स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 39, कुल 77 में से
संदर्भ में पढ़ेंतकरीबन हर अंग का इस्तेमाल टूथपेस्ट, सरेस, फेवीकोल, चीनी के बर्तन, सनमाइका, इंसुलिन इंजेक्शन आदि बनाने में होता है। बूचड़ खाने में सब जानवरों का मिला जुला खून इकट्ठा किया जाता है। इसके बावजूद दवा बनाने वाली कंपनियों को खून की कमी पड़ती रहती है।
खून के साथ-साथ बाकी अंगों का इस्तेमाल भी दवाई और कई दूसरी चीजें बनाने में किया जाता है। इनकी हड्डियों को जलाकर उसका पाउडर टूथपेस्ट, चीनी के बर्तन और सनमाइका बनाने में इस्तेमाल किया जाता है।
मच्छर मार दवाएं घातक हैं
एक तरफ जहाँ अनुसंधानकर्ता मच्छरों से मुक्ति के लिए परेशान हैं वहीं दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय उद्योग मच्छर भगाने वाली दवाएं और अन्य उपकरण काफी बड़े पैमाने पर बनाने में लगे हुए हैं। मच्छरमार दवाओं और उपकरणों को बड़े पैमाने पर उत्पादित, विज्ञापित और बिक्री किया जा रहा है। करोड़ों अरबों डॉलर का इनका कारोबार हो गया है उपकरणों और दवाओं से मच्छर तो भागते हैं परंतु मानव स्वास्थ्य पर इनका गंभीर असर पड़ता है।
पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि मच्छरों से बचने के लिए निकली अधिकतर दवाओं में मेलफोक्कीन नामक रसायन होता है जो दिमाग और शरीर के लिए घातक हो सकता है। हमारे देश में मच्छरमार दवाओं में कुछ ऐसे कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है जो अन्य देशों में प्रतिबंधित हैं। इसी कारण निर्माता कंपनियाँ कीटनाशक उत्पादों की संरचना की जानकारी का खुलासा भी नहीं करतीं।
बाजार में बिक रहे इन मच्छरमार ब्रांडों में विपैले रसायन 'डी-एथीलीन' का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसके लगातार उपयोग से स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बिजली से चलने वाले उपकरणों में जो धुँआ निकलता है उसमें फोसफीन नामक गैस से सिरदर्द, एलर्जी, नाक में खुशकी, होठों का सूखना, गले में खराश वगैरा हो जाती है। इसके लगातार प्रयोग से दम घुटने और साँस रूकने की स्थिति बन जाती है जो दिल और दमा के मरीजों के लिए घातक हो सकती है।
अनावश्यक दवाओं व गैर-जरूरी टॉनिकों का उत्पादन
भारत पारराष्ट्रीय निगमों द्वारा प्रतिबंधित अनावश्यक और नुकसानदेह दवाओं को खपाने का बहुत बड़ा बाजार रहा है। देश की जलवायु और यहाँ फैलने वाले विभिन्न रोगों के मुताबिक इन्होंने कभी भी दवाओं का निर्माण नहीं किया। भारत में मुख्य रूप से टी.बी., कुछ रोग, आंत्रज्वर, पेचिस, फाइलेरिया के मरीज अधिक हैं। इस समय बाजार में 50 से 60 हजार प्रकार के फार्मूलेशन उपलब्ध हैं। लेकिन विडम्बना है कि टी.बी मलेरिया, पेचिस तथा फाइलोरिया जैसे रोगों की दवाओं की बाजार में कमी है। हाथी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 117 या 150 दवाएँ ही अत्यावश्यक हैं जो 89-90 प्रतिशत लोगों की रोग के व्याधि में काम आती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के
39