भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७

स मानसीन आत्मा" इति च | वेद एकरूप हो जाते हैं वह मनरूप श्रुतिर्नित्यात्मनैकत्वं ब्रुवत्यृगा- | उपाधिमें स्थित आत्मा है" यह नित्य दीनां नित्यत्वे समञ्जसा स्यात् । | आत्माके साथ ऋगादिका एकत्व बतलानेवाली श्रुति भी उनका "ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्य- | नित्यत्व सिद्ध होनेपर ही सार्थक हो सकती है । इस सम्बन्धमें स्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः" | "जिसमें सम्पूर्ण देव स्थित हैं उस अक्षर और परब्रह्मरूप आकाशमें ( श्वे० उ० ४ । ८ ) इति च | ही ऋचाएँ तादात्म्यभावसे व्यवस्थित मन्त्रवर्णः । | हैं" ऐसा मन्त्रवर्ण भी है । आदेशोऽत्र ब्राह्मणम्; अति- | 'आदेश आत्मा' इस वाक्यमें 'आदेश' शब्द ब्राह्मणका वाचक देष्टव्यविशेषानतिदिशतीति। अथ- | है; क्योंकि वेदोंका ब्राह्मणभाग ही कर्त्तव्यविशेषोंका आदेश ( उपदेश ) र्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा ब्राह्मणं | देता है । अथर्वाङ्गिरस ऋषिके साक्षात्कार किये हुए मन्त्र और च शान्तिकपौष्टिकादिप्रतिष्ठा- | ब्राह्मण ही पुच्छ—प्रतिष्ठा हैं; क्योंकि उनमें शान्ति और पुष्टिकी स्थितिके हेतुर्मप्रधानत्वात्पुच्छं प्रतिष्ठा । | हेतुभूत कर्मोंकी प्रधानता है । तदप्येष श्लोको भवति मनो- | पूर्ववत् इस विषयमें ही—मनोमय आत्माका प्रकाश करनेवाला ही मयात्मप्रकाशकः पूर्ववत् ॥१॥ | यह श्लोक है ॥ १ ॥


इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां तृतीयोऽनुवाकः ॥३॥