भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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गैट समझौता और नया पेटेंट कानून

गैट समझौता होने से और भारतीय पेटेंट कानून - 1970 के बदले जाने से भारतीय दवा उद्योग पूरी तरह नष्ट हो जायेगा और भारतीय दवा बाजार पर एकाधिकारवादी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियाँ छा जायेगी। गैट समझौता में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बौद्धिक सम्पदा कानूनों (ट्रिप्स) को लेकर है जिसके कारण हमारा 1970 का भारतीय पेटेंट कानून पूरी तरह बदल जायेगा। 1 जनवरी 95 को सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए नया पेटेंट कानून लागू भी कर दिया था। हालांकि देशव्यापी विरोध के कारण नया पेटेंट कानून संसद से मंजूरी नहीं पा सका।

1956 में अंग्रेजों ने पेटेंट व्यवस्था लागू की थी। 1911 में भारतीय पेटेंट और डिजाइन एक्ट बनाया गया जिसका उद्देश्य भारतीय बाजार को ब्रिटिश उद्योगों के अधीन बनाना था। ब्रिटिश पेटेंट धारकों ने भारत में ऊँची कीमत वाले निर्यात द्वारा हमारे बाजारों का शोषण किया और करोड़ों रूपये कमाये थे। यह लाजिमी था कि यह शोषण दवा क्षेत्र में भी होता। आजादी के पहले और बाद में भी दवाओं का उत्पादन बहुत और देश मुख्यतः आयात पर ही निर्भर था। कोई नई दवा आती थी तो वह पेटेंट धारकों की मर्जी के अनुसार ही आती थी। ऐतिहासिक दृष्टि से विदेशी कंपनियों ने भारत में अपने पेटेंट पंजीकृत नहीं करवाये। 1947 से 1957 के बीच भारत में कराए गये 1704 दवा पेटेंटों में 99 प्रतिशत पेटेंट विदेशी नागरिकों के पास थे और एक प्रतिशत से कम को भारत में व्यापारिक उपयोग में लाया गया।

1970 का 'भारतीय पेटेंट कानून' हमारे हित के मुख्य क्षेत्रों की रक्षा करने के लिए बनाया गया था। इसमें केवल चार क्षेत्रों- दवा उद्योग, कृषि रसायन, भोजन और विशिष्ट रसायनों के मामले में कानून ने 7 वर्ष के लिए प्रक्रिया पेटेंट की अनुमति दी, लेकिन उत्पाद पेटेंट की अनुमति नहीं दी है। मुख्य बात यह है कि इस कानून में एकाधिकार को रोकने के लिए 'स्वतः लाइसेंस के अधिकार' का प्रावधान किया गया है। 1970 के पेटेंट कानून को अंकटाड ने प्रगतिशील कानून घोषित कर उसे अन्य देशों के लिए भी एक माडल बताया। इसी कानून का नतीजा था कि 1970 के बाद उद्योग आगे बढ़ा। परन्तु भारतीय दवा उद्योग से योग्यता के आधार पर स्पर्धा करने में असमर्थ होने पर ये 'मुक्त बाजार' के वकील अब निराश होकर अपना एकाधिकार जमाने की फिराक में हैं।

भारतीय पेटेंट कानून-1970 के लागू होने के बाद देशी दवा उद्योग में अच्छी प्रगति हुई और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भरता कम होने लगी। 1974 में दवा उत्पादन 500 करोड़ रूपये से बढ़कर 1991 में 4000 करोड़ और 1994 में 6000 करोड़ रूपये का हो गया था। इसी प्रकार 1985-86 से 1991-92 के बीच 6 वर्षों की अवधि में हमारा दवा निर्यात 140 करोड़ रूपये से बढ़कर 1281 करोड़ रूपये का हो गया था। 1991-92 में 76 करोड़ रूपये की दवाइयाँ अमेरिका को निर्यात की गयी। भारतीय दवा कंपनियों को जो भी सफलता मिली उसके पीछे पेटेंट कानून - 70 का बहुत हाथ रहा।

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