तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम अनुवाक विज्ञानकी महिमा तथा आनन्दमय कोशका वर्णन विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान्समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥१॥ विज्ञान (विज्ञानवान् पुरुष) यज्ञका विस्तार करता है और वही कर्मोंका भी विस्तार करता है। सम्पूर्ण देव ज्येष्ठ विज्ञान-ब्रह्मकी उपासना करते हैं। यदि साधक 'विज्ञान ब्रह्म है' ऐसा जान जाय और फिर उससे प्रमाद न करे तो अपने शरीरके सारे पापोंको त्यागकर वह समस्त कामनाओं (भोगों) को पूर्णतया प्राप्त कर लेता है। यह जो विज्ञानमय है वही उस अपने पूर्ववर्ती मनोमय शरीरका आत्मा है। उस इस विज्ञानमयसे दूसरा इसका अन्तर्वर्ती आत्मा आनन्दमय है। उस आनन्दमयके द्वारा यह पूर्ण है। वह यह आनन्दमय भी पुरुषाकार ही है। उस (विज्ञानमय) की पुरुषाकारताके समान ही यह पुरुषाकार है। उसका प्रिय ही शिर है, मोद दक्षिण पक्ष है, प्रमोद उत्तर पक्ष है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म पुच्छ-प्रतिष्ठा है। उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri