स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र
Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra
राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा
स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलेकिन ज्ञान की धारा तो रूकने वाली नहीं थी। इस नई चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत ऐसी दवाओं की खोज की गयी जिसने प्लेग, हैजा और चेचक जैसे संक्रामक रोगों पर काबू पाकर प्रत्येक वर्ष उनसे मरने वाले लाखों इंसानों को जीवनदान दिया। घोर अनिश्चित और कभी भी आ धमकने वाली मौत के खौफ से समूची मानवता को मुक्त करने वाली नई चिकित्सा पद्धति का दुनिया ने किसी न किसी अंश तक तो स्वागत किया ही।
लेकिन 20 वीं सदी के प्रथम चरण में एक बड़ा परिवर्तन आया। पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति अब केवल चिकित्सा प्रणाली ही नहीं रह गयी, यह पश्चिमी देशों के आर्थिक साम्राज्य को विस्तार देने का बहुत बड़ा माध्यम बना ली गयी। दवा उद्योग लाभ की दृष्टि से हथियारों के कारोबार के बाद पहले नंबर का व्यापार माना जाने लगा। फलस्वरूप पश्चिम के साम्राज्यवादी देशों ने औषध बाजार पर अपना कब्जा जमाने के लिए जी-तोड़ कोशिश करनी शुरू कर दी। स्वाभाविक रूप से तीसरी दुनिया के तमाम देश उनके लिए सबसे बड़े बाजार साबित हुए। इसलिए वहाँ अपने कारोबार चलाने के लिए पश्चिमी दवा पद्धति को थोपा गया।
इस पद्धति को स्थायी रूप देने के लिए इन देशों की स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों को खत्म करना जरूरी था, जिनके रहते एलोपैथी का विकास संभव नहीं था। साम्राज्यवादी देशों ने एक-एक करके शासित देशों की चिकित्सा पद्धतियों को यह कहकर नकारना शुरू किया कि वे पुरातनपंथी हैं तथा मानव पीड़ाओं का इलाज कर पाने में सक्षम नहीं हैं। कि साम्राज्यवादी शक्तियों की इन साजिशों के चलते कितनी स्वदेशी औषध प्रणालियों ने दम तोड़ दिया और कितनी आज भी तोड़ रही हैं, इसका आसानी से अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
पश्चिम में यह नई चिकित्सा पद्धति समाज की जरूरतों एवं वहाँ की परिस्थितियों के मुताबिक भले ही उपयोगी ठहरती हो लेकिन भारत जैसे तीसरी दुनिया के तमाम सारे देशों के सामाजिक परिवेश, जलवायु एवं अन्य परिस्थितियों के न तो ये पूरी तरह अनुकूल होती हैं और न ही करोड़ों गरीब मरीजों का इलाज कर पाने में सक्षम हैं। बल्कि उल्टे इसने तमाम स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं को जन्म दिया है।
द्वितीय महायुद्ध के बाद साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की पुरानी दीवारों तो ढह गयीं लेकिन उसके स्थान पर साम्राज्यवादी ताकतों ने नव-स्वाधीन देशों के शोषण के लिए ऐसा रूप अख्तियार किया जो बहुत ही जटिल और अदृश्य-सा था। यह रूप कमोवेश समूची दुनिया को आज अपने कब्जे में ले चुका है। यह रूप कोई और नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का है।
भारत जैसे देश में करोड़ो गरीबों को सस्ता उपचार देने के बहाने घुसने वाली, विदेशी दवा कंपनियाँ मरीजों की जेब काट करके अरबों रुपया प्रतिवर्ष बाहर भेज रही है, और दवा के नाम पर देती हैं क्य – जहर, फालतु टॉनिकों की बोटलें और हजारों-हजार गैर-जस्सी दवाएँ। इन कंपनियों ने भारत समेत तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों को कूड़दान समझ रखा है जहाँ पर ये अपनी उन
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