तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३९
शरीरे प्राणमये भवः शारीरः । | अर्थात् प्राणमय शरीरमें रहनेवाला कः ? य एष मनोमयः । तस्माद्वा | आत्मा है । कौन ? यह जो मनोमय एतस्मादित्यादि पूर्ववत् । अ- | है । 'तस्माद्वा एतस्मात्' इत्यादि न्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयो | वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । उस इस मनोमयसे दूसरा मनोमयस्याभ्यन्तरो विज्ञानमयः । | इसका अन्तर आत्मा विज्ञानमय है अर्थात् मनोमय कोशके भीतर विज्ञानमय कोश है । मनोमयो वेदात्मोक्तः । वे- | मनोमय कोश वेदरूप बतलाया दार्थविषया बुद्धिनिश्चयात्मिका | गया था । वेदोंके अर्थके विषयमें जो निश्चयात्मिका बुद्धि है उसीका विज्ञानं तच्चाध्यवसायलक्षणम- | नाम विज्ञान है । और वह अन्तः- न्तःकरणस्य धर्मः । तन्मयो | करणका अध्यवसायरूप धर्म है । तन्मय अर्थात् प्रमाणस्वरूप निश्चय निश्चयविज्ञानैः प्रमाणस्वरूपैर्नि- | विज्ञानसे (निश्चयात्मिका बुद्धिसे) र्वर्तित आत्मा विज्ञानमयः । | निष्पन्न होनेवाला आत्मा विज्ञानमय है, क्योंकि प्रमाणके विज्ञानपूर्वक प्रमाणविज्ञानपूर्वको हि यज्ञादि- | ही यज्ञादिका विस्तार किया जाता स्तायते । यज्ञादिहेतुत्वं च | है । विज्ञान यज्ञादिका हेतु है- यह बात श्रुति आगे चलकर मन्त्र- वक्ष्यति श्लोकेन । | द्वारा बतलायेगी । निश्चयविज्ञानवतो हि कर्तव्ये- | निश्चयात्मिका बुद्धिसम्पन्न पुरुष- ष्वर्थेषु पूर्वं श्रद्धोत्पद्यते । सा | को सबसे पहले कर्त्तव्य कर्ममें श्रद्धा ही उत्पन्न होती है । अतः सम्पूर्ण सर्वकर्त्तव्यानां प्राथम्याच्छिर इव | कर्मोंमें प्रथम होनेके कारण वह शिरके समान उस विज्ञानमयका शिरः । ऋतसत्ये यथाव्या- | शिर है । ऋत और सत्यका अर्थ पहले (शिक्षावल्ली, नवम अनुवाकमें) ख्याते एव । योगो युक्तिः | की हुई व्याख्याके ही समान है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri