भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 261 में से

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पृष्ठ 123

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७ परिच्छेदोऽस्ति । न तु काल- | परिच्छेद नहीं है । किन्तु कालसे तश्चानन्त्यं वस्तुतश्चाकाशस्य । | और वस्तुसे आकाशकी अनन्तता कस्मात्कार्यत्वात् । नैवं ब्रह्मण | नहीं है । क्यों नहीं है ? क्योंकि वह आकाशवत्कालतोऽप्यन्तवत्त्वम- | कार्य है । किन्तु आकाशके समान कार्यत्वात् । कार्यं हि वस्तु | किसीका कार्य न होनेके कारण कालेन परिच्छिद्यते । अकार्यं | ब्रह्मका इस प्रकार कालसे भी च ब्रह्म । तस्मात्कालतोऽस्यानन्त्यम् । | अन्तवत्त्व नहीं है । जो वस्तु किसी- | का कार्य होती है वही कालसे | परिच्छिन्न होती है । और ब्रह्म | किसीका कार्य नहीं है, इसलिये | उसकी कालसे अनन्तता है । तथा वस्तुतः । कथं पुनर्वस्तुत | इसी प्रकार वह वस्तुसे भी आनन्त्यं सर्वानन्यत्वात् । भिन्नं हि | अनन्त है । वस्तुसे उसकी अनन्तता वस्तु वस्त्वन्तरस्यान्तो भवति, | किस प्रकार है ? क्योंकि वह सबसे वस्त्वन्तरबुद्धिर्हि प्रसक्ताद्वस्त्व- | अभिन्न है । भिन्न वस्तु ही किसी न्तरान्निवर्तते । यतो यस्य बुद्धे- | अन्य भिन्न वस्तुका अन्त हुआ र्विनिवृत्तिः स तस्यान्तः । तद्यथा | करती है; क्योंकि किसी भिन्न वस्तुमें गोत्वबुद्धिरश्वत्वाद्विनिवर्तत इति | गयी हुई बुद्धि ही किसी अन्य प्रसक्त अश्वत्वान्तं गोत्वमित्यन्तवदेव | वस्तुसे निवृत्त की जाती है । जिस भवति । स चान्तो भिन्नोषु वस्तुषु | [ पदार्थसम्बन्धिनी ] बुद्धिकी जिस दृष्टः । नैवं ब्रह्मणो भेदः । अतो | पदार्थसे निवृत्ति होती है वही उस वस्तुतोऽप्यानन्त्यम् । | पदार्थका अन्त है । जिस प्रकार | गोत्वबुद्धि अश्वत्वबुद्धिसे निवृत्त होती | है, अतः गोत्वका अन्त अश्वत्व हुआ, | इसलिये वह अन्तवान् ही है और | उसका वह अन्त भिन्न पदार्थोंमें ही | देखा जाता है । किन्तु ब्रह्मका ऐसा | कोई भेद नहीं है । अतः वस्तुसे | भी उसकी अनन्तता है ।

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