तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७ मयो विज्ञानमयाश्रितः स्वप्न उप- | हुआ यह आनन्दमय स्वप्नावस्थामें लभ्यते । | विज्ञानमयके अधीन ही उपलब्ध होता है । तस्यानन्दमयस्यात्मन इष्ट- | उस आनन्दमय आत्माका पुत्रादि [आनन्दमयस्य पुरुषविधत्वम्] पुत्रादिदर्शनजं प्रियं | इष्ट पदार्थोंके दर्शनसे होनेवाला शिर इव शिरः | प्रिय ही प्रधानताके कारण शिरके प्राधान्यात् । मोद इति प्रिय- | समान शिर है । प्रिय पदार्थकी लाभनिमित्तो हर्षः । स एव च | प्राप्तिसे होनेवाला हर्ष 'मोद' प्रकृष्टो हर्षः प्रमोदः । आनन्द | कहलाता है; वही हर्ष प्रकृष्ट इति सुखसामान्यमात्मा प्रिया- | ( अतिशय) होनेपर 'प्रमोद' कहा दीनां सुखावयवानाम् । तेष्वनु- | जाता है । 'आनन्द' सामान्य स्यूतत्त्वात् । | सुखका नाम है; वह सुखके अवयवभूत प्रिय आदिका आत्मा है; क्योंकि उसीमें वे सब अनुस्यूत हैं । आनन्द इति परं ब्रह्म । तद्धि | 'आनन्द' यह परब्रह्मका ही शुभकर्मणा प्रत्युपस्थाप्यमाने | वाचक है । वही शुभकर्मद्वारा पुत्रमित्रादिविषयविशेषोपाधाव- | प्रस्तुत किये हुए पुत्र-मित्रादि विशेष न्तःकरणवृत्तिविशेषे तमसा प्र- | विषय ही जिसकी उपाधि हैं उस च्छाद्यमाने प्रसन्नेऽभिव्यज्यते । | सुप्रसन्न अन्तःकरणकी वृत्तिविशेष- तद्विषयसुखमिति प्रसिद्धं लोके । | में, जब कि वह तमोगुणसे आच्छादित तद्वृत्तिविशेषप्रत्युपस्थापकस्य क- | नहीं होता, अभिव्यक्त होता है । र्मणोऽनवस्थितत्वात्सुखस्य क्षणि- | वह लोकमें विषय-सुख नामसे प्रसिद्ध कत्वम् । तद्यदान्तःकरणं तपसा | है । उस वृत्तिविशेषको प्रस्तुत करनेवाले कर्मके अस्थिर होनेके तमोघ्नेन विद्यया ब्रह्मचर्येण श्रद्धया | कारण उस सुखकी भी क्षणिकता है। अतः जिस समय अन्तःकरण तमोगुणको नष्ट करनेवाले तप, उपासना, ब्रह्मचर्य और श्रद्धाके द्वारा
१४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ च निर्मलत्वमापद्यते यावद्याव- | जितना-जितना निर्मलताको प्राप्त त्तावत्तावद्विविक्ते प्रसन्नेऽन्तः- | होता है उतने-उतने ही स्वच्छ और करण आनन्दविशेष उत्कृष्यते | प्रसन्न हुए उस अन्तःकरणमें विशेष आनन्दका उत्कर्ष होता है अर्थात् विपुलीभवति । वक्ष्यति च— | वह बहुत बढ़ जाता है। यही बात "रसो वै सः । रसँह्येवायं | “वह रस ही है, इस रसको पाकर लब्ध्वानन्दी भवति । एष ह्येवान- | ही पुरुष आनन्दी हो जाता है। न्दयति” ( तै० उ० २ । ७ । | यह रस ही सबको आनन्दित करता है।” इस प्रकार आगे कहेंगे, १) “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि | तथा “इस आनन्दके अंशमात्रके भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” (बृ० | आश्रय ही सब प्राणी जीवित रहते उ० ४ । ३ । ३२) इति च | हैं” इस अन्य श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। इसी प्रकार काम- श्रुत्यन्तरात् । एवं च कामोप- | शान्तिके उत्कर्षकी अपेक्षा आगे- शमोत्कर्षापेक्षया शतगुणोत्तरो- | आगेके आनन्दका सौ-सौ गुना त्तरोत्कर्ष आनन्दस्य वक्ष्यते । | उत्कर्ष आगे बतलाया जायगा । एवं चोत्कृष्यमाणस्यानन्द- | इस प्रकार परमार्थ ब्रह्मके विज्ञान- मयस्यात्मनः परमार्थब्रह्मविज्ञाना- | की अपेक्षासे क्रमशः उत्कर्षको प्राप्त होनेवाले आनन्दमय आत्माकी पेक्षया ब्रह्म परमेव । यत्प्रकृतं | अपेक्षा ब्रह्म पर ही है। जो प्रकृत ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप है, सत्यज्ञानानन्तलक्षणम्, यस्य | जिसकी प्राप्तिके लिये अन्नमय आदि च प्रतिपत्त्यर्थं पञ्चान्नादिमयाः | पाँच कोशोंका उपन्यास किया गया कोशा उपन्यस्ताः, यच्च तेभ्य | है, जो उन सबकी अपेक्षा अन्तर्वर्ती है, और जिसके द्वारा वे सब आभ्यन्तरम्, येन च ते सर्व | आत्मवान् हैं—वह ब्रह्म ही उस आत्मवन्तः, तद्ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । | आनन्दमयकी पुच्छ-प्रतिष्ठा है।
अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९
तदेव च सर्वस्याविद्यापरि- अविद्याद्वारा कल्पना किये हुए कल्पितस्य द्वैतस्यावसानभूत- सम्पूर्ण द्वैतका निषेधावधिभूत वह मद्वैतं ब्रह्म प्रतिष्ठा आनन्द- अद्वैत ब्रह्म ही उसकी प्रतिष्ठा है; मयस्य । एकत्वावसानत्वात् । क्योंकि आनन्दमयका पर्यवसान भी अस्ति तदेकमविद्याकल्पितस्य एकत्वमें ही होता है । अविद्या- द्वैतस्यावसानभूतमद्वैतं ब्रह्म परिकल्पित द्वैतका अवसानभूत वह प्रतिष्ठा पुच्छम् । तदेतस्मिन्नप्यर्थ एक और अद्वितीय ब्रह्म उसकी प्रतिष्ठा यानी पुच्छ है । उस इसी एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ अर्थमें यह श्लोक है ॥ १ ॥ —••|ॐ|••— इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥
षष्ठ अनुवाक ब्रह्मको सत् और असत् जाननेवालोंका भेद, ब्रह्मज्ञ और अब्रह्मज्ञकी ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें शंका तथा सम्पूर्ण प्रपञ्चरूपसे ब्रह्मके स्थित होनेका निरूपण असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्नाः । उता- विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वा- नमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ । सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा इदꣳसर्वमसृजत यदिदं किंच । तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च विज्ञानं चावि- ज्ञानं च । सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किंच । तत्सत्यमित्याचक्षते । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ यदि पुरुष 'ब्रह्म असत् है' ऐसा जानता है तो वह स्वयं भी असत् ही हो जाता है । और यदि ऐसा जानता है कि 'ब्रह्म है' तो [ ब्रह्मवेत्ता- जन ] उसे सत् समझते हैं । उस पूर्वकथित ( विज्ञानमय ) का यह जो [ आनन्दमय ] है शरीर-स्थित आत्मा है । अब ( आचार्यका ऐसा उपदेश सुननेके अनन्तर शिष्यके ) ये अनुप्रश्न हैं—क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस शरीरको छोड़नेके अनन्तर परमात्माको प्राप्त हो सकता है ? अथवा कोई विद्वान् भी इस शरीरको छोड़नेके अनन्तर परमात्माको CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१ प्राप्त होता है या नहीं ? [ इन प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये आचार्य भूमिका बाँधते हैं— ] उस परमात्माने कामना की 'मैं बहुत हो जाऊँ अर्थात् मैं उत्पन्न हो जाऊँ ।' अतः उसने तप किया । उसने तप करके ही यह जो कुछ है इस सबकी रचना की । इसे रचकर वह इसीमें अनुप्रविष्ट हो गया । इसमें अनुप्रवेश कर वह सत्यस्वरूप परमात्मा मूर्त्त- अमूर्त्त, [ देशकालादि परिच्छिन्नरूपसे ] कहे जानेयोग्य और न कहे जानेयोग्य, आश्रय-अनाश्रय, चेतन-अचेतन एवं व्यावहारिक सत्य-असत्य- रूप हो गया । यह जो कुछ है उसे ब्रह्मवेत्ता लोग 'सत्य' इस नामसे पुकारते हैं । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥१॥
असन्नेवासत्सम एव यथा- | जिस प्रकार असत् ( अविद्यमान ) सन्न पुरुषार्थसंब- | पदार्थ पुरुषार्थसे सम्बन्ध रखनेवाला सदसद्वादिनोर्भेदः | नहीं होता उसी प्रकार वह भी न्ध्येवं स भवति | असत्—असत्के समान ही पुरुषार्थसे सम्बन्ध नहीं रखनेवाला अपुरुषार्थसंबन्धी । कोऽसौ ? | हो जाता है—वह कौन ? जो 'ब्रह्म असत्—अविद्यमान है' ऐसा योऽसदविद्यमानं ब्रह्मेति वेद | जानता है । 'चेत्' शब्दका अर्थ 'यदि' है । इसके विपरीत 'जो विजानाति चेद्यदि । तद्विपर्ययेण | तत्त्व सम्पूर्ण विकल्पोंका आश्रय, समस्त प्रवृत्तियोंका बीजरूप और यत्सर्वविकल्पास्पदं सर्वप्रवृत्ति- | सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित भी है वही ब्रह्म है' ऐसा यदि कोई जानता है बीजं सर्वविशेषप्रत्यस्तमितमप्य- | [ तो उसे ब्रह्मवेत्तालोग सद्रूप समझते हैं इस प्रकार इसका आगेके वाक्यसे स्ति तद्ब्रह्मेति वेद चेत् । | सम्बन्ध है ] । कुतः पुनराशङ्का तन्नास्तित्वे ? | किन्तु ब्रह्मके अस्तित्वाभावके विषयमें शंका क्यों की जाती है ? व्यवहारातीतत्वं ब्रह्मण इति | [ इसपर ] हमारा यह कथन है कि ब्रह्म व्यवहारसे परे है । [ इसी- ब्रूमः । व्यवहारविषये हि वाचा- | लिये ] व्यवहारके विषयभूत पदार्थों-
१५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[मूल संस्कृत (शाङ्करभाष्य)]
रम्भणमात्रेऽस्तित्वभाविता बुद्धि- स्तद्विपरीते व्यवहारातीते नास्ति- त्वमपि प्रतिपद्यते । यथा घटा- दिर्व्यवहारविषयतयोपपन्नः सं- स्तद्विपरीतोऽसन्निति प्रसिद्धम् । एवं तत्सामान्यादिहापि स्याद्ब्रह्म- णो नास्तित्वप्रत्याशङ्का । तस्मा- दुच्यते—अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेदेति ।
किं पुनः स्यात्तदस्तीति वि- जानतस्तदाह—सन्तं विद्यमान- ब्रह्मस्वरूपेण परमार्थसदात्मापन्न- मेनमेवंविदं विदुर्ब्रह्मविदस्तत- स्तस्मादस्तित्ववेदनात्सोऽन्येषां ब्रह्मवद्विज्ञेयो भवतीत्यर्थः ।
अथवा यो नास्ति ब्रह्मेति मन्यते स सर्वस्यैव सन्मार्गस्य वर्णाश्रमादिव्यवस्थालक्षणस्याश्र-
[हिन्दी अनुवाद]
में ही, जो कि केवल वाणीसे ही उच्चारण किये जानेवाले हैं, अस्तित्व- की भावनासे भावित हुई बुद्धि उनसे विपरीत व्यवहारातीत पदार्थों- में अस्तित्वका भी अनुभव नहीं करती; जैसे कि [ जल लाना आदि ] व्यवहारके विषयरूपसे उपपन्न हुआ घट आदि पदार्थ 'सत्' और उससे विपरीत [ वन्ध्यापुत्रादि ] 'असत्' होता है—इस प्रकार प्रसिद्ध है । उसी प्रकार उसकी समानताके कारण यहाँ भी ब्रह्मके अविद्यमानत्व- के विषयमें शंका हो सकती है । इसीलिये कहा है—'ब्रह्म है-ऐसा यदि कोई जानता है' इत्यादि ।
किन्तु ‘वह ( ब्रह्म ) है’ ऐसा जाननेवाले पुरुषको क्या फल मिलता है ? इसपर कहते हैं—ब्रह्मवेत्तालोग इस प्रकार जाननेवाले इस पुरुषको सत्—विद्यमान अर्थात् ब्रह्मरूपसे परमार्थ सत्स्वरूपको प्राप्त हुआ समझते हैं । तात्पर्य यह है कि इस कारणसे ब्रह्मके अस्तित्वको जाननेके कारण वह दूसरोंके लिये ब्रह्मके समान जाननेयोग्य हो जाता है ।
अथवा जो पुरुष ‘ब्रह्म नहीं है’ ऐसा मानता है वह अश्रद्धालु होनेके कारण, वर्णाश्रमादि व्यवस्था-रूप सारे ही शुभमार्गका,
अनु० ६] शाङ्करभाष्यार्थ १५३ दधानतया नास्तित्वं प्रतिपद्यते- | असत्त्व प्रतिपादन करता है; ऽब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थत्वात्तस्य । अतो | क्योंकि वह भी ब्रह्मकी प्राप्तिके ही नास्तिकः सोऽसन्नसाधुरुच्यते | लिये है । अतः वह नास्तिक लोकमें लोके । तद्विपरीतः सन्योऽस्ति | असत्-असाधु कहा जाता है । ब्रह्मेति चेद्वेद स तद्ब्रह्मप्रतिपत्ति- | इसके विपरीत जो पुरुष 'ब्रह्म है' हेतुं सन्मार्गं वर्णाश्रमादिव्यव- | ऐसा जानता है वह 'सत्' है; स्थालक्षणं श्रद्दधानतया यथा- | क्योंकि वह उस ब्रह्मकी प्राप्तिके वत्प्रतिपद्यते यस्मात्ततस्तस्मात् | हेतुभूत वर्णाश्रमादिके व्यवस्थारूप सन्तं साधुमार्गस्थमेनं विदुः | सन्मार्गको श्रद्धापूर्वक ठीक-ठीक साधवः तस्मादस्तीत्येव ब्रह्म | जानता है । इसीलिये साधुलोग उसे प्रतिपत्तव्यमिति वाक्यार्थः । | सत् यानी शुभ मार्गमें स्थित जानते तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष | हैं । अतः 'ब्रह्म है' ऐसा ही एव शरीरे विज्ञानमये भवः | जानना चाहिये—यह इस वाक्यका शारीर आत्मा । कोऽसौ ? य एष | अर्थ है । आनन्दमयः । तं प्रति नास्त्या- | उस विज्ञानमयका यही शारीर— शङ्का नास्तित्वे । अपोढसर्व- | विज्ञानमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा विशेषत्वात्तु ब्रह्मणो नास्तित्वं | है । वह कौन ? यह जो आनन्दमय प्रत्याशङ्का युक्ता । सर्वसामा- | है उसके नास्तित्वमें तो कुछ भी न्याच्च ब्रह्मणः । यस्मादेवमत- | शंका नहीं है । किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण स्तस्मात्, अथानन्तरं श्रोतुः | विशेषणोंसे रहित है इसलिये उसके शिष्यस्यानुप्रश्ना आचार्योक्तिमनु | अस्तित्वके अभावमें शंका होना एते प्रश्ना अनुप्रश्नाः । | उचित ही है । इसके सिवा ब्रह्मकी | सबके साथ समानता होनेके कारण | भी [ऐसी शंका हो ही सकती है] । | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये अब— | इसके अनन्तर श्रवण करनेवाले | शिष्यके अनुप्रश्न हैं । आचार्यकी | इस उक्ति के पश्चात् किये जानेवाले | ये प्रश्न—अनुप्रश्न हैं—
१५४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१५४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
