भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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की बदौलत एलोपैथी एवं होम्योपैथी आयी। दो सौ सालों के औपनिवेशिक शासन और आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के शिकंजे ने हमारी अस्मिता को तोड़ा और वैज्ञानिक धरोहर को रौंदा। नतीजा यह कि एलैपैथी के मुकाबले भारतीय पद्धतियाँ पिछड़ते-पिछड़ते गुलामी की हालत में रह गयी हैं। सरकार ने आजाद भारत में सर्वप्रथम एलोपैथी पद्धति की शिक्षा एवं चिकित्सालयों के नियमन के लिए 1956 में भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (इण्डियन मेडिकल काउंसिल) का गठन संसद से पारित एक आधिनयम के तहत किया। आधुनिक पद्धति में ही अनुसंधान हेतु आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (मेडिकल रिसर्च काउंसिल) पहले से ही गठित थी। कुछ अर्से बाद भारतीय एवं होम्योपैथी अनुसंधान की केन्द्रीय परिषद(सी.सी.आर.एम.एच.) का गठन किया गया। लोकतान्त्रित दबावों के चलते 1970 में केन्द्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद (सी.सी.आई.एच.) का गठन किया गया। इसके बाद भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी में अनुसंधान के लिए 1977 में आयुर्वेद एवं सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथी, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों हेतु अलग-अलग केन्द्रीय अनुसंधान परिषदों का गठन किया गया। इस प्रकार वर्तमान में केन्द्रीय स्तर पर विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शिक्षा एवं चिकित्साभ्यास हेतु तीन परिषदें एवं अनुसंधान हेतु 6 परिषदें कार्य कर रही हैं। इसके अलावा सी.एस.आई.आर के साथ-साथ आई.सी.एल.आर भी कभी-कभी ऐसे कार्यक्रमों के साथ आगे आती हैं जो चिकित्सा एवं स्वास्थ्य से जुड़े हैं। देश में आधुनिक, भारतीय एवं होम्योपैथी के लगभग 104,120 एवं 94 कालेज चल रहे हैं।

कीटनाशकों का भी निशाना है हमारा स्वस्थ

कीटनाशक दवाइयों के छिड़काव वाले गेहूँ के आटे की तली हुई पूरियाँ खाने वाले उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के करीब डेढ़ सौ व्यक्तियों के मौत के शिकार बनने की घटना अभी जेहन में बरकरार है। हालत यह है कि इस तरह के छोटे-बड़े समाचार आये दिन सुर्खियों में पढ़ने को मिल जाते हैं। इन समाचारों से विचारक एक बार फिर चिंतित होने लगे हैं। संकर बीज के आगमन के बाद कीटनाशकों के उपयोग में तेजी से वृद्धि होने के कारण आज कुल खेती योग्य जमीन के चौथे भाग में इस जह का इस्तेमाल शुरू हो गया है। उसमें आधे से अधिक भाग तो डी.डी.टी.बी.एच.सी और मैलाथियोन का ही है। पचास के दशक में इन दवाइयों का वार्षिक उपयोग सिर्फ दो हजार टन था, जो आज बढ़ कर अस्सी हजार टन तक पहुँच चुका है। फिर भी ताज्जुब तो यह है कि जीव-जन्तु, रोग आदि से फसल को जो नुकसान होता था, उसका आकंड़ा, जो सन् 1976 में 3300 करोड़ टन था, वह आज बढ़कर छः हजार करोड़ टन हो गया है। सन् 1960-61 में 64 लाख हेक्टेअर में यह जहर डाला जाता था, अब उसके स्थान पर आठ करोड़ हेक्टेअर में डालने का यह नतीजा है। ओटावा स्थिति इंटरनेशनल डेवेलपमेंट रिसर्च सेंटर का दावा है कि तथाकथित विकसित देशों में ही कीटनाशकों के जहर से हर वर्ष दस हजार आदमी मर जाते हैं और दूसरे चार लाख आदमी तरह-तरह के विपरीत परिणामों से पीड़ित होते हैं। ऐसे जहरों को हम क्या कहेंगे- कीटनाशक या मानव भक्षक? इनके मुख्य शिकार खेत मजदूर होते हैं। पाश्चात्य देशों में जिन पर पांबदी लगाई गयी है, वैसे रसायन तीसरे विश्व में उड़ेले जाने के कारण यह परिस्थिति पैदा हुई है। महाराष्ट्र तथा आंध्रप्रदेश

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