स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदिया, परंतु जोर जबरदस्ती नसबंदी करने के राजनैतिक दुष्परिणाम सामने आये तो यह नीति त्याग दी गयी और गर्भ निरोधक दवाइयों को प्रोत्साहन दिया गया।
भारतवासियों को गेहूँ-चावल के बीच चुनाव कर भरपेट खाना दिलाने में असमर्थ रही सरकार इस बात के लिए तैयार थी कि इन भूखी औरतों को दुनिया की नई गर्भ निरोधक दवा मिले। 60 के दशक में इजाद ज्यादातर गर्भ निरोधक, हार्मोन पर आधारित लंबी अवधि तक असर रखने वाले रसायन ही थे। इनमें कृत्रिम हार्मोन इस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रान के अलग-अलग मिश्रणों से बने गर्भ निरोधक शामिल थे, जिन्हें खाने की गोलियों से लेकर सुइयों, चमड़ी के अन्दर रोपे जाने वाले कैप्सूल, योनि में रखे जाने वाले छल्लों, नाक में छिड़की जाने वाली दवाइयों के रूप में इस्तेमाल किया गया। इस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रान के संयोग से बनी ये दवाइयाँ गम्भीर बीमारियों का कारण बनीं, जिनमें दिल व रक्तचाप की बीमारी, थकके जमने की बीमारी, कैंसर, पाचन संबंधी गड़बड़ियाँ, भ्रूण पर विपरीत असर वाली बीमारियाँ शामिल थी। इसी दौरान दो नई प्रकार की सुइयों का भी अविष्कार हुआ। जर्मनी की 'शेरिंग ए जी' नामक कंपनी द्वारा बनायी 'नेट-इन' व अमेरिका की अपजान कंपनी द्वारा बनाई 'डिपो प्रोवेरा'। नेट इन और डिपो प्रोवेरा सुइयों के गंभीर प्रभाव औरतों के शरीर पर पड़ते हैं, सुई लगवाने के बाद औरतों का शरीर फूल जाता है, चक्कर आते हैं, सरदर्द की शिकायत, थकान, भूख न लगना अथवा अत्यधिक भूख लगना, वैवाहिक संबंधों और किसी को हर समय खून रिसता रहता है। अगर वे बच्चे को स्तनपान करा रही हैं तो दूध की मात्रा व गुणवत्ता पर असर पड़ता है। पेट व स्तनों को छूने से दर्द, घबराहट व उदासी की बीमारी, एलर्जी, हृदय रोग खून के थकके जमने की बीमारी भी हो सकती है। कुल मिलाकर डेपो प्रोवेरा के निर्माता ने 78 दुष्प्रभावों को स्वीकार किया है। एक बार लगवाने के बाद दुबारा औरतें इनके पास फटकती भी नहीं। परंतु इनकी निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर कोई असर नहीं हुआ क्योंकि इन्होंने विकासशील देशों में अपने बाजार दृढ़ लिये, जहाँ की सरकारें पहले से ही जनसंख्या नियंत्रण के लिए हाथ पैर मार रही थी। डिपो प्रोवेरा के परीक्षणों से ही इतनी ऊपर तक पहुँच थी कि ये गर्भ निरोधक बिक्री के लिए बाजारों में आ गये। अमेरिका में डॉक्टर काली चमड़ी की किशोरियों को उस समय से डिपो प्रोवेरा लगाते चले आ रहे हैं जब वहाँ की सरकार ने इसे स्वीकृति तक नहीं दी थी। इसी तरह न्यूजीलैंड के आदिवासियों व इंग्लैण्ड के अश्वेतों को यह सुई लगाई जा रही है, और अब तीसरी दुनिया के अन्य मुल्कों में इसका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। डिपो प्रोवेरा की भुक्त भोगी वे सभी मनुष्य प्रजातियाँ हैं जिनकी संख्या को सीमित रखना श्वेत नस्ल की अगुवाई बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
एड्स और कण्डोम का व्यापार
एड्स का हल्ला मचा कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों (साथ ही साथ देशी कंपनियों ने भी) कण्डोम का बाजार खड़ा किया है और सौ करोड़ रूपये का सालाना मुनाफा कम रही हैं। हालांकि एड्स खतरनाक बीमारी है और यौन संसर्ग के अलावा कई अन्य तरीकों से भी इसका प्रसार होता है। जैसे इन्जेक्शन की सुई द्वारा, रक्त लेने से एवं पसीने के सम्पर्क द्वारा। परन्तु बहुराष्ट्रीय कंपनियों की शह पर एड्स को रोकने के जिन तरीकों को ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है उनमें हैं सुरक्षित सम्भोग
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