भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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हतोत्साहित किया। दवा उद्योग के क्षेत्र में अंग्रेजों की घुसपैठ 1924 में शुरू हो गयी थी जब ब्रिटिश कंपनी ग्लैक्सो ने यहाँ अपना कारोबार शुरू किया था। लेकिन फिर भी यहाँ अंग्रेजी दवा कंपनियों की जड़ जम नहीं पायी थी। एलोपैथी के क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिक अनभिज्ञ तो थे नहीं। इसके लाभ को मुद्दे नजर रखकर इस सदी की शुरुआत में ही आचार्य पी.सी. राय एवं प्रो.टी. के. गज्जर ने फार्मास्यूटिकल उद्योग की स्थापना की थी। यहाँ की प्रमुख बीमारियों को देखते हुए सेरा, वैक्सिन तथा मलेरिया प्रतिरोधी दवाओं की खोज तथा उसका निर्माण किया गया। बंगाल इसका केन्द्र बना। यही नहीं द्वितीय महायुद्ध के पूर्व यूरिया स्टीबमाइन की खोज तथा राल्फिया सर्पेन्टीना पर शोध चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान साबित हुआ। पश्चिमी बंगाल के डॉ. घोष का पेन्सिलीन के निर्माण में नया योगदान स्वदेशी दवा तकनीक के विकास में काफी महत्व का है। इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अन्य क्षेत्रों की भाँति दवा उद्योग के भी क्षेत्र में राष्ट्रीयता का संचार हुआ था और बिना विदेशी मदद के भारतीय औषध (फार्मास्यूटिकल) उद्योग को विकसित करने का संकल्प लिया गया था।

लेकिन इसके साथ ही साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी अपना कारोबार बढ़ाने के लिए कार्यरत थीं। 1948 की भारत सरकार की औद्योगिक नीति ने तो उनके लिए रास्ता खोल दिया। विज्ञापनों एवं अन्य प्रचार के जरिये बाजारों पर कब्जा करने की पारराष्ट्रीय निगमों की आक्रमणकारी नीति ने आयुर्वेदिक दवा पद्धति को तो प्रचलन से बाहर कर ही दिया, भारतीय फार्मास्यूटिकल उद्योग को भी काफी पीछे छोड़ दिया। आत्मनिर्भर राष्ट्रीय दवा उद्योग के विकास के सारे प्रयासों पर पानी फिर गया। 50 के दशक में दवा के क्षेत्र में दुनिया की कुछ बड़ी बहुराष्ट्रीय निगमों ने देश में अपना कब्जा जमा लिया। अमेरिका की फाइजर कंपनी, स्विटजरलैंड रोश, अमेरिका की सीबा गायगी तथा बेयर इण्डिया जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपने को स्थापित कर लिया। इसका एक कारण और था। आधुनिक दवा उद्योग की बुनियाद मूल रासायनिक उद्योग की बुनियाद पर खड़ी है और यह स्पष्ट है कि साम्राज्यवाद ने अपने औपनिवेशिक शोषण के उद्देश्य से इस देश में मूल रासायनिक उद्योग का स्वाभाविक विकास नहीं होने दिया तथा वैज्ञानिक - अनुसंधान और कारीगरी की शिक्षा को पंगु बनाकर रख दिया। नये उपकरणों से सज्जित दवा कंपनियों की तीव्र प्रतियोगिता में घरेलू और देशी दवा उद्योगों का पुनः हास होने लगा।

सन् 1948 में दवा की कुल बिक्री 10 करोड़ की थी जो 1982 में बढ़कर 1200 करोड़ हो गयी और 1992-93 में 7500 करोड़ हो गयी। इसमें 80 प्रतिशत हिस्सा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में था। 1975 में केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित हाथी कमेटी ने दवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के राष्ट्रीयकरण की सिफारिश की थी। हाथी कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि “सामान्य पूंजी लगा कर ये कंपनियाँ अपनी औषधियों की बिक्री कर अत्यधिक मुनाफा विदेशों को भेज चुकी हैं। तथा बेहिसाब निजी पूंजी में वृद्धि की है”।

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