तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें११८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]
कथं पुनः सर्वानन्यत्वं ब्रह्मण [ब्रह्मणः सर्वात्म्यं निरूप्यते] इत्युच्यते—सर्व- वस्तुकारणत्वात् । सर्वेषां हि वस्तूनां कालाकाशा- दीनां कारणं ब्रह्म । कार्यापेक्षया वस्तुतोऽन्तवत्त्वमिति चेन्न; अनृतत्वात्कार्यवस्तुनः । न हि कारणव्यतिरेकेण कार्यं नाम वस्तुतोऽस्ति यतः कारणबुद्धि- र्विनिवर्तेत । “वाचारम्भणं वि- कारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) एवं सदेव सत्यमिति श्रुत्य- न्तरात् । तस्मादाकाशादिकारणत्वाद्दे- शतस्तावदनन्तं ब्रह्म । आकाशो ह्यनन्त इति प्रसिद्धं देशतः, तस्येदं कारणं तस्मात्सिद्धं देशत आत्मन आनन्त्यम् । न ह्यसर्व- गतात्सर्वगतमुत्पद्यमानं लोके किंचिद् दृश्यते । अतो निरति- शयमात्मन आनन्त्यं देशतस्तथा-
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]
किन्तु ब्रह्मकी सबसे अभिन्नता किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं— क्योंकि वह सम्पूर्ण वस्तुओंका कारण है—ब्रह्म काल-आकाश आदि सभी वस्तुओंका कारण है । यदि कहो कि अपने कार्यकी अपेक्षासे तो उसका वस्तुसे अन्तवत्त्व हो ही जायगा, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कार्यरूप वस्तु तो मिथ्या है—वस्तुतः कारणसे भिन्न कार्य है ही नहीं जिससे कि कारणबुद्धिकी निवृत्ति हो “वाणीसे आरम्भ होनेवाला विकार केवल नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है” इसी प्रकार “सत् ही सत्य है”—ऐसा एक अन्य श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । अतः आकाशादिका कारण होनेसे ब्रह्म देशसे भी अनन्त है । आकाश देशतः अनन्त है—यह तो प्रसिद्ध ही है, और यह उसका कारण है; अतः आत्माका देशतः अनन्तत्व सिद्ध ही है; क्योंकि लोकमें असर्वगत वस्तुसे कोई सर्वगत वस्तु उत्पन्न होती नहीं देखी जाती । इसलिये आत्माका देशतः अनन्तत्व निरतिशय है [ अर्थात् उससे बड़ा और कोई नहीं है ] । इसी प्रकार
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