भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 261 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 132

१२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ कारणमन्नमतोऽन्नप्रभवा अन्न- | इसलिये सम्पूर्ण प्रजा अन्नसे उत्पन्न होनेवाली, अन्नके द्वारा जीवित रहनेवाली और अन्नमें ही लीन हो जानेवाली है । क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये अन्न सर्वौषध—सम्पूर्ण प्राणियोंके देहके सन्तापको शान्त करनेवाला कहा जाता है । जीवना अन्नप्रलयाश्च सर्वाः प्रजाः। यस्माच्चैवं तस्मात्सर्वौषधं सर्व- प्राणिनां देहदाहप्रशमनमन्न- मुच्यते । अन्नब्रह्मविदः फलमुच्यते— | अन्नरूप ब्रह्मकी उपासना करनेवालेका [ प्राप्तव्य ] फल बतलाया जाता है—वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्न-समूहको प्राप्त कर लेते हैं । कौन ? जो उपर्युक्त अन्नकी ही ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं । किस प्रकार [ उपासना करते हैं ] ? इस तरह कि मैं अन्नसे उत्पन्न, अन्नस्वरूप और अन्नमें ही लीन हो जानेवाला हूँ; इसलिये अन्न ब्रह्म है । सर्वं वै ते समस्तमन्नजात- माप्नुवन्ति । के ? येऽन्नं ब्रह्म यथोक्तमुपासते । कथम् ? अन्नजो- ऽन्नात्मान्नप्रलयोऽहं तस्मादन्नं ब्रह्मेति । कुतः पुनः सर्वान्नप्राप्तिफल- | 'अन्न ही आत्मा है' इस प्रकारकी उपासना किस प्रकार सम्पूर्ण अन्नकी प्राप्तिरूप फलवाली है, सो बतलाते हैं—अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ है—प्राणियोंसे पहले उत्पन्न होनेके कारण, क्योंकि वह उनसे ज्येष्ठ है इसलिये वह सर्वौषध कहा जाता है। अतः सम्पूर्ण अन्नकी आत्मारूपसे उपासना करनेवालेके लिये सम्पूर्ण अन्नकी प्राप्ति उचित ही है। अन्नसे प्राणी उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न मन्नात्मोपासनमित्युच्यते । अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् । भूतेभ्यः पूर्वं निष्पन्नत्वाज्ज्येष्ठं हि यस्मा- त्तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । तस्मादुप- पन्ना सर्वान्नात्मोपासकस्य सर्वा- न्नप्राप्तिः। अन्नाद्भूतानि जायन्ते ।

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 132, कुल 261 में से · BharatKosha