भारतकोश
स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

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हजारों दवाओं का निर्माण और बिक्री करती हैं जिन पर, प्राण-घातक प्रभावों के कारण, उनके स्वयं के देश के साथ-साथ दुनिया के तमाम देशों में प्रतिबंध लगा होता है।

यह कैसी विडम्बना है कि मानवता को शारीरिक पीड़ाओं से निजात दिलाने के लिए खोजी गई नई चिकित्सा पद्धति को बहुराष्ट्रीय निगमों ने मौत के व्यापार में बदल दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस बात को स्वीकार करता है कि दवा बनाने वाली दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय निगमों अपने मुनाफे के लिए गरीब मुल्कों में हजारों- हजार अनाप सनाप दवाएँ तूँस रही हैं जो रोगों से मुक्ति दिलाने के बजाए रोगियों के प्राण ले लेती हैं।

भारतीय दवा उद्योग पर कब्जा

आजादी के बाद 1948 की राष्ट्रीय औद्योगिक नीति ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत की आर्थिक दुनिया में फलने-फूलने का भरपूर अवसर दिया। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था, पश्चिम के चमचमाते औद्योगिक मॉडल के प्रति उनकी रीझ एवं गांधी की कुटीर अर्थव्यवस्था के प्रति उनके विकर्षण ने भारत को यूरोप की विकासवादी अवधारणा के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिया। संसद में नेहरू के बयान ने विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को और अधिक प्रोत्साहित किया। नेहरू ने विदेशी पूँजी निवेश और विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को स्वागत करते हुए कहा था कि इससे विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में एवं अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी। ऐसी स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था में पश्चिमी देशों को घुसने का पर्याप्त मौका मिला। उत्पादन और वितरण के क्षेत्र में इंग्लैण्ड और अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने बड़ी तेजी से घुसपैठ करनी शुरू की। अस्त निर्माण के बाद इन कम्पनियों के लिए फायदे का दूसरा बड़ा क्षेत्र औषध का था। मौके का फायदा उठाते हुए इन कम्पनियों ने दवा उद्योग पर कब्जा करना शुरू कर दिया। चूंकि दवा उद्योग के क्षेत्र में भारत की कोई अलग औद्योगिक नीति नहीं थी इसलिए 1948 की औद्योगिकरण की प्रक्रिया तेज करने के लिए सामान्य औद्योगिक नीति में विदेशी एवं भारतीय उद्योगों के बीच कोई भेद-भाव नहीं बरता जायेगा तथा दोनों को समान रूप से सुविधायें मुहैया करायी जायेंगी। इसके पीछे यह भी अवधारणा काम कर रही थी कि देश का नये औषध विज्ञान(एलोपैथी) से परिचय हो सकेगा, यह उसकी तकनीक सीख सकेगा तथा बहुराष्ट्रीय निगमों भारत की करोड़ों बीमार जनता के लिए पूरी तरह से दवाएँ उपलब्ध करायेंगी।

1948 की राष्ट्रीय औद्योगिक नीति ने हमारे देश में बहुराष्ट्रीय निगमों की बाढ़ ला दी। इन निगमों ने स्वदेशी दवा उद्योग पर घातक प्रहार किया, बाजार पर कब्जा किया और संचार माध्यमों के जरिए पाश्चात्य दवा संस्कृति को हमारे अन्दर स्थापित कर दिया।

आजादी के पहले देश में आयुर्वेदिक औषध पद्धति का ही प्रचलन था। यद्यपि अंग्रेजों ने पश्चिमी दवा पद्धति की नींव डाल दी थी। कुछ लाइलाज या प्राणघातक बीमारियों जैसे टी.बी, हैजा, मियादी बुखार का एलोपैथी में इलाज संभव हो सकने के कारण इसे आगे बढ़ने का बल मिला। ऐसा नहीं था कि भारतीय दवा पद्धति में इनका इलाज नहीं था बल्कि अंग्रेजों ने इसके विकास को

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