भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विज्ञानं यज्ञं तनुते । विज्ञान- | विज्ञान यज्ञका विस्तार करता विज्ञानमयो- वान्हि यज्ञं तनोति | है अर्थात् विज्ञानवान् पुरुष ही पासनम् श्रद्धादिपूर्वकम् । | श्रद्धादिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करता अतो विज्ञानस्य कर्तृत्वं तनुत | है। अतः यज्ञानुष्ठानमें विज्ञानका कर्तृत्व है और तनुते—इसका भाव इति कर्माणि च तनुते । यस्मा- | यह है कि वही कर्मोंका भी द्विज्ञानकर्तृकं सर्वं तस्माद्युक्तं | विस्तार करता है। इस प्रकार क्योंकि सब कुछ विज्ञानका ही विज्ञानमय आत्मा ब्रह्मेति । | किया हुआ है इसलिये 'विज्ञानमय आत्मा ब्रह्म है' ऐसा कहना ठीक किं च विज्ञानं ब्रह्म सर्वे देवा | ही है। यही नहीं, इन्द्रादि सम्पूर्ण इन्द्रादयो ज्येष्ठं प्रथमजत्वात्सर्व- | देवगण विज्ञानब्रह्मकी, जो सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला होनेसे प्रवृत्तीनां वा तत्पूर्वकत्वात्प्रथमजं | ज्येष्ठ है अथवा समस्त वृत्तियाँ विज्ञानपूर्वक होनेके कारण जो विज्ञानं ब्रह्मोपासते ध्यायन्ति | प्रथमोत्पन्न है, उस विज्ञानरूप ब्रह्मकी तस्मिन्विज्ञानमये ब्रह्मण्यभि- | उपासना अर्थात् ध्यान करते हैं। तात्पर्य यह है कि वे उस विज्ञानमय मानं कृत्वोपासत इत्यर्थः । | ब्रह्ममें अभिमान करके उसकी .उपासना करते हैं। अतः वे उस तस्मात्ते महतो ब्रह्मण उपा- | महद्ब्रह्मकी उपासना करनेसे ज्ञान सनाज्ज्ञानैश्वर्यवन्तो भवन्ति । | और ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं। तच्च विज्ञानं ब्रह्म चेद्यदि वेद | उस विज्ञानरूप ब्रह्मको यदि विजानाति न केवलं वेदैव तस्मा- | जान ले—केवल जान ही न ले बल्कि द्ब्रह्मणश्चेन्न प्रमाद्यति बाह्येष्वेवा- | यदि उससे प्रमाद भी न करे; बाह्य अनात्म पदार्थोंमें आत्मबुद्धि की नात्मस्वात्मभावितत्वात्प्राप्तं वि- | हुई है, उसके कारण विज्ञानमय ज्ञानमये ब्रह्मण्यात्मभावनायाः | ब्रह्ममें की हुई आत्मभावनासे प्रमाद

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