भारतकोश
संग्रह पर लौटें

स्वदेशी भारत एवं विदेशी कंपनियों का षड़यन्त्र

Swadeshi Bharat evam Videshi Kampaniyon Ka Shadyantra

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Bharat & Rajiv Dixit Lectures · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished77 पृष्ठ

बच्चों को भारतीय संगीत का अभ्यास कराना चाहिए। चाहें तो भारतीय गायन, भारतीय वादन या भारतीय नृत्य तीनों में से कोई एक जरूर सिखाना चाहिए। पेन्टिंग/चित्रकला का अभ्यास करवाना चाहिए, मूर्तिकला का अभ्यास करवाना चाहिए।

भारतवर्ष में गुरुकुल कैसे खत्म हो गए?

1858 में Indian Education Act बनाया गया। इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड मैकाले ने की थी। लेकिन उसके पहले उसने वहाँ (भारत) के शिक्षा व्यवस्था का सर्वेक्षण कराया था, उसके पहले भी कई अंग्रेजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अपनी रिपोर्ट दी थी। अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W. Litnar और दूसरा अधिकारी था Thomas Munro दोनों ने अलग-अलग इलाकों का अलग-अलग समय सर्वे किया था। 1823 के आस-पास की बात है। Litnar जिसने उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसने लिखा था कि यहाँ 97% साक्षरता है और Munro, जिसने दक्षिण भारत का सर्वे किया था उसने लिखा कि यहाँ तो 100% साक्षरता है, और उस समय जब भारत में इतनी साक्षरता थी और मैकॉले का स्पष्ट कहना था कि भारत को हमेशा-हमेशा के लिए अगर गुलाम बनाना है तो इसकी 'देशी और सांस्कृतिक शिक्षा व्यवस्था' को पूरी तरह से ध्वस्त करना होगा और उसकी जगह 'अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था' लानी होगी और तभी इस देश में शरीर से हिन्दुस्तानी लेकिन दिमाग से अंग्रेज पैदा होंगे और जब इस देश की यूनिवर्सिटी से निकलेंगे तो हमारे हित में काम करेंगे और मैकॉले एक मुहावरा इस्तेमाल कर रहा हैं - 'जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।' इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, जब गुरुकुल गैरकानूनी हो गए तो उनको मिलने वाली सहायता, जो समाज की तरफ से होती थी, वो गैरकानूनी हो गयी, फिर संस्कृत को गैरकानूनी घोषित किया और इस देश के गुरुकुलों को घूम-घूम कर खत्म कर दिया, उनमें आग लगा दी, उसमें पढ़ाने वाले गुरुओं को उसने मारा-पीटा, जेल में डाला।

1850 तक इस देश में 7 लाख 32 हजार गुरुकुल हुआ करते थे और उस समय इस देश में गाँव थे '7 लाख 50 हजार, मतलब हर गाँव में औसतन एक गुरुकुल और ये जो गुरुकुल होते थे वो सब के सब आज की भाषा में 'Higher Learning Institute' हुआ करते थे, और ये गुरुकुल समाज के लोग मिलकर चलाते थे, न कि राजा, महाराजा।

इन गुरुकुलों में शिक्षा निःशुल्क दी जाती थी। किन्तु सारे गुरुकुलों को खत्म किया गया और फिर अंग्रेजी शिक्षा को कानूनी घोषित किया गया और कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे 'फ्री स्कूल' कहा जाता था। इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी, बम्बई यूनिवर्सिटी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के जमाने के यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।

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मैकॉले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी, बहुत मशहूर चिट्ठी है वो। उसमें वो लिखता है कि, 'इन कॉन्वेंट स्कूलों में ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे और इन्हें अपने देश के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में, अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा, इनको अपने मुहावरे नहीं मालूम होंगे। जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।' उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ-साफ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरो पर रोब पड़ेगा, अरे! हम तो खुद हीन हो गए हैं जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा। लोगों का तर्क है कि अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है किन्तु दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर यह कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं, दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी, वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, वहाँ का सारा काम फ्रेंच में होता है। जो समाज अपनी मातृभाषा से कट जाता है, उसका कभी भला नहीं होता और यही मैकॉले की रणनीति थी।

स्वदेशी कृषि

जैविक खेती जीवों के सहयोग से की जाने वाली खेती के तरीके को कहते हैं। प्रकृति ने स्वयं संचालन के लिए जीवों का विकास किया है जो प्रकृति को पुनः ऊर्जा प्रदान करने वाले जैव संयंत्र भी हैं। यही जैविक व्यवस्था खेतों में कार्य करती है। खेतों में रसायन डालने से ये जैविक व्यवस्था नष्ट होने को हैं तथा भूमि और जल-प्रदूषण बढ़ रहा है। खेतों में हमें उपलब्ध जैविक साधनों की मदद से खाद, कीटनाशक दवाई, चूहा नियंत्रण हेतु दवा बगैरह बनाकर उनका उपयोग करना होगा। इन तरीकों के उपयोग से हमें पैदावार भी अधिक मिलेगी एवं अनाज, फल सब्जियां भी विषमुक्त एवं उत्तम होंगी। प्रकृति की सूक्ष्म जीवाणुओं एवं जीवों का तंत्र पुनः हमारी खेती में सहयोगी कार्य कर सकेगा।

एक सरल सूत्र बताता हूँ जिसको भारत में पिछले 15-17 वर्षों में हजारों किसानों ने अपनाया है और बहुत लाभ उनको हुआ है। एक एकड़ खेत के लिए किसी भी फसल के लिए खाद बनाने की विधि –

    1. एक बार में 15 किलो गोबर लगता है और ये गोबर किसी भी देशी गौमाता या देशी बैल का ही होना चाहिए। विदेशी या जर्सी गायें का नहीं होना चाहिए।
    1. इसमें मिलायें 15 लीटर मूत्र, उसी जानवर का जिसका गोबर लिया है। दोनों मिला लीजिए, प्लास्टिक के एक ड्रम में रख दें।

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    1. फिर इसमें एक किलो गुड़ डाल दीजिए और गुड़ ऐसा डाल दीजिए जो गुड़ हम नहीं खा सकते, जानवर नहीं खा सकते, जो बेकार हो गया हो, वो गुड़ खाद बनाने में सबसे अच्छा काम में आता है। तो एक किलो गुड़ 15 किलो गोमूत्र, 15 किलो गोबर इसमें डालिए।
    1. फिर एक किलो किसी भी दाल का आटा (बेसन)।
    1. अंत में एक किलो मिट्टी किसी भी पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे से उठाकर इसमें डालना।

ये पाँच वस्तुओं को एक प्लास्टिक के ड्रम में मिला देना, डंडे से या हाथ से मिलाने के बाद इसको 15 दिनों तक छाव में रखना। पन्द्रह दिनों तक इसका सुबह शाम डंडे से घुमाते रहना। पन्द्रह दिनों में ये खाद बनकर तैयार हो जाएगा। फिर इस खाद में लगभग 150 से 200 लीटर पानी मिलाना। पानी मिलाकर अब जो घोल तैयार होगा, ये एक एकड़ के लिए पर्याप्त खाद है। अगर दो एकड़ के लिए पर्याप्त खाद है तो सभी मात्राओं को दो गुणा कर दीजिए।

अब इसके खेत में कैसे डालना है?

अगर खेत खाली है तो इसको सीधे स्प्रे कर सकते हैं मिट्टी को भिगाने के हिसाब से। डब्बे में भर-भर के छिड़क सकते हैं या स्प्रे पम्प में भरकर छिड़क सकते हैं, स्प्रे पम्प का नोजर निकाल देंगे तो ये छिड़कना आसान होगा।

फसल अगर खेत में खड़ी हुई है तो फसल में जब पानी लगाएंगे तो पानी के साथ इसको मिला देना है।

खेत में यह खाद कब-कब डालनी है?

इसका आप हर 21 दिन में दोबारा में डाल सकते हैं आज अपने डाला तो दोबारा 21 दिन बाद डाल सकते हैं, फिर 2 दिन बाद डाल सकते हैं। मतलब इसका है कि अगर फसल तीन महीने की है तो कम से कम 4-5 बार डाल दीजिए। चार महीने की है तो पांच से छह बार डाल दीजिए। 6 महीने की फसल है तो सात-आठ बार डाल दीजिए, साल की फसल है तो उसमें आप इसको 14-15 बार डाल दीजिए। हर 21 दिन में जालते जाना हैं। इस खाद से आप किसी भी फसल को भरपूर उत्पादन ले सकते हैं- गेहूँ, धन, चना, गन्ना, मूंगफली, सब्जी सब तरह की फसलों में ये डालकर देखा गया है। इसके बहुत अच्छे और बहुत अद्भुत परिणाम हैं। सबसे अच्छा परिणाम क्या आता है इसका? आपकी जिंदगी का खाद का जो खर्चा है 60 प्रतिशत, वो एक झटके में खत्म हो गया। फिर दूसरा खर्चा क्या खत्म होता है, जब आप ये गोबर-गौमूत्र का खाद डालेंगे तो खेत में विष कम हो जाएगा, तो जन्तुनाशक डालना और कम हो जायेगा, कीटनाशक डालना और कम हो जायेगा। यूरिया डी.ए.पी. का असर जैसे-जैसे मिट्टी से कम हो जाएगा, बाहर से आने वाले कीट और जंतु भी आपके खेत में कम होते जाएंगे, तो जंतुनाशक और कीटनाशक डालने का खर्च भी कम होता जाएगा, और लगातार तीन-चार साल में ये खाद बनाकर अपने डाल दिया तो लगभग तय मानिए आपके खेत में कोई भी जहरीला कीट और जंतु आया नहीं, तो उसको मारने के लिए किसी भी दवा की आवश्यकता नहीं पड़ेगी तो 20 प्रतिशत जो कीटनाशक का खर्चा था वो भी बच जाएगा। खेती का 80 प्रतिशत खर्चा आपका बच जाएगा। दूसरी बात इस खाद के बारे में ये है कि ये सभी फसलों के लिए

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हैं। जानवरों का गोबर और गौमूत्र गाँव में आसानी से मिल जाता है। गोबर इकट्ठा करना तो बहुत आसान है। जानवरों का मूत्र इकट्ठा करना भी आसान है।

देशी गौमाता या देशी बैल का मूत्र कैसे इकट्ठा करें?

सभी देशी गौमाता या देशी बैल मूत्र देते हैं। आप ऐसा करिए कि उनको बांधने का जो स्थान है वो थोड़ा पक्का बना दीजिए, सीमेंट या पत्थर लगा दीजिए और स्थान को थोड़ा ढाल दे दीजिए और उसमें एक नाली बना दीजिए और बीच में एक खड्डा बना दीजिए। तो जानवर जो भी मूत्र करेंगे वो सब नाली में आकर खड़े में इकट्ठा हो जाएगा। अब देशी गौमाता या देशी बैल के मूत्र की एक विशेषता है कि इसकी कोई एक्सपायरी डेट नहीं है। 3 महीने, एक साल, दो साल, पाँच साल, दस साल कितने भी दिन पड़ा रहे खड़े में, वो खराब बिल्कुल नहीं होता। इसलिए बिल्कुल निश्चित तरीके से आप इसका इस्तेमाल करें, मन में हिचक मत लायें कि ये पुराना है या नया। हमने तो ये पाया है कि जितना देशी गौमाता या देशी बैल का मूत्र पुराना होता जाता है उसकी गुणवत्ता उतनी ही अच्छी होती जाती है। ये जितने भी मल्टीनेशनल कंपनियों के जंतुनाशक है उन सबकी एक्सपायरी डेट है और उसके बाद भी कीड़े मरते नहीं है और किसान उसको कई बार चख कर देखते हैं कि कहीं नकली तो नहीं है, तो किसान मर जाते हैं, कीड़े नहीं मरते हैं तो मल्टीनेशनल कम्पनियों के कीटनाशक लेने से अच्छा है देशी गौमाता या देशी बैल के मूत्र का उपयोग करना। तो इसको खाद में इस्तेमाल करिए ये एक तरीका है। लगातार तीन साल इस्तेमाल करने पर आपके खेत की मिट्टी को एकदम पवित्र और शुद्ध बना देगा, मिट्टी में एक कण भी जहर का नहीं बचेगा, और उत्पादन भी पहले से अधिक होगा। फसल का उत्पादन पहले साल कुछ कम होगा परन्तु खाद का खर्चा एक ही झटके में कम हो जायेगा और उत्पादन भी हर साल बढ़ता जायेगा।

बाजार से किसी विदेशी कम्पनी का 15000 रूपए लीटर का कीटनाशक लाने से अच्छा है इन देसी गौमाता या देसी बैले के मूत्र से ही कीटनाशक बना सकते हैं। अगर किसी फसल में कोई कीट या जंतु लग गया, उसको खत्म करना है, मारना है तो उसके लिए एक सूत्र आप लिख लीजिए कि कीटनाशक बनाना भी बेहद आसान है, कोई भी किसान भाई अपने घर में बना सकते हैं।

कीटनाशक बनाने के लिए क्या करना पड़ता है ?

एक एकड़ खेत के लिए अगर कीटनाशक तैयार करना है तो :-

    1. 20 लीटर किसी भी देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र चाहिए।
    1. 20 लीटर मूत्र में लगभग ढाई किलो ( आधा किलो कम या ज्यादा हो सकता है ) नीम की पत्ती को पीसकर उसकी चटनी मिलाइए, 20 लीटर मूत्र में। नीम के पत्ते से भी अच्छा होता है नीम की निम्बोली की चटनी।
    1. इसी तरह से एक दूसरा पत्ता होता है धतूरे का पत्ता। लगभग ढाई किलो धतूरे के पत्ते की चटनी मिलाइए उसमें।
    1. एक पेड़ होता है जिसको आक या आँकड़ा कहते हैं, अर्कमदार कहते हैं आयुर्वेद में। इसके भी पत्ते लगभग ढाई किलो लेकर इसकी चटनी बनाकर मिलाए।
    1. जिसको बेलपत्री कहते हैं, जिसके पत्र आप शंकर भगवान के उपर चढ़ाते हैं। बेलपत्री या विल्वपत्रा के पत्ते की ढाई किलो की चटनी मिलाए उसमें।
    1. फिर सीताफल या शरीफा के ढाई किलो पत्तों की चटनी मिलाए उसमें।
    1. आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना।

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  1. इसमें 1 किलो लाल मिर्च का पाऊडर भी डाल दें।

  2. इसमें बेशर्म के पत्ते भी ढाई किलो डाल दें।

तो ये पांच-छह तरह के पेड़ों के पत्ते आप ले लो ढाई- ढाई किलो। इनको पीसकर 20 लीटर देसी गौमाता या देसी बैले मूत्र में डालकर उबालना हैं, और इसमें उबालते समय आधा किलो से 750 ग्राम तक तम्बाकू का पाऊडर और डाल देना। ये डालकर उबाल लेना हैं उबालकर इसको ठंडा कर लेना है और ठंडा करके छानकर आप इसको बोटलों में भर ले रख लीजिए। ये कभी भी खराब नहीं होता। ये कीटनाशक तैयार हो गया। अब इसको डालना कैसे है? जितना कीटनाशक लेंगे उसका 20 गुना पानी मिलाएं। अगर एक लीटर कीटनाशक लिया तो 20 लीटर पानी, 10 लीटर कीटनाशक लिया तो 200 लीटर पानी, जितना कीटनाशक आपका तैयार हो, उसका अंदाजा लगा लीजिए आप, उसका 20 गुना पानी मिला दीजिए। पानी मिलकर उसको आप खेत में छिड़क सकते हैं किसी भी फसल पर। इसको छिड़कने का परिणाम ये है कि दो से तीन दिन के अंदर जिस फसल पर आपने स्प्रे किया, उस पर कीट और जंतु आपको दिखाई नहीं देंगे, कीड़े और जंतु सब पूरी तरह से दो-तीन दिन में ही खत्म हो जाते हैं, समाप्त हो जाते हैं। इतना प्रभावशाली ये कीटनाशक बनकर तैयार होता है। ये बड़ी-बड़ी विदेशी कम्पनियों के कीटनाशक से सैकड़ों गुणा ज्यादा ताकतवर है और एकदम फोकट का है, बनाने में कोई खर्चा नहीं। देसी गौमाता या देसी बैले का मूत्र मुफ्त में मिल जाता है, नीम के पत्ते, निम्बोली, आक के पत्ते, आड़ू के पत्ते- सब तरह के पत्ते मुफ्त में हर गाँव में उपलब्ध हैं। तो ये आप कीटनाशक के रूप में, जंतुनाशक के रूप में आप इस्तेमाल करें।

अंतिम शब्दों में राजीव भाई को एक भाव पूर्ण श्रद्धांजलि ....

जिसने भारत का सोया स्वाभिमान जगा दिया....

भारत सोने की चिडिया था.. है.. और आगे कैसे होगा

हम-सब को फिर से बता दिया....

आज जब सत्य बोलना नामुमकिन हो,

उसने उस डगर पे चलना हमे सिखा दिया...

भारत का सोया स्वाभिमान जगा दिया...

वो आया था “विवेकानन्द” बन कर

अपने सत् कर्मों से बता दिया...

पर अफसोस कि देश आज भरा गद्दारो से,

जिस कारण “माँ भारतीय के लाल को,

शास्त्री जी” की तरह विदा किया।

Three stars arranged horizontally as a decorative separator.

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