भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

१२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ आकाशात्स्वेन स्पर्शगुणेन पूर्वेण | आकाशसे अपने गुण 'स्पर्श' और च कारणगुणेन शब्देन द्विगुणो | अपने पूर्ववर्ती आकाशके गुण वायुः संभूत इत्यनुवर्तते । | 'शब्द' से युक्त दो गुणवाला वायु वायोश्च स्वेन रूपगुणेन पूर्वाभ्यां | उत्पन्न हुआ । यहाँ प्रथम वाक्यके च त्रिगुणोऽग्निः संभूतः । अग्नेः | 'सम्भूतः' ( उत्पन्न हुआ ) इस स्वेन रसगुणेन पूर्वैश्च त्रिभिश्चतु- | क्रिया पदकी [ सर्वत्र ] अनुवृत्ति की र्गुणा आपः संभूताः । अद्भ्यः | जाती है । वायुसे अपने गुण 'रूप' स्वेन गन्धगुणेन पूर्वैश्चतुर्भिः | और पहले दो गुणोंके सहित तीन पञ्चगुणा पृथिवी संभूता । पृथि- | गुणवाला अग्नि उत्पन्न हुआ । तथा व्या ओषधयः । ओषधीभ्यो- | अग्निसे अपने गुण 'रस' और ऽन्नम् । अन्नाद्रेतोरूपेण परिणतात् | पहले तीन गुणोंके सहित चार पुरुषः शिरःपाण्याद्याकृतिमान् । | गुणवाला जल हुआ । और जलसे स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयो- | अपने गुण 'गन्ध' और पहले चार ऽन्नरसविकारः । पुरुषाकृति- | गुणोंके सहित पाँच गुणवाली पृथिवी भावितं हि सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः | उत्पन्न हुई । पृथिवीसे ओषधियाँ, संभूतं रेतो बीजम्; तस्माद्यो | ओषधियोंसे अन्न और वीर्यरूपमें जायते सोऽपि तथा पुरुषाकृतिरेव | परिणत हुए अन्नसे शिर तथा हाथ- स्यात् । सर्वजातिषु जायमानानां | पाँवरूप आकृतिवाला पुरुष उत्पन्न | हुआ । | वह यह पुरुष अन्नरसमय अर्थात् | अन्न और रसका विकार है । | पुरुषाकारसे भावित [ अर्थात् पुरुष- | के आकारकी वासनासे युक्त ] तथा | उसके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न हुआ | तेजोरूप जो शुक्र है वह उसका | बीज है । उससे जो उत्पन्न होता | है वह भी उसीके समान पुरुषाकार | ही होता है; क्योंकि सभी जातियोंमें | उत्पन्न होनेवाले देहोंमें पिताके


CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri