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स्वप्नदोष चिकित्सा

Swapnadosh Chikitsa

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (उद्गम)

DevanagariHindipublished14 पृष्ठ

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स्वप्रदोष की चिकित्सा

है कि स्वप्रदोष में तो वह वीर्य जो हजम होने (पचने) से बच जाता है अर्थात् शरीर का अंग नहीं बनता, नष्ट होता वा बाहर निकलता है। किन्तु विषयभोग वा मैथुन से एक भयंकर धक्का सारे शरीर पर लगता है। जो वीर्य शरीर का अंग बन चुका होता है वह पिण्डल-पिण्डलकर पतला होकर निकलता है और स्वप्रदोष की अपेक्षा अधिक मात्रा में निकलता है। मैथुन से स्वप्रदोष की अपेक्षा बहुत अधिक भयंकर हानि होती है। मैथुन से तो स्वप्रदोषों की संख्या और बढ़ जाती है और प्रमेहादि भयङ्कर रोग उत्पन्न होजाते हैं जो मृत्यु का कारण बन जाते हैं। अतः इस भयानक भ्रम में फँस विनाश के गढ़े में पड़कर मृत्यु को न बुलाओ और मैथुनों से सर्वथा दूर रहो।

कई मूर्ख डाक्टर यह कहते हैं कि स्वप्रदोषादि के द्वारा वीर्य का निकल जाना स्वाभाविक है और इससे कोई हानि नहीं होती। यह अत्यन्त मिथ्याकल्पना है। वीर्य की दो गति हैं—(१) अधोगति (नीचे को जाना), (२) ऊर्ध्वगति (ऊपर को जाना)। जिस प्रकार शरीर को रस रक्त आदि अन्य छः धातुवें धारण करती हैं और शरीर का अंग बनजाती हैं, कभी बिना निकाले बाहर नहीं निकलतीं। इसी प्रकार वीर्य जैसा अमूल्य तत्त्व, जो सब धातुओं का सार है, जिसमें आश्चर्यनक शक्ति है, वह मनुष्य की इच्छा और भूल किये बिना बाहर नहीं निकल सकता। वीर्य का शरीर से स्वयं बाहर निकलना तो दूर की बात है, किन्तु (रोग के आतुरिक) मल-मूत्र भी तो बिना इच्छा के बाहर नहीं निकलता। अतः स्वप्रदोष जिसमें अनजाने वीर्य निकलता है, सर्वथा अस्वाभाविक वा रुग्णावस्था है। पूर्ण युवावस्था में शरीर में वीर्य की उत्पत्ति पर्याप्तमात्रा में होती है। जब आरम्भ में कभी-कभी स्वप्रदोष द्वारा शरीर से वीर्य निकलता है तो उससे हानि वा बुरा प्रभाव दिखाई नहीं देता। नया उत्पन्न होनेवाला वीर्य इस थोड़ीसी हानि की पूर्ति कर देता है। मूर्ख मनुष्य यह समझने लगता है—मुझे कोई हानि नहीं हुई। वीर्य के एक बिन्दु का नाश भी हानिकारक है और मृत्यु की ओर लेजानावाला है। जो बालक धार्मिक माता-पिता की सन्तान है आरम्भ से जिसे सदाचार की शिक्षा दीजाती है। सदा सत्सङ्ग तथा अच्छे साथियों के साथ रहता है, शुद्ध और सात्विक भोजन करता है, व्यायाम प्राणायामादि ब्रह्मचर्य के सभी नियमों का पालन करता है, वह सौ वर्ष वा इससे भी अधिक जब तक वह जीवित रहता है, उसे कभी भी स्वप्रदोष नहीं होगा। उसका वीर्य उसके शरीर के अन्दर ही खप जाता है। अर्थात् शारीरिक बल व शक्ति का रूप धारण करता है। उसके वीर्य की सदा ऊर्ध्वगति रहती है। जिस प्रकार जलते हुए दीपक का तैल वर्तिका (बत्ती) के सहारे ऊपर चढ़कर प्रकाश के रूप में बदल जाता है, उसी प्रकार शुद्ध आहार व्यवहार, व्यायाम और प्राणायाम द्वारा यह शरीर का अङ्ग बनकर बल व शक्ति का रूप धारण करता है। अथवा विचाराग्नि में जलकर मस्तिष्क व बुद्धि का रूप धारण करता है और विद्या के

ऊर्ध्वरेता होने की प्राचीनविद्या

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भण्डार को भरदेता है। निष्कर्ष यह है कि वीर्य शरीर में शक्ति के रूप में रहता है। वीर्य के रूप में नहीं। इसलिए प्राचीनकाल में विद्यार्थी वीर्य की रक्षा करके शारीरिक और मानसिक उन्नति करते थे। अनेक ऋषि महर्षि लोग तो ऊर्ध्वरेता होते थे। अर्थात् आयुभर अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करते थे।

ऊर्ध्वरेता होने की प्राचीनविद्या

ऊर्ध्वरेता होने की एक विशेष विद्या थी। जिससे वीर्य की गति सदा के लिये ऊर्ध्व होजाती थी। उसी विद्या की कुछ झलक व रूपरेखा आदर्श ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों में मिलती है। अनेक वर्ष इसकी खोज तथा अनुभव मैं भी करता रहा हूँ। इसका अनुभव मेरे अनेक ब्रह्मचर्यप्रेमी साथियों ने किया व कराया है। जिसने इसका अनुभव किया उसने ही इसकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की। जो इसका दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक और निरन्तर सेवन करेगा वह निश्चयपूर्वक ऊर्ध्वरेता होजायेगा। उसकी इच्छा के बिना वीर्य का एक बिन्दु भी उसके शरीर से बाहर नहीं निकल सकता। उस विधि का कुछ भाग ब्रह्मचर्यप्रेमियों के लाभार्थ नीचे देता हूँ।

वैदिक पुस्तकालय

यह एक प्राणायाम की विधि है। इसके केवल पढ़नेमात्र से कार्य नहीं चलेगा। ब्रह्मचर्य के अन्य नियमों का पालन करते हुए इस प्राणायाम का प्रतिदिन अभ्यास करना है। आजकल कुसंग तथा कुसंस्कारों के कारण बालक हस्तमैथुन, गुदा-मैथुन, पशु-मैथुन आदि कुटेवों (बुरी आदतों) और पापों में फंसकर बार-बार वीर्य का नाश करते हैं। इससे वीर्य की अधोगति होती है और वह बिना इच्छा के भी स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर निकलता रहता है, ऐसे बालक सत्संग व स्वाध्याय से हस्तमैथुन आदि कुटेवों को छोड़ देते हैं और वीर्यरक्षा के यत्न करते हैं। किन्तु उनकी इच्छा के विरुद्ध स्वप्रदोष आदि के द्वारा वीर्य निकलता रहता है तो बड़े दुःखी रहते हैं। ऐसे ही गृहस्थ के नाम पर घरेलू व्यवहार करनेवाले नामधारी गृहस्थियों की दुर्दशा होती है। यहां तक कि कितने ही युवक तो हस्तमैथुनादि अप्राकृतिक मैथुनों और स्वप्रदोषादि रोगों से नपुंसक बनजाते हैं। जब एक बालक वा युवक बार-बार कुचेष्टायें वा व्यवहार से वीर्य नष्ट करता है तो उसके शरीर में कई बार उत्तेजना होने से एक भयानक धक्का शरीर को लगता है। कामाग्नि से सारा शरीर जलने लगता है। शरीर के अन्दर जमा और रमा हुआ वीर्य पिंघलने लगता है। जैसे शीत में जमा हुआ घूत अग्नि पर रखने से पिंघलकर पतला होजाता है और पात्र (बर्तन) में छेद होने से बाहर निकल जाता है, इसी प्रकार छोटे-छोटे बालकों में भी छोटीसी आयु में कामाग्नि जल उठती है और उनका वीर्य पतला होकर नीचे बहने लगता है और नाभि के नीचे मलाशय मूत्राशय के समीप जो वीर्य का कोष (खजाना) है उसमें ठहरने लगता है और वीर्य से वीर्यकोष भरजाता है। यह वीर्य

