स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऔर कण्डोम का प्रयोग। डॉक्टर लार्ड ओ कलिंग्स के अनुसार एक बार के यौन सम्पर्क से 0.1-1 प्रतिशत, सूर्ई से 0.5-1 प्रतिशत, रक्त चढ़ाए जाने से 0.9 प्रतिशत एड्स होने की सम्भावना रहती है। इस तरह संक्रमित व्यक्ति के साथ सम्भोग या सूर्ई के इस्तेमाल और रक्त चढ़ाने से एड्स होने की बराबर सम्भावनाएं रहती हैं। देश में यौन संबंधों के लायक सिर्फ 30% लोग ही हैं जो अधिकतर अपने जीवन साथी के अलावा किसी अन्य से यौन सम्पर्क नहीं बनाते। दूसरी तरफ बच्चे से लेकर बूढ़े तक इन्जेक्शन की सूर्ई का प्रयोग करते हैं अतः इस रास्ते एड्स फैलने की सम्भावनाएं बहुत अधिक हैं। इसके अलावा रक्तदान द्वारा इस बीमारी का होना लगभग तय है और अभी भी हमारे देश में 50% मामलों में रक्त बिना जांच के ही चढ़ा दिये जाते हैं। भारत में विशेष स्थितियों में उपर्युक्त दोनों तरीकों से एड्स प्रसार की ज्यादा सम्भावनाओं को नजर अंदाज कर यौन सम्पर्कों को ही मुख्य जिम्मेदार मानना पश्चिमी का प्रभाव और कण्डोम निर्माता कम्पनियों की पहुंच का ही परिणाम है। विलासी उपभोक्तावादी संस्कृति के इस दौर में कण्डोम संस्कृति और उस का प्रचार विवाहेतर यौन संबंधों को बढ़ाकर इस बीमारी की जड़ को हरा ही बनायेंगे।
हमारे देश में लगभग 40 करोड़ रुपये का कण्डोम देशी कंपनियाँ और इतना ही कण्डोम विदेशी कंपनियाँ बेच रही है। विदेशी कण्डोमों के बारे में यह बात खास तौर से उल्लेखनीय है कि 1982 से ही सरकार ने इनके आयात पर से सीम शुल्क समाप्त कर दिया था और उस फैसले के बाद ही देश का बाजार विदेशी कण्डोमों से भर गया। करीब 25-30 एजेन्सियाँ जापान, कोरिया, ताइवान, हांगकांग, थाइलैण्ड वगैरा से कण्डोम थोक के भाव मंगाती और बेचती हैं। करीब 20 देशी व 80 विदेशी ब्रांडों अर्थात 100 से ज्यादा ब्रांडों में 100 करोड़ से ज्यादा कण्डोम सालाना बिक रहे हैं।
खतरनाक ट्रूथपेस्ट
ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा तैयार किये गये एक अध्ययन में इस बात पर गम्भीर असंतोष व्यक्त किया गया कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के गैंग ने किस प्रकार “दवा और कास्मेटिक एक्ट-1992” की धज्जियाँ उड़ा दी। इस कानून में फ्लोराइड मिले हुए ट्रूथपेस्टों की बिक्री पर कुछ पाबन्दियाँ लगा दी गयी थीं। राष्ट्रीय पेयजल आयोग द्वारा तैयार किये गये इस दस्तावेज में ग्रामीण क्षेत्रों में फ्लोरोसिस नामक बीमारी(जिसमें हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं, दांत गिर जाते हैं) के खिलाफ लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मियों एवं अन्य विशेषज्ञों को सचेत किया गया है। 90 पेज के इस दस्तावेज में कहा गया है कि फ्लोरोसिस नामक बीमारी उन क्षेत्रों में अधिक होती है जहाँ पेयजल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होती है।
बूचड़ खाने से खून और हड्डियाँ दवा कंपनियाँ ले जाती हैं
दिल्ली के ईदगाह बूचड़खाने से रोजाना निकलने वाला 13 हजार लीटर खून बड़ी-बड़ी दवार कम्पनियाँ टॉनिक बनाने के लिए ले जाती हैं। खासतौर पर गर्भवती महिलाओं के लिए पशुओं के खून से बनने वाला ‘डेक्सोरेंज’ टॉनिक बहुत लोकप्रिय है। खून ही नहीं, काटे गये पशुओं के
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