स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमुताबिक भारत में प्रचलित रोगों के इलाज के लिए मात्र 250 दवाओं की जरूरत है मूल उत्पादन जो व्यापक पैमाने पर दवाओं की जरूरतों को पूरा करता है, वह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा बहुत ही कम तैयार किया जाता रहा है, यहाँ तक की लघु क्षेत्र से भी कम। सन् 1973 में इस देश में 5300 टन मूल रसायन (ब्लक) का उत्पादन हुआ, इनमें से मात्र 10 प्रतिशत का उत्पादन साधन सम्पन्न टेक्नॉलाजी के माध्यम से इन विदेशी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने किया था। बाकि 90 प्रतिशत का उत्पादन भारतीय जनता और निजी संस्थाओं ने किया था। राष्ट्रीय क्षेत्र में 33 प्रतिशत उत्पादन हुआ।
इस बात में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं कि विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने दवा उद्योग पर अपना एकाधिकार स्थापित करने एवं बेतहाशा मुनाफा कमाने की नीयत से समूचे नैतिक मानदंडों, राष्ट्रीय कानूनों और वायदों को तोड़ा है। भारत समेत गरीब मुल्कों को इन कम्पनियों ने अपनी जागीर बना रखा है। हमारे देश में जिन रोगों की बहुलता है और उनके इलाज के लिए दवाएँ आवश्यक हैं उनका उत्पादन ये कम्पनियाँ अपने फायदे की गणित सही करने के लिए न के बराबर करती हैं। इसके बदले ये ऐसी दवाओं और टॉनिकों का उत्पादन करती हैं जो गैर-जरूरी होता है। लेकिन जिसमें मुनाफे का प्रतिशत अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा होता है।
आर्थिक दोहन
आजादी के बाद खासकर दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्योतने के पीछे जो उद्देश्य था वह एक साल के अन्दर चकनाचूर हो गया। देश को करोड़ो मरीजों के लिए पर्याप्त दवाओं की पूर्ति तो हो ही नहीं सकी, उल्टे एक वर्ष की अवधि (1951-52) के दौरान भारत को 15.6 करोड़ रुपये के मूल्य के बराबर दवायें आयात करनी पड़ी। इस गरीब देश की जनता की जेब से करोड़ों-अरबों रूपया रॉयल्टी के नाम पर इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जरिये विदेश चला जाता है। साथ ही साथ इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मुनाफे की राशि साल-दर-साल बढ़ती गयी।
स्वास्थ्य के व्यावसायीकरण की उनकी नीतियों ने भारतीय दवा कम्पनियों का भट्टा बैठा दिया है। दवा के लाइसेंस पर प्रसाधन सामग्रियाँ तथा 90 फीसदी से अधिक गैर-जरूरी दवाएँ बनाने वाली कम्पनियाँ सबसे भ्रष्ट और क्रूर तरीके अपनाकर भारतीय बाजारों पर अपना कब्जा जमायी है। दूसरी तरफ सस्ती और अधिक उपयोगी विकल्प देने वाली भारतीय दवा कम्पनियाँ लगातार घाटे का शिकार होती जा रही हैं।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से मुक्त दवा-उद्योग की जरूरत
हमारे देश में एक से अधिक चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलन में हैं। सर्वप्रथम इस देश की मिट्टी और आबो-हवा से पैदा और यहाँ की परम्परागत सोच और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी हुई आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति हैं। इसी से मिलती यूनानी पद्धति है। अंग्रेजी, फ्रांसीसी एवं पुर्तगालियों के सम्पर्क
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