तैत्तिरीय आरण्यक (कृष्ण यजुर्वेद - सायणभाष्य व हिन्दी अनुवाद)
Taittiriya Aranyaka Hindi
महर्षि वैशम्पायन द्वारा
स्रोत: Taittiriya Aranyaka with Sayana Bhashya and Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 641, कुल 940 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ तैत्तिरीये आरण्यके
(६२)रु॒द्राय॑ रु॒द्रहो॑त्रे॒ स्वाहेत्या॑ह। रु॒द्रमे॒व भा॑गधेये॑न सम॑र्धयति(६२)। (६३)सर्व॑तः॒ समन॑क्ति। सर्व॑त एव रु॒द्रं निर॑वदयते(६३)। (६४)उद॑ञ्चं॒ निर॑स्यति। ए॒षा वै रु॒द्रस्य॒ दिक्। स्वाया॑मेव॒ दिशि॑ रु॒द्रं निर॑वदयते(६४)। (६५)अप॒ उप॑स्पृशति मेध्य॒त्वाय॑(६५)। (६६)नान्वी॑क्षेत। यद॒न्वीक्षेत॥ ६॥
चक्षु॑रस्य प्रमायु॑कः स्यात्। तस्मा॒न्नान्वीक्ष्यः॑(६६)। (६७)अपो॑परो माहो रात्रियै मा पाह्येषा ते अग्ने समि॒त्तया समि॑ध्यस्वाऽऽयु॑र्मे दा वर्च॑सा माञ्जीरित्या॑ह। आयु॑रे॒वास्मिन् वर्चो॑ दधाति। अपो॑परो मा रात्रिया अह्नो मा पाह्येषा ते अग्ने समि॒त्तया समि॑ध्यस्वाऽऽयु॑र्मे दा वर्च॑सा माञ्जीरित्या॑ह। आयु॑रे॒वास्मिन् वर्चो॑ दधाति(६७)। (६८)अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहा॒ सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योतिः॒ सूर्यः॒ स्वाहेत्या॑ह। यथा॒ यजु॑रे॒वैतत्(६८)।
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