तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९ ══════════════════════════════════════════════════════════════════════ कार्यत्वात्कालतः, तद्भिन्नवस्त्व- | किसीका कार्य न होनेके कारण वह | कालतः और उससे भिन्न पदार्थका न्तराभावाच्च वस्तुतः । अत एव | सर्वथा अभाव होनेके कारण वस्तुतः | भी अनन्त है । इसलिये आत्माका निरतिशयसत्यत्वम् । | सबसे बढ़कर सत्यत्व है । * | तस्मादिति मूलवाक्यसूत्रितं | [ मन्त्रमें ] 'तस्मात्' ( उससे ) ब्रह्म परामृश्यते । | इस पदद्वारा मूलवाक्यमेंसे सूत्र- सृष्टिक्रमः | रूपसे कहे हुए 'ब्रह्म' पदका एतस्मादितिमन्त्र- | परामर्श किया जाता है । तथा इसके | अनन्तर 'एतस्मात्' इत्यादि मन्त्र- वाक्येनानन्तरं यथालक्षितम् । | वाक्यसे भी पूर्वनिर्दिष्ट ब्रह्मका ही | उल्लेख किया गया है । [ तात्पर्य यह यद्ब्रह्मादौ ब्राह्मणवाक्येन सूत्रितं | है— ] जिस ब्रह्मका पहले ब्राह्मण- | वाक्यद्वारा सूत्ररूपसे उल्लेख किया यच्च सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेत्य- | गया है और जो उसके पश्चात् | 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस प्रकार नन्तरमेव लक्षितं तस्मादेतस्मा- | लक्षित किया गया है उस इस ब्रह्म | —आत्मासे, अर्थात् 'आत्मा' शब्द- द्व्रह्मण आत्मन आत्म- | वाच्य ब्रह्मसे—क्योंकि “तत् सत्यं स | आत्मा” इत्यादि एक अन्य श्रुतिके शब्दवाच्यात् । आत्मा हि | अनुसार वह सबका आत्मा है; अतः तत्सर्वस्य “तत्सत्यं स आत्मा” | यहाँ ब्रह्म ही आत्मा है—उस इस ( छा० उ० ६ । ८–१६ ) इति | आत्मस्वरूप ब्रह्मसे आकाश संभूत— श्रुत्यन्तरादतो ब्रह्मात्मा । तस्मा- | उत्पन्न हुआ । देतस्माद्ब्रह्मण आत्मस्वरूपादाका- | शः संभूतः समुत्पन्नः । | आकाशो नाम शब्दगुणोऽव- | जो शब्द-गुणवाला और समस्त | मूर्त्त पदार्थोंको अवकाश देनेवाला है काशकरो मूर्तद्रव्याणाम् । तस्माद् | उसे 'आकाश' कहते हैं । उस ──────────────────────────────────────────────────────────────────────
- क्योंकि जो वस्तु अनन्त होती है वही सत्य होती है, परिच्छिन्न पदार्थ कभी सत्य नहीं हो सकता । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri