भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 261 में से

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१३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


[बायाँ स्तम्भ (मूल संस्कृत)]

अक्षरविषयस्मृत्यावृत्त्या मन्त्रावृत्तिः स्यादिति चेत् ? न; मुख्यार्थासंभवात् । "त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम्" इति ऋगावृत्तिः श्रूयते । तत्रर्चो- ऽविषयत्वे तद्विषयस्मृत्यावृत्त्या मन्त्रावृत्तौ च क्रियमाणायाम् "त्रिः प्रथमामन्वाह" इति ऋगा- वृत्तिर्मुख्योऽर्थश्चोदितः परित्यक्तः स्यात् । तस्मान्मनोवृत्त्युपाधि- परिच्छिन्नं मनोवृत्तिनिष्ठमात्म- चैतन्यमनादिनिधनं यजुःशब्द- वाच्यमात्मविज्ञानं मन्त्रा इति । एवं च नित्यत्वोपपत्तिर्वेदानाम् । अन्यथा विषयत्वे रूपादि- वदनित्यत्वं च स्यान्नैतद्यु- क्तम् । "सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति


[दायाँ स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद)]

शङ्का-मन्त्रके अक्षरोंको विषय करनेवाली स्मृतिकी आवृत्ति होनेसे मन्त्रकी भी आवृत्ति हो सकती है— यदि ऐसा मानें तो ? समाधान—नहीं; क्योंकि [ ऐसा माननेसे जपका विधान करनेवाली श्रुतिका ] मुख्य अर्थ असम्भव हो जायगा । "तीन बार प्रथम ऋक् की आवृत्ति करनी चाहिये और तीन बार अन्तिम ऋक् का अन्वाख्यान ( आवर्तन ) करे" इस प्रकार ऋक् की आवृत्तिके विषयमें श्रुतिकी आज्ञा है । ऐसी अवस्थामें मन्त्रमय ऋक् तो मनका विषय नहीं है, अतः मन्त्रकी आवृत्तिके स्थानमें यदि केवल उसकी स्मृतिका ही आवर्तन किया जाय तो "तीन बार प्रथम ऋक् की आवृत्ति करनी चाहिये" इस श्रुतिका मुख्य अर्थ छूट जाता है । अतः यह समझना चाहिये कि मनोवृत्तिरूप उपाधिसे परिच्छिन्न मनोवृत्तिस्थित जो अनादि-अनन्त आत्मचैतन्य 'यजुः' शब्दवाच्य आत्मविज्ञान है वह यजुर्मन्त्र है । इसी प्रकार वेदोंकी नित्यता भी सिद्ध हो सकती है; नहीं तो इन्द्रियोंके विषय होने- पर तो रूपादिके समान उनकी भी अनित्यता ही सिद्ध होगी; और ऐसा होना ठीक नहीं है । "जिसमें समस्त

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