भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७

संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
जातान्यन्नेन वर्धन्त इत्युपसंहा-होनेपर अन्नसे ही वृद्धिको प्राप्त होते
रार्थं पुनर्वचनम् ।हैं—यह पुनरुक्ति उपासनाके
उपसंहारके लिये है ।
इदानीमन्ननिर्वचनमुच्यते—अब 'अन्न' शब्दकी व्युत्पत्ति
(अन्नशब्द-निर्वचनम्) अद्यते भुज्यते चैव यद्भूतैरन्नमत्ति चकही जाती है—जो प्राणियोंद्वारा 'अद्यते'— खाया जाता है और जो स्वयं भी प्राणियोंको 'अत्ति' खाता
भूतानि स्वयं तस्माद्भूतैर्भु-है, इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंका भोज्य
और उनका भोक्ता होनेके कारण
ज्यमानत्वाद्भूतभोक्तृत्वाच्चान्नंभी वह 'अन्न' कहा जाता है ।
तदुच्यते । इतिशब्दः प्रथमकोश-इस वाक्यमें 'इति' शब्द प्रथम
कोशके विवरणकी परिसमाप्तिके
परिसमाप्त्यर्थः ।लिये है ।
अन्नमयादिभ्य आनन्दमया-अनेक तुषाओंवाले धानोंको
तुषरहित करके जिस प्रकार चावल
(अन्नमयकोश-निरासः) न्तेभ्य आत्मभ्योऽभ्यन्तरतमं ब्रह्मनिकाल लिये जाते हैं उसी प्रकार अन्नमयसे लेकर आनन्दमय कोश-
विद्यया प्रत्यगात्मत्वेन दिदर्श-पर्यन्त सम्पूर्ण शरीरोंकी अपेक्षा
आन्तरतम ब्रह्मको विद्याके द्वारा अपने
यिषुः शास्त्रमविद्याकृतपञ्चकोशा-प्रत्यगात्मरूपसे दिखलानेकी इच्छा-
पनयेनानेकतुषकोद्रववितुषी-वाला शास्त्र अविद्याकल्पित पाँच
करणेनेव तदन्तर्गततण्डुलान्कोशोंका बाध करता हुआ 'तस्माद्वा
प्रस्तौति तस्माद्वा एतस्मादन्नरस-एतस्मादन्नरसमयात्' इत्यादि वाक्य-
मयादित्यादि ।से आरम्भ करता है—
तस्मादेतस्माद्यथोक्तादन्नरस-उस इस पूर्वोक्त अन्नरसमय
पिण्डसे अन्य यानी पृथक् और
(प्राणमयकोश-निर्वचनम्) मयात्पिण्डादन्यो व्यतिरिक्तोऽन्तरो-उसके भीतर रहनेवाला आत्मा, जो अन्नरसमय पिण्डके समान मिथ्या
ऽभ्यन्तर आत्मा पिण्डवदेव मिथ्याही आत्मारूपसे कल्पना किया हुआ

CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri