तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 153, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७ मयो विज्ञानमयाश्रितः स्वप्न उप- | हुआ यह आनन्दमय स्वप्नावस्थामें लभ्यते । | विज्ञानमयके अधीन ही उपलब्ध होता है । तस्यानन्दमयस्यात्मन इष्ट- | उस आनन्दमय आत्माका पुत्रादि [आनन्दमयस्य पुरुषविधत्वम्] पुत्रादिदर्शनजं प्रियं | इष्ट पदार्थोंके दर्शनसे होनेवाला शिर इव शिरः | प्रिय ही प्रधानताके कारण शिरके प्राधान्यात् । मोद इति प्रिय- | समान शिर है । प्रिय पदार्थकी लाभनिमित्तो हर्षः । स एव च | प्राप्तिसे होनेवाला हर्ष 'मोद' प्रकृष्टो हर्षः प्रमोदः । आनन्द | कहलाता है; वही हर्ष प्रकृष्ट इति सुखसामान्यमात्मा प्रिया- | ( अतिशय) होनेपर 'प्रमोद' कहा दीनां सुखावयवानाम् । तेष्वनु- | जाता है । 'आनन्द' सामान्य स्यूतत्त्वात् । | सुखका नाम है; वह सुखके अवयवभूत प्रिय आदिका आत्मा है; क्योंकि उसीमें वे सब अनुस्यूत हैं । आनन्द इति परं ब्रह्म । तद्धि | 'आनन्द' यह परब्रह्मका ही शुभकर्मणा प्रत्युपस्थाप्यमाने | वाचक है । वही शुभकर्मद्वारा पुत्रमित्रादिविषयविशेषोपाधाव- | प्रस्तुत किये हुए पुत्र-मित्रादि विशेष न्तःकरणवृत्तिविशेषे तमसा प्र- | विषय ही जिसकी उपाधि हैं उस च्छाद्यमाने प्रसन्नेऽभिव्यज्यते । | सुप्रसन्न अन्तःकरणकी वृत्तिविशेष- तद्विषयसुखमिति प्रसिद्धं लोके । | में, जब कि वह तमोगुणसे आच्छादित तद्वृत्तिविशेषप्रत्युपस्थापकस्य क- | नहीं होता, अभिव्यक्त होता है । र्मणोऽनवस्थितत्वात्सुखस्य क्षणि- | वह लोकमें विषय-सुख नामसे प्रसिद्ध कत्वम् । तद्यदान्तःकरणं तपसा | है । उस वृत्तिविशेषको प्रस्तुत करनेवाले कर्मके अस्थिर होनेके तमोघ्नेन विद्यया ब्रह्मचर्येण श्रद्धया | कारण उस सुखकी भी क्षणिकता है। अतः जिस समय अन्तःकरण तमोगुणको नष्ट करनेवाले तप, उपासना, ब्रह्मचर्य और श्रद्धाके द्वारा