के पर्यावरण को, विभिन्न क्षेत्रों के उद्भूत संस्कृतियों को इन कंपनियों ने रोड़ रोलर की तरह रौंद डाला है।
यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति ने पश्चिम के देशों को अपने उपनिवेश बनाने में बड़ी मदद दी। इस उपनिवेशीकरण ने पश्चिम के देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तीसरी दुनिया के देशों में अपना व्यापार जाल फैलाने का भरपूर अवसर दिया। उपनिवेशी ताकतों की छत्र छाया में इन्होंने लातीनी अमरीका, अफ्रीका और एशिया के देशों से सस्ता कच्चा काल बटोरा और अपने मंहगे 'बने बनाए' माल से उनके बाजारों को पाट दिया। नतीजतन इन देशों की टिकाऊ अर्थव्यवस्था टूट गयी और सम्पन्न देश अविकसित देशों की श्रेणी में धकेल दिये गये। द्वितीय महायुद्ध के बाद उपनिवेशीकरण का जाल टूटा, पर विकास के नाम पर ये कंपनियाँ तीसरी दुनिया में अपनी घुसपैठ बनाए रहीं। उपनिवेशकाल में जो काम पुलिस-फौज के हथियार करते थे, उत्तर उपनिवेशकाल में वह काम विश्व बैंक और मुद्राकोष की सहायता से ऋण के हथियार द्वारा किया गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को तीसरी दुनिया में निर्बाध रूप से अपने पाँव पसारने का कानूनी हक गैट के यूरूग्ने चक्र की समाप्ति पर बने विश्व व्यापार संगठन ने दे दिया जिसके तहत ये कंपनियाँ इन देशों से 'राष्ट्रीय व्यवहार' पाने की हकदार बन गयी हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तीसरी दुनिया के देशों की आर्थिक स्वायत्ता को नष्ट कर दिया है तथा व्यापक पैमाने पर गैर-बराबरी, और उपभोक्तावादी अपसंस्कृति फैलाई है। अब तो विकसित देश भी इनके कारण बेरोजगारी और उसके फलस्वरूप फैलते सामाजिक तनाव के शिकार हो रहे हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बढ़ता मकड़जाल न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में मानवीय संस्कृति और सभ्यता के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। इसलिए इनके खिलाफ चलने वाले इस अभियान में हम सभी एकजुट होकर आवाज उठायेंगे तो निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा कर सकेंगे।
राजीव दीक्षित जी सेवाग्राम, वर्धा
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का इतिहास
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जड़े मध्यकाल में वेनिस, अंग्रेज, डच व फ्रांसीसी व्यापारियों द्वारा स्थापित कंपनियों में मिलती हैं। प्राचीन सभ्यता में भी व्यापारियों द्वारा दूसरे देश में जाकर व्यापार करने के उदाहरण मिलते हैं। देश की सीमाओं को लांघकर दूसरे देशों में व्यापार करने प्रमाण
44
'मेसोपोटामिया सभ्यता' के समय के मौजूद हैं। लेकिन यह व्यापार मुख्यतः स्वतंत्र व्यक्तियों द्वारा ही किया जाता था। व्यापारी समूह बनाकर एक देश से दूसरे देश में अपने माल की बिक्री के लिए जाते थे, और आवश्यकता की वस्तुएं वहाँ से खरीद कर लाते थे। भारत का रोम के साथ व्यापार, भारत का बर्मा, मलाया (मलेशिया) चीन आदि के साथ व्यापार इसी श्रेणी में आता था। रोमन साम्राज्य के समय पार-राष्ट्रीय व्यापार खूब होता था, लेकिन व्यापारियों द्वारा साम्राज्य के पतन के बाद भारत का व्यापार चीन के साथ शुरू हुआ। मुख्यतः दक्षिण भारत का हिस्सा चीन के साथ व्यापारिक गतिविधियों में अधिक संलग्न था। व्यापार के इस स्वरूप में शोषण की कहीं कोई गंजाइश नहीं थी और न ही मेजबान व मेहमान देशों के बीच इस व्यापार को लेकर कोई झगड़ा हुआ करता था।
आधुनिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चरित्र वाली दुनिया की सबसे पहली कंपनी 'The Muskovi Company' मानी जाती है। जिसकी स्थापना सन् 1553 में हुई थी। इस कंपनी ने अपनी स्थापना के 3 वर्षों बाद ही दुनिया के महत्वपूर्ण शहरों में अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित कर लिए थे। सन् 1553-1581 तक 'मस्कोवी कंपनी' ने अकूत मुनाफा कमाया और सन् 1581 में कम्पनी के अलमबरदारों ने एक और विशालकाय कंपनी 'The Turkey Company' को स्थापित कर लिया। इस 'टर्की कंपनी' की विशेषता थी कि इसने स्थापना के समय ही दुनिया के महत्वपूर्ण नगरों में अपने पाँव पसारे। ऐसा नहीं था कि 1553 से सन् 1581 तक 'मस्कोवी कंपनी' का व्यापारिक क्षेत्र में एकाधिकार रहा।
सन् 1600 में ईस्ट इण्डिया कंपनी भारत में व्यापार करने के लिए आयी। हालाँकि इस कंपनी की स्थापना ऐलिजाबेथ प्रथम के समय में ही हो चुकी थी, लेकिन इस कंपनी ने बहुराष्ट्रीय चरित्र सन् 1600 में ही ग्रहण किया। भारत आने से पूर्व इस कंपनी ने दुनियाँ के अन्य हिस्सों में भी पैर जमाने की कोशिश की थी लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। उस समय दक्षिण-पूर्व एशिया में अनेक छोटी-मोटी डच कंपनियाँ अपना व्यापार कर रही थी। भारत में भी कुछ डच कंपनियों को प्रवेश हो चुका था। ईस्ट इण्डिया कंपनी ने सन् 1612 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने डच कंपनियों के साथ अम्बोनिया (इण्डोनेशिया) में एक युद्ध लड़ा था। इस युद्ध में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने एक षडयंत्र के तहत डच कंपनियों के अधिकारियों की सामूहिक हत्या करवा दी। सन् 1667 के आते-आते ईस्ट इण्डिया कंपनी ने डच कंपनियों का नामों-निशान मिटा दिया। सूरत के बंदरगाह पर कब्जा करने के लिए ईस्ट इण्डिया कंपनी का पूर्ण अधिकार हो गया। इसके बाद ही ईस्ट इण्डिया कंपनी का शिकंजा पूरे देश पर कसता चला गया।
सन् 1750 के बाद का दौर ब्रिटेन की औद्योगिक क्रान्ति का दौर था। जिसके दौरान उत्पादन की तकनीक में आमूल परिवर्तन आया। सन् 1600 से 1750 के बीच अंग्रेजी कंपनी ने, जिसमें ईस्ट इण्डिया कंपनी भी शामिल थी, अंग्रेजों को अकूत पूँजी का मालिक बना दिया। भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों का शोषण करके अंग्रेजी बाजार में पैसे का प्रवाह अत्याधिक बढ़ गया। बाजार की ताकतें बाजार में ताकतवर होती गयीं। मुद्रा का दबाव लगातार बढ़ने का परिणाम औद्योगिक क्रान्ति के रूप में सामने आया।
45
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत में प्रवेश
भारत में विदेशी कंपनियाँ तीन तरीके से काम कर रही है। पहला, सीधे अपनी शाखायें स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कंपनियों के साथ साझेदार कंपनी के रूप में।
जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 350 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कंपनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं। औसतन 1000 से अधिक नये विदेशी समझौते प्रतिवर्ष देश में होते हैं। सन् 1972 के अंत तक देश में कुल 740 विदेशी कंपनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कंपनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कंपनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कंपनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कंपनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कंपनियों की संख्या 1136 हो गयी।
आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कंपनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कंपनियों के सीधे नियंत्रण में 701 कंपनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। ब्रिटेन की अन्य 32 कंपनियाँ, भारतीय कंपनियों के साथ किये गये समझौतों के तहत कार्यरत थीं। ये 8 विशालकाय ब्रिटिश कंपनियाँ सन् 1853 से ही भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं। ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत लायी गयी ये कंपनियाँ सन् 1860 तक ईस्ट इण्डिया कंपनी के भारतीय उपमहाद्वीप के शोषण के लिए धारदार हथियार बन चुकी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित हो जाने के बाद ये कंपनियाँ दुनिया के अन्य दूसरे देशों में शोषण करने चली गयीं।
ये 8 ब्रिटिश कंपनियाँ निम्न थीं –
- 1. एन्ड्रयूल एण्ड कंपनी
- 2. मेक्लाइड एण्ड कंपनी
- 3. बर्न एण्ड कंपनी
- 4. डंकन ब्रदर्स एण्ड कंपनी
- 5. आक्टेवियस स्टील एण्ड कंपनी
- 6. गिलैण्डर अर्बुदनाट एण्ड कंपनी
- 7. शा वालेस एण्ड कंपनी
भारत में जैसे-जैसे विदेशी पूँजी का निवेश बढ़ता गया वैसे-वैसे विदेशी कंपनियों की संख्या बढ़ती गयी। इसके साथ जुड़ा हुआ एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिन विदेशी कंपनियों ने भारत में
46
पूँजी निवेश किया उनमें से अधिकांश कंपनियों ने अपने निवेश करने के अगले वर्षों में ही अपनी निवेश की हुई पूँजी के बराबर या उससे अधिक पूँजी कमा ली। बाकी अन्य कंपनियों ने अधिकतम 5 वर्षों में अपनी निवेश की हुई पूँजी को कमा लिया।
हर क्षेत्र में घुसी हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
आज देश का छोटा-बड़ा प्रत्येक क्षेत्र इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में आने वाली कोई भी चीज ऐसी नहीं है, जिसे ये कम्पनियाँ न बनाती हो। दैनिक उपयोग के सामानों का उत्पादन करके ये विदेशी कंपनियाँ घर-घर में घुसी हुई हैं। खेती के काम में आने वाले जहरीले कीटनाशकों, खादों अन्य उपकरणों का उत्पादन करके इन विदेशी कंपनियों ने हमारी आत्मनिर्भर खेती को अपना गुलाम बना लिया है। उद्योगों के क्षेत्र में रद्दी तकनीकी का इस्तेमाल करके वातावरण को विषैला कर दिया है। हवा, पानी और मिट्टी भी अब प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं।
नीचे उन क्षेत्रों की सूची दी गयी है जिनमें घुसकर इन विदेशी कंपनियों में हमारी आर्थिक व्यवस्था को पंगु बना या हैं-
कुछ प्रमुख उत्पादन के क्षेत्र, जिनमें विदेशी कंपनियाँ घुसी हुई हैं।
- 1. दैनिक उपभोग की सामग्री के क्षेत्र में
- 2. दवा उद्योग के क्षेत्र में
- 3. खाद, कीटनाशक, दवायें व खेती उपकरणों के क्षेत्र में
- 4. मोटर-गाड़ियों के उपकरणों के उत्पादन के क्षेत्र में
- 5. भारी इंजीनियरिंग सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
- 6. इलेक्ट्रानिकी व इलेक्ट्रीकल सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में
- 7. सैनिक रक्षा सामग्री के क्षेत्र में
- 8. सैनिक रक्षा सामग्री के क्षेत्र में
- 9. फूड प्रोसेसिंग व प्लांटेशन(चाय, कॉफी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ, चॉकलेट)
- 10. वैज्ञानिक रक्षा अनुसंधान में
- 11. सीमेंट उद्योग में
- 12. तेल शोधन व उत्पादन के क्षेत्र में
- 13. धातुओं के खनन तथा निष्कर्षण क्षेत्र में
- 14. जूट उद्योग में
- 15. सिले हुए (रेडीमेड) कपड़ों के उत्पादन क्षेत्र में
- 16. जूते व अन्य खेल सामानों के उत्पादन क्षेत्र में
- 17. रबर इन्डस्ट्रीज के क्षेत्र में
- 18. बच्चों के खेलौने व अन्य प्लास्टिक सामानों के उत्पादन में
47
विदेशी पूँजी का धोखा
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जब भी दुनिया के किसी देश में व्यापार करने के लिए जाती हैं तो वे उस देश के लिए भारी सिर दर्द बन जाती हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के किसी भी देश में काम करने से ऐसा नहीं है कि मात्र आर्थिक दुष्प्रभाव ही पड़ते हों अपितु उस देश में इन कंपनियों के व्यापक और गहरे प्रभाव नजर आते हैं। क्योंकि इन कंपनियों का चरित्र ही ऐसा है कि ये देश की नीतियाँ बदलवाने के लिए सीधे राजनैतिक हस्तक्षेप करती हैं। सामाजिक जीवन भी इन कंपनियों के प्रभाव से अछूता नहीं रहता है।
जब ये कंपनियाँ काम करने के लिए अन्य देशों में जाती हैं तो उनके पीछे कुछ मिथ्या धारणायें काम करती हैं जैसे ये अपने साथ पूँजी लायेगी, आधुनिक तकनीक देगी, लोगों के रोजगार के अवसर मुहैया करायेगी, देश का निर्यात बढ़ायेगी, देश के भुगतान संतुलन की स्थिति को चुस्त-दुरुस्त रखेगी, देश की आर्थिक संसाधनों में और अधिक वृद्धि करेगी आदि-आदि। लेकिन असलियत ठीक इन सभी दावों से उल्टी होती है।
विदेशी कंपनियों के पक्ष में सबसे बड़ी दलील दी जाती है कि भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश में पूँजी की बड़ी कमी होती है और पूँजी के अभाव में विकास नहीं हो सकता। इसलिए विदेशों से पूँजी आमन्त्रित करके इस कमी को पूरा किया जा सकता है और पिछड़ेपन के दुष्प्रक को तोड़ा जा सकता है।
लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। ये विदेशी कंपनियाँ बाहर से बहुत कम पूँजी लाती हैं, अधिकांश पूँजी यहां के बैंकों से कर्ज लेकर, यहाँ की जनता से कर्ज लेकर और उनको शेयर बेचकर एकत्रित करती हैं। देश में जितनी भी विदेशी कंपनियाँ कार्य कर रही हैं, वे औसतन 5 प्रतिशत तक पूँजी ही बाहर से लाती हैं। बाकी 90 प्रतिशत से लेकर 95 प्रतिशत तक पूँजी ये भारतीय स्रोतों से ही एकत्रित करती हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा पूँजी निवेश मात्र एक धोखा है। हिन्दुस्तान लीवर, कॉलगेट, सीबागाइगी जैसी सैकड़ों विदेशी कंपनियों ने मात्र कुछ लाख रुपये से भारत में व्यापार शुरू किया। लाभ कमा-कमा कर बोनस शेयर के रूप में इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी शेयर पूँजी करोड़ों रुपये में कर ली। अब ये कंपनियाँ रॉयल्टी, शुद्ध लाभ और टेक्नीकल फीस के रूप में अरबों रुपये भारत से बाहर ले जा रही हैं। इस बात की गंभीरता का अहसास इसी से हो जाता है कि 1967-77 में जहाँ भारत में कार्यरत विदेशी कंपनियाँ 121.54 करोड़ रुपये देश से बाहर ले गयीं, वहीं 1986-87 में यह राशि बढ़कर 494.6 करोड़ रुपये हो गयी। पिछले 11 वर्षों में ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वैधानिक रूप से 3244.15 करोड़ रुपये भारत से बाह ले जा चुकी हैं, जबकि अवैधानिक तरीके से ये कंपनियाँ इससे कई गुनी अधिक राशि देश से बाहर ले जा चुकी हैं। इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भारत में शेयर पूँजी लगभग 675 करोड़ रुपये मात्र है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ देश के खून-पीसने की कमाई विदेशी मुद्रा का निर्यात अपने मूल देशों को
48
कर रही हैं। इन बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ने पूँजी के नाम पर कैसा मकड़जाल इस देश पर फैलाया है, इसका अनुमान दो-तीन उदाहरणों से लगाया जा सकता है।
हिन्दुस्तान लीवर ने भारत में सन् 1933 में जब व्यापार शुरू किया तब इसकी मूल कंपनी यूनीलीवर ने मात्र 24 लाख रुपये लगाये। 1933 में प्रारम्भ हुई इस कंपनी ने ऐसा जाल बिछाया कि 1990 में इसकी मूल कंपनी यूनीलीवर की शेयर पूँजी 47.59 करोड़ रुपये हो गयी। इसमें से 44.51 करोड़ रुपये की शेयर पूँजी बोनस के रूप में जुड़ी। 1975 से 1990 तक के बीच हिन्दुस्तान लीवर ने 80.18 करोड़ रुपये लाभांश के रूप में भारत से बाहर भेज दिये। यह रकम रायल्टी और तकनीकी शुल्क के अतिरिक्त हैं।
इसी तरह कॉलगेट-पामोलिव कंपनी ने सन् 1937 में मात्र 1.5 लाख रुपये से अपना कारोबार शुरू किया। 1989 के आते-आते अमरीकी कंपनी कॉलगेट-पामोलिव की शेयर पूँजी बढ़कर 12.57 करोड़ रुपये हो गयी। इसमें 12.56 करोड़ रुपये की पूँजी बोनस शेयर के रूप में जुड़ी। कॉलगेट-पामोलिव कंपनी 1977 से 1989 के बीच में 18.42 करोड़ रुपये लाभांश के रूप में भारत से अमरीका ले गयी।
सामान्यतः बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जितनी पूँजी लेकर आती हैं, उससे कई गुना अधिक पूँजी तो वे एक ही वर्ष में देश के बाहर भेज देती हैं। उदाहरण – गुडईयर कंपनी ने भारत में 1 करोड़ रुपये पूँजी का निवेश किया। लेकिन 1989 में गुडईयर ने 7.33 करोड़ रुपया भारत से बाहर मुनाफे के रूप में भेज दिया।
| वर्ष | विदेशी पूँजी निवेश | भारत से बाहर गया धन |
|---|---|---|
| 1981 | 108 करोड़ रुपये | 114 करोड़ रुपये |
| 1982 | 628 करोड़ रुपये | 641 करोड़ रुपये |
| 1983 | 618 करोड़ रुपये | 590 करोड़ रुपये |
| 1984 | 1130 करोड़ रुपये | 1169 करोड़ रुपये |
| 1985 | 1260 करोड़ रुपये | 1181 करोड़ रुपये |
| 1986 | 1066 करोड़ रुपये | 1265 करोड़ रुपये |
| 1987 | 1077 करोड़ रुपये | 1193 करोड़ रुपये |
| 1991 से 1995 | 25,479 करोड़ रुपये | 34,240 करोड़ रुपये |
स्रोत - रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया रिपोर्ट
उच्च विदेशी तकनीक का झूठ
विदेशी उच्च तकनीक को लाने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को व्यापार की खुली लूट दी जाती हैं। भारत में आने वाली सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने विदेशी उच्च तकनीक देने के समझौते पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। लेकिन वास्तव में अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसे क्षेत्रों में व्यापार
49