सामान्यं हि ब्रह्माकाशादि- | आकाशादिका कारण होनेसे [हाशिया: विद्वदविद्वद्भेदेन] कारणत्वाद्विदुषो- | ब्रह्म विद्वान् और अविद्वान् दोनों- [हाशिया: ब्रह्मप्राप्तावाक्षेपः] ऽविदुषश्च। तस्माद्- | हीके लिये समान है । इससे विदुषोऽपि ब्रह्मप्राप्तिराशङ्क्यते- | अविद्वान्को भी ब्रह्मकी प्राप्ति होती उत अपि अविद्वानमुं लोकं | है—ऐसी आशंका की जाती है— परमात्मानमितः प्रेत्य कश्चन, | क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस चनशब्दोऽप्यर्थे, अविद्वानपि | शरीरको छोड़नेके अनन्तर इस लोक गच्छति प्राप्नोति किं वा न गच्छ- | अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता तीति द्वितीयोऽपि प्रश्नो द्रष्ट- | है ?—'कश्चन' में 'चन' शब्द 'अपि व्योऽनुप्रश्ना इति बहुवचनात् । | (भी)' के अर्थमें है । 'अथवा | नहीं होता ?' यह इसके साथ | दूसरा प्रश्न भी समझना चाहिये; | क्योंकि यहाँ 'अनुप्रश्नाः' ऐसा बहु- | वचनका प्रयोग किया गया है । विद्वांसं प्रत्यन्यौ प्रश्नौ । यद्य- | विद्वान्सामान्यं कारणमपि ब्रह्म | अन्य दो प्रश्न विद्वान्के विषयमें न गच्छति ततो विदुषोऽपि | हैं—ब्रह्म सबका साधारण कारण है, ब्रह्मागमनमाशङ्क्यते । अतस्तं | तब भी यदि अविद्वान् उसे प्राप्त प्रति प्रश्न आहो विद्वानिति । | नहीं होता तो विद्वान्के भी ब्रह्मको उकारं च वक्ष्यमाणमधस्तादप- | प्राप्त न होनेकी आशंका होती है; कृष्य तकारं च पूर्व- | अतः उसके उद्देश्यसे पूछा जाता स्मादुतशब्दाद्व्यासज्याहो इत्ये- | है—'क्या विद्वान् भी' आदि । तस्मात्पूर्वमुतशब्दं संयोज्य | [मूल मन्त्रमें] आगे कहे जानेवाले पृच्छति—उताहो विद्वानिति । | 'उ' को आगेसे खींचकर और | पूर्वोक्त 'उत' शब्दसे उसमें 'त' | जोड़कर 'आहो' इस शब्दके पहले | 'उत' शब्द जोड़कर 'उताहो विद्वान्' | इत्यादि प्रकारसे पूछता है—क्या CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ विद्वान्ब्रह्मविदपि कश्चिदितः प्रे- | कोई विद्वान् अर्थात् ब्रह्मवेत्ता भी त्यामुं लोकं समश्नुते प्राप्नोति | इस शरीरको छोड़कर इस लोकको | प्राप्त कर लेता है ? यहाँ मूलमें समश्नुते उ इत्येवंस्थिते, | 'समश्नुते उ' ऐसा पद था । उसमें अयादेशे यलोपे च कृते- | 'अय्' आदेश करके [ ‘लोपः | शाकल्यस्य' इस सूत्रके अनुसार ] ऽकारस्य प्लुतिः समश्नुता ३ उ | 'य्' का लोप करनेपर 'समश्नुत उ' | ऐसा प्रयोग सिद्ध होता है । फिर इति । विद्वान्समश्नुतेऽमुं | 'त' के अकारको प्लुत करनेपर | 'समश्नुता ३ उ' ऐसा पाठ हुआ लोकम् । किं वा यथाविद्वानेवं | है । विद्वान् इस लोकको प्राप्त होता | है ? अथवा अविद्वान्के समान विद्वानपि न समश्नुत इत्यपरः | विद्वान् भी उसे प्राप्त नहीं होता ? प्रश्नः । | यह एक अन्य प्रश्न है । द्वावेव वा प्रश्नौ विद्वदविद्व- | अथवा विद्वान् और अविद्वान्से द्विषयौ । बहुवचनं तु सामर्थ्य- | सम्बन्धित ये केवल दो ही प्रश्न हैं । | इनकी सामर्थ्यसे प्राप्त एक और प्राप्तप्रश्नान्तरापेक्षया घटते । | प्रश्नकी अपेक्षासे ही बहुवचन हो 'असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति | गया है । 'ब्रह्म असत् है — यदि | ऐसा जानता है' तथा 'ब्रह्म है- ब्रह्मेति चेद्वेद' इति श्रवणादस्ति | यदि ऐसा जानता है' ऐसी श्रुति नास्तीति संशयस्ततोऽर्थप्राप्तः कि- | होनेसे 'ब्रह्म है या नहीं' ऐसा | सन्देह होता है । अतः 'ब्रह्म है या मस्ति नास्तीति प्रथमोऽनुप्रश्नः । | नहीं' यह अर्थतः प्राप्त पहला अनु- ब्रह्मणोऽपक्षपातित्वादविद्वान् | प्रश्न है । और ब्रह्म पक्षपाती है नहीं, गच्छति न गच्छतीति द्वितीयः । | इसलिये 'अविद्वान् उसे प्राप्त होता | है या नहीं ?' यह दूसरा अनुप्रश्न ब्रह्मणः समत्वेऽप्यविदुष इव | है तथा ब्रह्म समान है, इसलिये
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१५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विदुषोऽप्यगमनमाशङ्क्यते किं | अविद्वान्के समान विद्वान्की भी विद्वान्समश्नुते न समश्नुत इति | ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें 'विद्वान् उसे प्राप्त | होता है या नहीं?' ऐसी शंका की तृतीयोऽनुप्रश्नः । | जाती है। यह तीसरा अनुप्रश्न है। एतेषां प्रतिवचनार्थमुत्तरग्रन्थ | आगेका ग्रन्थ इन प्रश्नोंका उत्तर [ब्रह्मणः सत्त्व-] आरभ्यते । तत्रा- | देनेके लिये ही आरम्भ किया जाता [रूपत्वस्थापनम्] स्तित्वमेव तावदु- | है । उसमें सबसे पहले ब्रह्मके | अस्तित्वका ही वर्णन किया जाता च्यते । यच्चोक्तम् 'सत्यं ज्ञान- | है । 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है', मनन्तं ब्रह्म' इति, तच्च कथं | ऐसा जो पहले कह चुके हैं सो सत्यत्वमित्येतद्वक्तव्यमितीदमु- | वह ब्रह्मकी सत्यता किस प्रकार | है—यह बतलाना चाहिये । इस- च्यते सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्यते । | पर कहते हैं—उसकी सत्ता उक्तं हि "सदेव सत्यम्" इति । | बतलानेसे ही उसके सत्यत्वका भी | प्रतिपादन हो जाता है । "सत् ही तस्मात्सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्य- | सत्य है" ऐसा अन्यत्र कहा भी ते । कथमेवमर्थतावगम्यतेऽस्य | है । अतः उसकी सत्ता बतलानेसे ग्रन्थस्य शब्दानुगमात् । अने- | ही उसका सत्यत्व भी बतला | दिया जाता है । किन्तु इस ग्रन्थ- नैव ह्यर्थेनान्वितान्युत्तराणि | का भी यही तात्पर्य है—यह कैसे वाक्यानि "तत्सत्यमित्याच- | जाना गया ? इसपर कहते हैं— क्षते" ( तै० उ० २ । ६ । १ ) | शब्दोंके अनुगमन ( अभिप्राय ) से; "यदेष आकाश आनन्दो न | क्योंकि "वह सत्य है—ऐसा कहते | हैं", "यदि यह आनन्दमय आकाश स्यात्" ( तै० उ० २ । ७ । १ ) | न होता" आदि आगेके वाक्य भी इत्यादीनि । | इसी अर्थसे युक्त हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७
तत्रासदेव ब्रह्मेत्याशङ्क्यते । | इसमें यह आशंका की जाती है
कस्मात् ? यदस्ति तद्विशेषतो | कि ब्रह्म असत् ही है । ऐसा क्यों
| है ? क्योंकि जो वस्तु होती है वह
गृह्यते यथा घटादि । यन्नास्ति | विशेषरूपसे उपलब्ध हुआ करती
| है; जैसे कि घट आदि । और जो
तन्नोपलभ्यते यथा शशविषाणा- | नहीं होती उसकी उपलब्धि भी नहीं
| होती; जैसे-शशशृंगादि । इसी
दि । तथा नोपलभ्यते ब्रह्म । | प्रकार ब्रह्मकी भी उपलब्धि नहीं
| होती । अतः विशेषरूपसे ग्रहण न
तस्माद्विशेषतोऽग्रहणान्नास्तीति । | किया जानेके कारण वह है ही नहीं ।
तन्न; आकाशादिकारणत्वा- | ऐसी बात नहीं है; क्योंकि ब्रह्म
| आकाशादिका कारण है । ब्रह्म नहीं
द्ब्रह्मणः । न नास्ति ब्रह्म । कस्मा- | है-ऐसी बात नहीं है । क्यों नहीं
दाकाशादि हि सर्वं कार्यं ब्रह्मणो | है ? क्योंकि ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ
| आकाशादि सम्पूर्ण कार्यवर्ग
जातं गृह्यते । यस्माच्च जायते | देखनेमें आता है । जिससे किसी
किंचित्तदस्तीति दृष्टं लोके; यथा | वस्तुका जन्म होता है वह पदार्थ
| होता ही है-ऐसा लोकमें देखा गया
घटाङ्कुरादिकारणं मृद्बीजादि । | है; जैसे कि घट और अङ्कुरादिके
| कारण मृत्तिका एवं बीज आदि ।
तस्मादाकाशादिकारणत्वादस्ति | अतः आकाशादिका कारण होनेसे
ब्रह्म । | ब्रह्म है ही ।
न चासतो जातं किंचिद् | लोकमें असत्से उत्पन्न हुआ
| कोई भी पदार्थ नहीं देखा जाता ।
गृह्यते लोके कार्यम् । असतश्चेन्ना- | यदि नाम-रूपादि कार्यवर्ग असत्से
मरूपादि कार्यं निरात्मकत्वा- | उत्पन्न हुआ होता तो वह निराधार
१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु; होनेके कारण ग्रहण ही नहीं किया तस्मादस्ति ब्रह्म । असतश्चेत्कार्यं जा सकता था । किन्तु वह ग्रहण किया ही जाता है; इसलिये ब्रह्म है गृह्यमाणमप्यसदनुन्वितमेव तत् ही । यदि यह कार्यवर्ग असत्से स्यात् । न चैवम्; तस्मादस्ति उत्पन्न हुआ होता तो ग्रहण किये जानेपर भी असदात्मक ही ग्रहण ब्रह्म तत्र । “कथमसतः सज्जायेत” किया जाता । किन्तु ऐसी बात है नहीं । इसलिये ब्रह्म है ही । इसी ( छा० उ० ६ । २ । २ ) इति सम्बन्धमें “असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है” ऐसी एक अन्य श्रुत्यन्तरमसतः सज्जन्मासंभव- श्रुतिने युक्तिपूर्वक असत्से सत्का जन्म होना असम्भव बतलाया है । मन्वाचष्टे न्यायतः । तस्मात्सदेव इसलिये ब्रह्म सत् ही है—यही मत ब्रह्मेति युक्तम् । ठीक है । तद्यदि मृद्बीजादिवत्कारणं शङ्का—यदि ब्रह्म मृत्तिका और बीज आदिके समान [ जगत्का स्यादचेतनं तर्हि ? उपादान ] कारण है तो वह अचेतन होना चाहिये । न, कामयितृत्वात् । न हि समाधान—नहीं, क्योंकि वह कामना करनेवाला है । लोकमें कोई ब्रह्मगणश्चित्स्वरूपत्व- कामयित्रचेतनमस्ति भी कामना करनेवाला अचेतन नहीं विवेचनम् लोके । सर्वज्ञं हि हुआ करता । ब्रह्म सर्वज्ञ है—यह ब्रह्मेत्यवोचाम । अतः कामयि- हम पहले कह चुके हैं । अतः उसका कामना करना भी युक्त तृत्वोपपत्तिः । ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९ कामयितृत्वत्वादस्मदादिवदना- | शङ्का—कामना करनेवाला होनेसे | तो वह हमारी-तुम्हारी तरह अनाप्त- प्तकाममिति चेत् ? | काम (अपूर्ण कामनावाला) सिद्ध होगा। | न, स्वातन्त्र्यात् । यथारन्यान् | समाधान—ऐसी बात नहीं है, | क्योंकि वह स्वतन्त्र है। जिस प्रकार परवशीकृत्य कामादिदोषाः | काम आदि दोष अन्य जीवोंको | विवश करके प्रवृत्त करते हैं प्रवर्तयन्ति न तथा ब्रह्मणः | उस प्रकार वे ब्रह्मके प्रवर्तक नहीं | हैं। तो वे कैसे हैं ? वे सत्य-ज्ञान- प्रवर्तकाः कामाः । कथं तर्हि | स्वरूप एवं स्वात्मभूत होनेके | कारण विशुद्ध हैं। उनके द्वारा सत्यज्ञानलक्षणाः स्वात्मभूतत्वा- | ब्रह्म प्रवृत्त नहीं किया जाता; बल्कि | जीवोंके प्रारब्ध-कर्मोंकी अपेक्षासे द्विशुद्धा न तैर्ब्रह्म प्रवर्त्यते । | वह ब्रह्म ही उनका प्रवर्तक है। | अतः कामनाओंके करनेमें ब्रह्मकी तेषां तु तत्प्रवर्तकं ब्रह्म प्राणि- | स्वतन्त्रता है। इसलिये ब्रह्म अनाप्त- | काम नहीं है। कर्मापेक्षया । तस्मात्स्वातन्त्र्यं | | किन्हीं अन्य साधनोंकी अपेक्षा- कामेषु ब्रह्मणः । अतो नानाप्त- | वाला न होनेसे भी कामनाओंके | विषयमें ब्रह्मकी स्वतन्त्रता है। जिस कामं ब्रह्म । | प्रकार धर्मादि कारणोंकी अपेक्षा | रखनेवाली अन्य जीवोंकी अनात्मभूत साधनान्तरानपेक्षत्वाच्च । किं | कामनाएँ अपने आत्मासे अतिरिक्त | देह और इन्द्रियरूप अन्य साधनों- च यथान्येषामनात्मभूता धर्मा- | की अपेक्षावाली होती हैं उस प्रकार | ब्रह्मको निमित्त आदिकी अपेक्षा दिनिमित्तापेक्षाः कामाः स्वात्म- व्यतिरिक्तकार्यकरणसाधनान्त- रापेक्षाश्च न तथा ब्रह्मणो निमि-
१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ त्ताद्यपेक्षत्वम् । किं तर्हि स्वात्म- | नहीं होती । तो ब्रह्मकी कामनाएँ | कैसी होती हैं ? वे स्वात्मासे नोऽनन्याः । | अभिन्न होती हैं । तदेतदाह सोऽकामयत स | उसीके विषयमें श्रुति कहती है— ब्रह्मणो आत्मायस्मादाकाशः | उसने कामना की—उस आत्माने, बहुभवनसङ्कल्पः संभूतोऽकामयत | जिससे कि आकाश उत्पन्न हुआ | है, कामना की । किस प्रकार कामितवान् । कथम् ? बहु स्यां | कामना की ? मैं बहुत-अधिक बहु प्रभूतं स्यां भवेयम् । कथमे- | रूपमें हो जाऊँ। अन्य पदार्थमें प्रवेश | किये बिना ही एक वस्तुकी बहुलता कस्यार्थान्तराननुप्रवेशे बहुत्वं | कैसे हो सकती है ? इसपर कहते स्यादित्युच्यते । प्रजायेयोत्पद्येय । | हैं—'प्रजायेय' अर्थात् उत्पन्न होऊँ । न हि पुत्रोत्पत्त्येवार्थान्तरविषयं | यह ब्रह्मका बहुत होना पुत्रकी | उत्पत्तिके समान अन्य वस्तुविषयक बहुभवनम्, कथं तर्हि ? आत्म- | नहीं है । तो फिर कैसा है ? अपने- स्थानाभिव्यक्तनामरूपाभिव्य- | में अव्यक्तरूपसे स्थित नाम-रूपोंकी | अभिव्यक्तिके द्वारा ही [ यह अनेक क्त्या । यदात्मस्थे अनभि- | रूप होना है ] । जिस समय व्यक्ते नामरूपे व्याक्रियेते तदा | आत्मामें स्थित अव्यक्त नाम और नामरूपे आत्मस्वरूपापरित्यागे- | रूपोंको व्यक्त किया जाता है उस | समय वे अपने स्वरूपका त्याग किये नैव ब्रह्मणाप्रविभक्तदेशकाले | बिना ही समस्त अवस्थाओंमें ब्रह्मसे सर्वावस्थासु व्याक्रियेते तदा | अभिन्न देश और कालमें ही व्यक्त | किये जाते हैं । यह नाम-रूपका तन्नामरूपव्याकरणं ब्रह्मणो बहु- | व्यक्त करना ही ब्रह्मका बहुत होना भवनम् । नान्यथा निरवयवस्य | है । इसके सिवा और किसी प्रकार | निरवयव ब्रह्मका बहुत अथवा अल्प ब्रह्मणो बहुत्वपत्तिरुपपद्यतेऽल्प- | होना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१
त्वं वा । यथाकाशस्याल्पत्वं बहु- | कि आकाशका अल्पत्व और बहुत्व | भी अन्य वस्तुके ही अधीन है त्वं च वस्त्वन्तरकृतमेव । अतस्त- | [उसी प्रकार ब्रह्मका भी है] । अतः | उन (नाम-रूपों) के द्वारा ही ब्रह्म द्द्वारेणैवात्मा बहु भवति । | बहुत हो जाता है । न ह्यात्मनोऽन्यदनात्मभूतं | आत्मासे भिन्न अनात्मभूत, तथा | उससे भिन्न देश-कालमें रहनेवाली तत्प्रविभक्तदेशकालं सूक्ष्मं व्यव- | कोई भी सूक्ष्म, व्यवहित (ओटवाली), | दूरस्थ, अथवा भूत, वर्तमान या भविष्यकालीन हितं विप्रकृष्टं भूतं भवद्भविष्यद्वा | वस्तु नहीं है । अतः सम्पूर्ण वस्तु विद्यते । अतो नामरूपे | अवस्थाओंसे सम्बन्धित नाम और सर्वावस्थे ब्रह्मणैवात्मवती, न | रूप ब्रह्मसे ही आत्मवान् हैं, किन्तु ब्रह्म तदात्मकम् । ते तत्प्रत्या- | ब्रह्म तद्रूप नहीं है । ब्रह्मका निषेध ख्याने न स्त एवेति तदात्मके | करनेपर वे रह ही नहीं सकते, | इसीसे वे तद्रूप कहे जाते हैं । उन उच्येते । ताभ्यां चोपाधिभ्यां | उपाधियोंसे ही ब्रह्म ज्ञाता, ज्ञेय और | ज्ञान-इन शब्दोंका तथा इनके अर्थ ज्ञातृज्ञेयज्ञानशब्दार्थादिसर्वसं- | आदि सब प्रकारके व्यवहारका पात्र व्यवहारभाग्ब्रह्म । | बनता है । स आत्मैवंकामः संस्तपो- | उस आत्माने ऐसी कामनावाला ऽतप्यत । तप इति ज्ञानमुच्यते । | होकर तप किया । 