तैत्तिरीय आरण्यक (कृष्ण यजुर्वेद - सायणभाष्य व हिन्दी अनुवाद)
Taittiriya Aranyaka Hindi
महर्षि वैशम्पायन द्वारा
स्रोत: Taittiriya Aranyaka with Sayana Bhashya and Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 625, कुल 940 में से
संदर्भ में पढ़ें६१२ तैत्तिरीये आरण्यके
क्ति। त्रय॑ इ॒मे लो॒काः। ए॒भ्य ए॒व लो॒केभ्यो॒ य॒ज्ञस्य॒ शिरोऽव॑रुन्द्धे^(२)। ^(३)षट् संप॑द्यन्ते। षड् वा ऋ॒तव॑: ॥ १ ॥
ऋ॒तुभ्य॑ ए॒व य॒ज्ञस्य॒ शिरोऽव॑रुन्द्धे^(३)। ^(४)द्वाद॑शकृत्वः॒ प्रवृ॑णक्ति। द्वाद॑श॒ मासा॑: संवत्स॒रः। सं॑वत्स॒रादे॒व य॒ज्ञस्य॒ शिरोऽव॑रुन्द्धे^(४)। ^(५)चतु॑र्विग्ंशतिः संप॑द्यन्ते। चतु॑र्विग्ंशतिरर्धमा॒साः। अ॒र्ध॒मासेभ्य॑ ए॒व य॒ज्ञस्य॒ शिरोऽव॑रुन्द्धे^(५)। ^(६)अथो॒ खलु॑। स॒कृदे॒व प्रवृ॑ञ्ज्याः। एक॒ग्ं॒ हि शिर॑:^(६) ॥ २ ॥
^(७)अ॒ग्नि॒ष्टो॒मे प्रवृ॑णक्ति। ए॒तावा॒न् वै य॒ज्ञः। यावा॑नग्नि॒ष्टोम॑:। यावा॑ने॒व य॒ज्ञः। तस्य॒ शिर॑: प्रति॒दधा॑ति^(७)। ^(८)नो॒क्थ्ये॑ प्रवृ॑ञ्ज्यात्। प्र॒जा वै प॒शव॑ उ॒क्थानि॑। यदु॒क्थ्ये॑ प्रवृ॒ञ्ज्यात्। प्र॒जां प॒शून॑स्य॒ निर्द॑हेत्^(८)। ^(९)विश्व॒जिति॑ सर्वपृ॒ष्ठे प्रवृ॑णक्ति ॥ ३ ॥
पृ॒ष्ठानि॒ वा अ॒च्यु॒तं च्या॑वयन्ति। पृ॒ष्ठैरे॒वास्मा॒ अच्यु॑तं॒ च्याव॑यि॒त्वाऽव॑रुन्द्धे^(९)। ^(१०)अप॑श्यं गो॒पामित्या॑-
| ३ | एतन्मन्त्रस्य भाष्यं ४४१ पृष्ठे द्रष्टव्यं । |
|---|---|
| ४ | ,, ४४१ ,, |
| ५ | ,, ४४१ ,, |
| ६ | ,, ४४२ ,, |
| ७ | ,, ४४२ ,, |
| ८ | ,, ४४३ ,, |
| ९ | ,, ४४३ ,, |
| १० | ,, ४४३ ,, |