तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत भाष्य] समाधानम्, आत्मेवात्मा । आत्मवतो हि युक्तस्य समाधान- वतोऽङ्गानीव श्रद्धादीनि यथार्थ- प्रतिपत्चिक्षमाणि भवन्ति । तस्मात्समाधानं योग आत्मा विज्ञानमयस्य । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । मह इति महत्तत्त्वं प्रथमजम् । "महद्यक्षं प्रथमजं वेद" (बृ० उ० ५।४।१) इति श्रुत्यन्तरात् । पुच्छं प्रतिष्ठा कारणत्वात् । कारणं हि कार्याणां प्रतिष्ठा । यथा वृक्षवीरुधां पृथिवी । सर्व- बुद्धिविज्ञानानां च महत्तत्त्वं कारणम् । तेन तद्विज्ञानमयस्या- त्मनः प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति पूर्ववत् । यथान्नमयादी- नां ब्राह्मणोक्तानां प्रकाशकाः श्लोका एवं विज्ञानमयस्यापि ॥१॥
[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद] योग-युक्ति अर्थात् समाधान ही आत्माके समान उसका आत्मा है । युक्त अर्थात् समाधानसम्पन्न आत्मवान् पुरुषके ही अङ्गादिके समान श्रद्धा आदि साधन यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिमें समर्थ होते हैं । अतः समाधान यानी योग ही विज्ञानमय कोशका आत्मा है और महः उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है । "प्रथम उत्पन्न हुए महान् यक्ष (पूजनीय) को जानता है" इस एक अन्य श्रुतिके अनुसार 'महः' यह महत्तत्त्वका नाम है । वही [ विज्ञानमयका ] कारण होनेसे उसकी पुच्छ—प्रतिष्ठा है; क्योंकि कारण ही कार्यवर्गकी प्रतिष्ठा (आश्रय) हुआ करता है, जैसे कि वृक्ष और लता-गुल्मादिकी प्रतिष्ठा पृथिवी है। महत्तत्त्व ही बुद्धिके सम्पूर्ण विज्ञानोंका कारण है । इसलिये वह विज्ञानमय आत्माकी प्रतिष्ठा है । पूर्ववत् उसके विषयमें ही यह श्लोक है अर्थात् जैसे पहले श्लोक ब्राह्मणोक्त अन्नमय आदिके प्रकाशक हैं उसी प्रकार यह विज्ञानमयका भी प्रकाशक श्लोक है ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