'तप' शब्दसे | यहाँ ज्ञान कहा जाता है, जैसा कि “यस्य ज्ञानमयं तपः” ( मु० उ० | “जिसका ज्ञानरूप तप है” इस अन्य १ । १ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । | श्रुतिसे सिद्ध होता है । आप्तकाम | होनेके कारण आत्माके लिये अन्य आप्तकामताच्चेतरस्यासंभव एव | तप तो असम्भव ही हैं । 'उसने तपसः । तत्तपोऽतप्यत तप्तवान् । | तप किया' इसका तात्पर्य यह है तै० उ० २१-२२- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ सृज्यमानजगद्रचनादिविषयामा- कि आत्माने रचे जानेवाले जगत्की लोचनामकरोदात्मेत्यर्थः । रचना आदिके विषयमें आलोचना की । स एवमालोच्य तपस्तप्त्वा इस प्रकार आलोचना अर्थात् तप प्राणिकर्मादिनिमित्तानुरूपमिदं करके उसने प्राणियोंके कर्मादि निमित्तोंके अनुरूप इस सम्पूर्ण सर्वं जगद्देशतः कालतो नाम्ना जगत्को रचा, जो देश, काल, रूपेण च यथानुभवं सर्वैः नाम और रूपसे यथानुभव सारी प्राणिभिः सर्वावस्थैरनुभूयमानम- अवस्थाओंमें स्थित सभी प्राणियोंद्वारा अनुभव किया जाता है । यह जो सृजत सृष्टवान् । यदिदं किं च कुछ है अर्थात् सामान्यरूपसे यह यत्किं चेदमविशिष्टम् । तदिदं जो कुछ जगत् है इसे रचकर उसने जगत्सृष्ट्वा किमकरोदित्युच्यते- क्या किया, सो बतलाते हैं—वह उस रचे हुए जगत्में ही अनुप्रविष्ट तदेव सृष्टं जगदनुप्राविशदिति । हो गया । तत्रैतच्चिन्त्यं कथमनुप्राविश- अब यहाँ यह विचारना है कि उसने किस प्रकार अनुप्रवेश किया ? तस्य जगदनु- दिति । किं यः जो स्रष्टा था, क्या उसने स्वस्वरूपसे प्रवेशः स्रष्टा स तेनैवात्म- ही अनुप्रवेश किया अथवा किसी और रूपसे ? इनमें कौन-सा पक्ष नानुपाविशदुतान्येनेति, किं ता- समीचीन है ? श्रुतिमें [ 'सृष्ट्वा' इस क्रियामें ] 'क्त्वा' प्रत्यय होनेसे तो वद्युक्तम् ? क्त्वाप्रत्ययश्रवणाद्यः यही ठीक जान पड़ता है कि जो स्रष्टा स्रष्टा स एवानुप्राविशदिति । था उसीने पीछे प्रवेश भी किया । *
- 'क्त्वा' प्रत्यय पूर्वकालिक क्रियामें हुआ करता है । हिन्दीमें इसी अर्थमें 'कर' या 'के' प्रत्यय होता है; जैसे—'रामने श्यामको बुलाकर [ या बुलाके ] धमकाया ।' इसमें यह नियम होता है कि पूर्वकालिक क्रिया और मुख्य क्रियाका कर्ता एक ही होता है; जैसे कि उपर्युक्त वाक्यमें पूर्वकालिक क्रिया 'बुलाकर' तथा मुख्य क्रिया 'धमकाया' इन दोनोंका कर्ता 'राम' ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६३
ननु न युक्तं मृद्वच्चेतत्कारणं पूर्व०-यदि ब्रह्म मृत्तिकाके ब्रह्म तदात्मकत्वात्कार्यस्य । का- समान जगत्का कारण है तो उसका कार्य तद्रूप होनेके कारण रणमेव हि कार्यात्मना परिणत- उसमें उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है। क्योंकि कारण ही कार्यरूप- मित्यतोऽप्रविष्ट इव कार्योत्पत्ते- से परिणत हुआ करता है, अतः किसी अन्य पदार्थके समान पहले रूर्ध्वं पृथक्कारणस्य पुनः प्रवेशो- बिना प्रवेश किये कार्यकी उत्पत्तिके ऽनुपपन्नः । न हि घटपरिणाम- अनन्तर उसमें कारणका पुनः प्रवेश करना सर्वथा असम्भव है। घटरूप- व्यतिरेकेण मृदो घटे प्रवेशो- में परिणत होनेके सिवा मृत्तिकाका घटमें और कोई प्रवेश नहीं हुआ ऽस्ति । यथा घटे चूर्णात्मना करता। हाँ, जिस प्रकार घटमें चूर्ण मृदोऽनुप्रवेश एवमन्येनात्मना (बालू) रूपसे मृत्तिकाका अनु- प्रवेश होता है उसी प्रकार किसी नामरूपकार्येऽनुप्रवेश आत्मन इति अन्य रूपसे आत्माका नाम-रूप कार्यमें चेच्छ्रुत्यन्तराच्च "अनेन जीवेना- भी अनुप्रवेश हो सकता है; जैसा कि "इस जीवरूपसे अनुप्रवेश करके" त्मनानुप्रविश्य" ( छा० उ० ६ । इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है ३ । २ ) इति । —यदि ऐसा मानें तो ?