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स्वप्रदोष की चिकित्सा

फिर लौटकर शरीर में ऊपर को नहीं जाता और स्वप्रदोषादि के द्वारा बाहर निकल जाता है। इसी प्रकार वीर्य का कोष बार-बार भरता और खाली होता रहता है। वह वीर्य जो शरीर का राजा है जिसे शरीर का अङ्ग बनना था, जो २५ वर्ष की आयु से पहले कभी भी वा आयुभर शरीर से बाहर नहीं निकल सकता था तथा जो ऊर्ध्वगति होकर शरीर और मस्तिष्क की शक्ति का रूप धारण करता, आज इच्छा के विरुद्ध शरीर का सार अमृतरूपी वीर्य मूत्र के समान बुरी तरह टपक-टपककर निकल रहा ह। ऐसी अवस्था में बालक और युवक धाड़ मारकर रोते और चिल्लाते हैं।

उनके आंसू पोंछने के लिये यह ऊर्ध्वरेता होने का गुसरहस्य कर्तव्यभावना से लिख रहा हूँ। इसमें शुक्राशय (वीर्य के खजाने) में पड़ा हुआ वीर्य फिर ऊपर को जाने लगेगा, जैसे कि दीपक का तैल जाता है। यह ऋषियों की गुप्तविद्या है। जो आज लाखों रुपये खर्च करने पर नहीं मिलती। कितने ही ब्रह्मचर्य के दीवाने इसकी खोज करने में रात दिन एक कर देते हैं, भयङ्कर से भयङ्कर पर्वतों की गुफाओं और कन्दराओं को छान मारते हैं तब जाकर इसका भेद मिलता है। इसलिये इसको पढ़कर व्यर्थ न समझ लेना, इसका श्रद्धापूर्वक अभ्यास करो। इससे स्वप्रदोषादि रोगों से अवश्य ही पिण्ड छूट जायेगा और वीर्यरक्षा में सफल होजावोगे।

२. प्राणायामविधि

पहले सिद्ध आसन से बैठजाओ। उसकी विधि इस प्रकार है। बायें पैर की एड़ी अण्डकोष और गुदा इन्द्रिय के बीच में जो स्थान है उस पर लगाओ। यह वह स्थान है जहां से वीर्यवाहक नाड़ियां जाती हैं। इन ही में से गुजरकर वीर्य बाहर निकल जाता है। इसलिए पैर की एड़ी को इन नाड़ियों पर दबाकर लगाना चाहिये। दायें पैर की एड़ी मूत्र इन्द्रिय के ऊपर जहां बाल उगते हैं, लगाओ। दोनों पैरों के गट्टे मिले हुए हों। दोनों पैरों के घुटने भूमि पर लगे हुए हों। शिर ग्रीवा (गर्दन), मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) सब समरेखा में (सीधी) रहनी चाहिए। एक कपड़े की छोटी गद्दी बनाकर गुदा के नीचे रखलो। जिससे वीर्यवाहक नाड़ियों पर अधिक बल (जोर) पड़े। दोनों हाथों को तानकर दोनों घुटनों पर रखो। शरीर सारा खिंचा हुआ होना चाहिये। छाती तनी हुई तथा आगे को उभरी हुई हो। ठोडी का झुकाव थोड़ासा छाती की ओर हो। केवल लंगोट लगाकर आसन में बैठो तो अच्छा रहेगा। यदि केवलमात्र इस सिद्धासन का ही अभ्यास किया जाये तो यह भी वीर्यरक्षार्थ तथा स्वप्रदोष को दूर करने में अत्यन्त हितकर है।

प्राणायाम करने से पूर्व यदि बायां स्वर चलता हो तो अच्छा है। जिधर से वायु आता हो उधर मुख रखो। जैसे अत्यन्त वेग से वमन (कै) होता है और अन्न जल बाहर निकल जाता है, वैसे ही प्राण (श्वास) को बल से बाहर फेंकदो। एक ही बार, निरन्तर एक श्वास में, सारी वायु बाहर निकल जाय। झटके दे देकर नहीं।

प्राणायामविधि

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श्वास निकलने से पूर्व नाभि के नीचे से मूल इन्द्रिय का ऊपर संकोच करो (खींचो)। पहिले हृदय का वायु बल से बाहर निकालो। फिर ऊपर के फेफड़े का श्वास निकालकर खाली करना चाहिये। फिर उदर (पेट) को खाली करना। किन्तु ध्यान रखो—सारा प्राण एक श्वास में ही बाहर निकलजाये। श्वास तोड़-तोड़कर कभी न निकालो। श्वास को लम्बा करके तथा निरन्तर गति देते हुए एक ही बार बाहर निकालदो। जब श्वास सारा हृदय, फेफड़ों और उदरादि का बाहर निकलजाये तो उदर (पेट) को अन्दर की ओर खींचे रहो। श्वास को यथाशक्ति बाहर ही रोको। जब घबराहट जो तब धीरे-धीरे भीतर वायु को लेलो। किन्तु अन्दर नहीं रोको। यह एक प्राणायाम हुआ।

फिर उसी प्रकार दूसरा प्राणायाम, फिर बाहर निकालकर बाहर ही रोककर करो। इसी प्रकार तीन प्राणायाम करो। अन्दर नहीं रोको। पहिले बाह्यकुम्भक (बाहर रोकने) का ही अभ्यास करो। बाह्यविषय वा बाह्यकुम्भक का अभ्यास कम से कम एक वर्ष तक करना चाहिये। यही पहला प्राणायाम है। जब तक यह सिद्ध न होजाय तब तक दूसरा प्राणायाम (आभ्यन्तर) जो अन्दर रोकने का है (इसे आभ्यन्तर कुम्भक कहते हैं नहीं करना चाहिये। लोग अन्दर और बाहर रोकना दोनों एक साथ आरम्भ करदेते हैं। इसलिए लाभ तथा उन्नति नहीं होती। जब पहिले प्राणायाम में सफलता मिलजाये तब दूसरे का अभ्यास करना चाहिये। एक मास तक तीन प्राणायाम प्रातःकाल करो और तीन प्राणायाम सायंकाल करो। फिर शनैः-शनैः प्रतिमास संख्या बढ़ातेजाओ। यदि गोदुग्ध, घृत वा अन्य पौष्टिकभोजन पर्याप्त खाने को मिले तो दोनों समय अभ्यास करना चाहिये और संख्या बढ़ाते-बढ़ाते इक्कीस (२१) प्राणायाम तक करसकते हैं। पौष्टिकभोजन का अभाव (कमी) हो तो धीरे-धीरे संख्या बढ़ाओ। कभी शक्ति से अधिक न करो, न ही नाक पकड़कर अधिक देर बलात् (जबरदस्ती) रोकने का यत्न करो। इस प्राणायाम में आरम्भ से लेकर अन्त तक एक विशेषक्रिया का ध्यान रखना तथा अभ्यास करना है। श्वास निकलने से पूर्व नाभि के नीचे जो मूलाधार को खींचा था, उसे खींचे ही रखना है। ढीला नहीं छोड़ना और इसे खींचे रखने का तो अभ्यास करना है। जितनी देर वा जितने भी प्राणायाम करो मूलाधार को खींचे ही रखना। पहिले-पहिले कुछ कठिनाई वा कष्ट प्रतीत होगा, किन्तु कुछ दिन के अभ्यास से ठीक हो जावेगा। मूलाधार खींचते समय मन से नाभि के नीचे ध्यान करें कि हम अपने वीर्य को ऊपर खींच रहे हैं। सारे प्राणायाम में यह ही ध्यान करते रहो।

कुछ दिन के अभ्यास से वीर्य ऊपर को यथार्थ में खिंचने तथा जाने लगेगा और जब आप निरन्तर अभ्यास करते-करते इक्कीस (२१) प्राणायाम तक पहुंच जायेंगे तो वीर्य की गति पूर्णतया ऊर्ध्व होजायेगी। वीर्य ऊपर को मस्तिष्क की ओर बहने लगेगा। आप ऊर्ध्वरैता होजायेंगे। आपका वीर्यकोष खाली होजायेगा और

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स्वप्रदाष का चिकित्सा

इसमें वीर्य आना ही बन्द होजायेगा फिर स्वप्रदोष कैसे होगा? आपकी इच्छा के बिना वीर्य का एक बिन्दु भी शरीर से बाहर नहीं निकलसकता। फिर कैसा स्वप्रदोष और प्रमेहरोग? किन्तु यह निरन्तर दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक अभ्यास करने से होगा। मैं यह कई बार लिखचुका हूँ।

आप इसे दूसरी प्रकार से भलीभाँति समझ जायेंगे। जब आप लघुशंका (पेशब) करने जावों और मूत्र-त्याग (पेशब) करते समय बीच में ही नाभि के नीचे के भाग मूलेन्द्रिय को खींचो तो गुदाइन्द्रिय और मूत्रेन्द्रिय भी एकसाथ खिंचेंगी और इससे मूत्र निकलना एकदम बन्द होजायेगा और जब तक आप इसे ढीला न छोड़ेंगे एक बूंद भी मूत्र बाहर नहीं निकलसकता। यह अनुभव आप करके देखलें या जब कुछ मास तक आप प्राणायाम का अभ्यास करलेंगे और आपको मूलाधार खींचे रहने का अभ्यास पक्का होजायेगा तब आप देखेंगे कि स्वप्नों और स्वप्रदोषों की संख्या स्वयं घटती चलीजायेगी। रात्रि में ऐसी अवस्था भी आयेगी कि आपको स्वप्रदोष होने का अवसर आयेगा तो अर्धनिद्रा में आप मूलाधार को खींच लोगे और आपकी आँखें खुलजायेंगी। आप स्वप्रदोष से बच जावोंगे। आपकी विजय होगी। यदि सोने से पूर्व खालीपेट ही यह प्राणायाम कियाजाय तो शीघ्र लाभ होगा। आपकी विजय और हार आपके अभ्यास पर है। जब कम से कम एक वर्ष तक आप अभ्यास करलें तो आगे का प्राणायाम मुझ से पत्र द्वारा वा मिलकर पूछलें। इस प्राणायाम की जितनी प्रशंसा करें थोड़ी है, सब ऋषियों और विशेषतया पूज्यपाद महर्षि दयानन्द की कृपा है जो ऐसी विद्या इस गिरे हुए संसार को मिली है। इस प्राणायाम के अभ्यास से जहां स्वप्रदोषादिरोग दूर होंगे वहां शरीर में वीर्यवृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम और जितेन्द्रियता की प्राप्ति होगी। सब शास्त्र और विद्याओं को थोड़े ही काल में समझकर विद्यार्थी उपस्थित करलेगा। इसका अभ्यास सब युवकों, विद्यार्थियों तथा ब्रह्मचर्यप्रेमियों (स्त्री तथा पुरुषों) को करना चाहिये। इससे मन और इन्द्रियों के सब दोष क्षीण और दूर होजाते हैं और मनुष्य इनको अपने वश में करलेता है। यह वीर्यरक्षा का सर्वोत्तम साधन और परम औषध है।

३-यन्त्र-चिकित्सा

स्वप्रदोष क्षीण और दूर करने के लिये एक यन्त्र भी तैयार किया जाता है। एक लोहे वा पीतल से स्पर्शिंगवाला छल्ला बनता है। जिसके अन्दर स्पर्शिंग लगा होता है। इसके कुछ ऊपर बाहर की ओर चारों ओर छले में ही काटे लगे रहते हैं। स्पर्शिंगवाला छल्ला छोटा बड़ा होसकता है। स्वप्रदोष का रोगी इसे मूत्रेन्द्रिय में पहनकर सोजाता है। जब स्वप्रदोष से पूर्व उत्तेजना होती है, तो काटे मूत्रेन्द्रिय में चुभने से आँखें खुलजाती हैं और स्वप्रदोष से बचजाता है। किन्तु इससे पूर्ण सफलता नहीं मिलती। कुछ लाभ होजाता है। यह किसी मिस्त्री से तैयार कराया जासकता है।

औषध चिकित्सा

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४-जल-चिकित्सा

स्वप्दोष से बचने के लिए प्रतिदिन दोनों समय शीतलजल से स्नान करो। प्रतिदिन सोते समय भी स्नान से बड़ा लाभ होता है।

स्नान के समय नाभि के नीचे शीतलजल की खूब देर तक धार डालो। साथ ही प्रतिदिन जब-जब शौच या लघुशंका करने जावो तो शीतलजल का एक बड़ा पात्र साथ लेजाओ और मूत्रेन्द्रिय के अगले भाग पर छिद्र के ऊपर बारीक धार पांच मिनट तक डालो। यह मूत्रेन्द्रियस्नान सोने से पूर्व भी करो। अण्डकोष और मूत्रेन्द्रिय के आसपास के भागों को भी धोडालो। इससे मसाने में ठण्डक रहेगी। सोने से पूर्व हाथ-पैर, शिर ग्रीवा (गर्दन) धोडालो। इन सब क्रियाओं के करने से ५० प्रतिशत स्वप्रदोष की संख्या घटजाती है। बहुतों का स्वप्नदोष तो सर्वथा इससे ही दूर होगया है।

५-मलाशय और मूत्राशय की शुद्धता

सोने से पूर्व अधिक खाने-पीने से मलाशय तथा मूत्राशय भरजाते हैं और मल-मूत्र का दबाव वीर्यकोष पर पड़ता है। जिससे स्वप्दोष होजाता है। 'एकभुक्त रोगमुक्त' होता है। अतः स्वप्रदोष के रोगी को एक समय भोजन करना चाहिये वा सोने से तीन या चार घण्टे पूर्व थोड़ीसी मात्रा में ताजा गोदुग्ध लेले वा हल्कासा भोजन करे। सोते समय खाली पेट हो। कई युवकों वा बालकों को सोते समय दूध वा जल पीने से ही स्वप्रदोष होने लगता है। अतः सोने से तीन चार घण्टे पूर्व खाना पीना बन्द करदेना चाहिये। बहुत बार तो स्वप्रदोष पेट के भारी होने से तथा खाने-पीने की छोटी-छोटी भूलों से ही होता रहता है। अजीर्ण (कब्ज) कभी न होने दो। अजीर्ण दूर करने के लिये आसन-व्यायाम प्रतिदिन करो। मल-मूत्र के वेग को कभी न रोको। रात्रि को आँख खुलने पर लघुशंका अवश्य करलो। आलस्य न करो। प्रातःकाल ३ व ४ बजे के बीच में उठकर मल-मूत्र का त्याग करो। उस समय सोते रहने से मल-मूत्र से मलाशय और मूत्राशय भरेहुये रहते हैं। उनका वीर्यकोष पर दबाव पड़ने से त्रैर्यनाश होजाता है। मलत्याग (शौच) करने का स्वभाव दोनों समय का बनाओ। पेट में मल पड़े रहने से भी स्वप्रदोष होजाता है।

६-औषध-चिकित्सा

(१) जिनको अजीर्ण रहता है वे चार-छः छटांक त्रिफले को कपड़े में छानकर एक छटांक गोघृत वा बादामरोगन में भिगो और चार छटांक खांड मिलाकर रखलें। रात को यह एक तोला औषध थोडेसे (नाममात्र) गर्मदूध वा ताजेजल के साथ सेवन करें। इससे अजीर्ण तथा प्रमेह भी दूर होता है। कफप्रकृतिवालों के लिये रामबाण है।

(२) सितावर एक छटांक, असगन्ध नागोरी एक छटांक, विधारा के बीज

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स्वप्रदोष की चिकित्सा

एक छटांक (लकड़ी नहीं केवल बीज ही लेने हैं), इन सबको बारीक पीसकर कपड़छान कर लो। इसमें तीन छटांक खांड वा मिसरी मिला लो। यह सबके लिये अत्यन्त आवश्यक है। स्वप्रदोष को यह औषध अवश्यमेव दूर करती है। कितने ही अच्छे-अच्छे वैद्यों ने इसे हजारों बार अनुभव किया है। यह औषध ऐसे युवकों के लिये जो स्कूल वा कालेज आदि में पढ़ते हों वा अविवाहित हों, बहुत ही लाभदायक सिद्ध होता है। किन्तु इतना ध्यान रखना चाहिये यदि स्वप्रदोष का रोगी शरीर से बलवान् है और साथ ही ब्रह्मचारी है जिसके शरीर में वीर्य पर्याप्तमात्रा में है, ऐसे युवक वा विद्यार्थी को स्वप्रदोष वीर्य की अधिकता के कारण हो तो उसे ताजेजल के साथ ही दो वा तीन माशे से अधिक नहीं दें। किन्तु जो रोगी अपने हाथों अपना सर्वनाश कर चुका हो और इसी प्रकार की गुदामैथुनादि कुटेवों के कारण इस स्वप्रदोष को खरीदा हो, उसे पहिले तो सब बुराइयाँ छोड़ देनी चाहिए। फिर वह इस औषध को तीन माशे से छः माशे तक दोनों समय ताजा धारोष्ण गोदुग्ध (ताजा निकले हुए गाय के दूध) के साथ प्रयोग करे। इससे स्वप्रदोष ही दूर नहीं होता इससे शरीर में वीर्य की वृद्धि पर्याप्तमात्रा में होती है। वीर्य गाढ़ा हो जाता है। खूब बल और शक्ति बढ़ती है। यह औषध रामबाण है।

(३) आयुर्वेदिक फार्मसी, गुरुकुल झज्जर ने स्वप्रदोषचिकित्सा के लिये स्वप्रदोषामृत नामक औषध का निर्माण किया है। अनेक रोगियों पर हमने प्रयोग करके देखा है, वह स्वप्रदोष के रोगियों को अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हुई है।

७-शीर्षासन तथा व्यायाम

व्यायाम किये बिना वीर्य-रक्षा असम्भव है। व्यायाम से वीर्य शरीर का अङ्ग बन जाता है। स्वप्रदोषादि विकार बहुत कुछ व्यायाम से ही दूर होजाते हैं। व्यायाम में शीर्षासन तो स्वप्रदोष तथा प्रमेह की अच्छूक औषध है। शीर्षासन दस सैकिंड से आरम्भ करके शनैः-शनैः प्रतिदिन बढ़ाये। बढ़ाते समय अपनी शक्ति और भोजन का ध्यान रखें। यह अनुभवसिद्ध है जब शीर्षासन का १० वा १५ मिनट तक अभ्यास होजाता है तो स्वप्रदोष तथा वीर्यसम्बन्धी सभी रोग दूर भाग जाते हैं। स्वास्थ्य आदर्श तथा मुख तेजस्वी होजाता है। बुद्धि और मस्तिष्क की शक्ति की वृद्धि होती है। शीर्षासन सब व्यायामों से पूर्व करो तथा दोनों समय (शौच से पीछे) शिर के नीचे कपड़े की गद्दी रखकर करो। इसकी पूरी विधि किसी पुस्तक में देख लो।

यह लेख संक्षेप से लिखा है, तदर्थ सचेत रहें। किन्तु जो साधन स्वप्रदोष को दूर करने के लिये लिखे हैं वे सुने-सुनाये नहीं अपितु अनेक रोगियों पर अनुभव कियेगये हैं। आप स्वयं परीक्षण करके देखोगे तो सारी आयु ऋषियों के गुण गाते-गाते नहीं थकोगे। यदि कुछ भी विद्यार्थियों वा युवकों ने इस लेख से लाभ उठाया तो मैं अपने को कृतार्थ समझूंगा।

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A circular logo with a blue outer ring and a white inner ring. Inside the inner ring is a circular image of a deity, likely Saraswati, holding a veena and a mridanga. The text 'वैदिक पुस्तकालय' is written in yellow Devanagari script along the top and bottom inner edges of the blue ring.

An illustration of three wooden blocks stacked vertically, representing the three Vedas. The top block is labeled '॥ यजुर्वेद ॥', the middle block is labeled '॥ सामवेद ॥', and the bottom block is labeled '॥ अथर्ववेद ॥'. The background is a fiery red and orange, suggesting a sacred or intense atmosphere.