नैवं युक्तमेकत्वाद्व्रह्मणः । मृ- सिद्धान्ती-ऐसा मानना उचित नहीं है; क्योंकि ब्रह्म तो एक ही दात्मनस्त्वनेकत्वात्सावयवत्वाच्च है। मृत्तिकारूप कारण तो अनेक और सावयव होनेके कारण उसका युक्तो घटे मृदश्चूर्णात्मनानु- घटमें चूर्णरूपसे अनुप्रवेश करना भी सम्भव है; क्योंकि मृत्तिकाके चूर्णका प्रवेशः । मृदश्चूर्णस्याप्रविष्टदेश- उस देशमें प्रवेश नहीं है; किन्तु वत्त्वाच्च । न त्वात्मन एकत्वे आत्मा तो एक है, अतः उसके
इसी प्रकार 'अनुप्राविशत्' और 'सृष्ट्वा' इन दोनों क्रियाओंका कर्ता भी ब्रह्म ही होना चाहिये ।
१६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ सति निरवयवत्वादप्रविष्टदेशा- | निरवयव और उससे अप्रविष्ट देशका भावाच्च प्रवेश उपपद्यते । कथं | अभाव होनेके कारण उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है । तो फिर उसका तर्हि प्रवेशः स्यात् ? युक्तश्च प्रवेशः | प्रवेश कैसे होना चाहिये ? तथा उसका प्रवेश होना उचित ही है; श्रुतत्वात्तदेवानुप्राविशदिति । | क्योंकि 'उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया' ऐसी श्रुति है । सावयवमेवास्तु तर्हि । साव- | पूर्व०-तब तो ब्रह्म सावयव ही यवत्वान्मुखे हस्तप्रवेशवन्नाम- | होना चाहिये । उस अवस्थामें, सावयव होनेके कारण मुखमें हाथका रूपकार्ये जीवात्मनानुप्रवेशो युक्त | प्रवेश होनेके समान उसका नाम-रूप कार्यमें जीवरूपसे प्रवेश होना ठीक एवेति चेत् ? | ही होगा-यदि ऐसा कहें तो ? नाशून्यदेशत्वात् । न हि | सिद्धान्ती-नहीं; क्योंकि उससे कार्यात्मना परिणतस्य नाम- | शून्य कोई देश नहीं है । कार्य-रूपमें परिणत हुए ब्रह्मका नाम-रूप रूपकार्यदेशव्यतिरेकेणात्मशून्यः | कार्यके देशसे अतिरिक्त और कोई अपनेसे शून्य देश नहीं है, जिसमें प्रदेशोऽस्ति यं प्रविशेज्जीवात्मना । | उसका जीवरूपसे प्रवेश करना सम्भव हो । और यदि यह मानो कारणमेव चेत्प्रविशेज्जीवात्मत्वं | कि जीवात्माने कारणमें ही प्रवेश किया तब तो वह अपने जीवत्वको जह्याद्यथा घटो मृत्प्रवेशे घटत्वं | ही त्याग देगा, जिस प्रकार कि घड़ा मृत्तिकामें प्रवेश करनेपर जहाति । तदेवानुप्राविशदिति | अपना घटत्व त्याग देता है । तथा 'उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया' इस च श्रुतेर्न कारणानुप्रवेशो युक्तः । | श्रुतिसे भी कारणमें अनुप्रवेश करना सम्भव नहीं है ।
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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५
| [संस्कृत-मूल] |
| कार्यान्तरमेव स्यादिति चेत् ? |
| तदेवानुप्राविशदिति जीवात्मरूपं |
| कार्यं नामरूपपरिणतं कार्यान्तर- |
| मेवापद्यत इति चेत् ? |
| न; विरोधात् । न हि घटो |
| घटान्तरमापद्यते । व्यतिरेक- |
| श्रुतिविरोधाच्च । जीवस्य नाम- |
| रूपकार्यव्यतिरेकानुवादिन्यः |
| श्रुतयो विरुध्येरन् । तदापत्तौ |
| मोक्षासंभवाच्च । न हि यतो |
| मुच्यमानस्तदेवापद्यते । न हि |
| शृङ्खलापत्तिर्बद्धस्य तस्करादेः । |
| बाह्यान्तर्भेदेन परिणतमिति |
| चेत्तदेव कारणं ब्रह्म शरीराद्या- |
| धारत्वेन तदन्तर्जीवात्मनाधेय- |
| त्वेन च परिणतमिति चेत् ? |
- अर्थात् जीवको तो नाम-रूपात्मक कार्यसे मुक्त होना इष्ट है, फिर वह उसीको क्यों प्राप्त होगा ?
१६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ न; बहिःष्ठस्य प्रवेशोपपत्तेः। न | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि प्रवेश हि यो यस्यानतःस्थः स एव | बाहर रहनेवाले पदार्थका ही हो सकता है । जो जिसके भीतर तत्प्रविष्ट उच्यते । बहिःष्ठस्यानु- | स्थित है वह उसमें प्रविष्ट हुआ नहीं कहा जाता । अनुप्रवेश प्रवेशः स्यात्प्रवेशशब्दार्थस्यैवं | तो बाहर रहनेवाले पदार्थका ही हो सकता है; क्योंकि 'प्रवेश' दृष्टत्वात् । यथा गृहं कृत्वा | शब्दका अर्थ ऐसा ही देखा गया प्राविशदिति । | है; जैसे कि 'घर बनाकर उसमें प्रवेश किया' इस वाक्यमें । जलसूर्यकादिप्रतिविम्बवत्प्र- | यदि कहो कि जलमें सूर्यके वेशः स्यादिति चेन्न; अपरिच्छि- | प्रतिबिम्ब आदिके समान उसका प्रवेश हो सकता है, तो ऐसा न्नत्वादमूर्तत्वाच्च । परिच्छिन्नस्य | कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि ब्रह्म अपरिच्छिन्न और अमूर्त है । परि- मूर्तस्यान्यस्यान्यत्र प्रसादस्व- | च्छिन्न और मूर्तरूप अन्य पदार्थोंका भावके जलादौ सूर्यकादिप्रतिवि- | ही स्वच्छस्वभाव जल आदि अन्य पदार्थोंमें सूर्यकादिरूप प्रतिबिम्ब म्बोदयः स्यात् । न त्वात्मनः, | पड़ा करता है; किन्तु आत्माका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता; क्योंकि अमूर्तत्वादाकाशादिकारणस्या- | वह अमूर्त है तथा आकाशादिका त्मनो व्यापकत्वात् । तद्विप्रकृष्ट- | कारणरूप आत्मा व्यापक भी है । उससे दूर देशमें स्थित प्रतिबिम्बकी देशप्रतिविम्बाधारवस्त्वन्तराभा- | आधारभूत अन्य वस्तुका अभाव वाच्च प्रतिविम्बवत्प्रवेशो न | होनेसे भी उसका प्रतिबिम्बके समान प्रवेश होना सम्भव नहीं है । युक्तः । एवं तर्हि नैवास्ति प्रवेशो न | पूर्व०-तब तो आत्माका प्रवेश होता ही नहीं-इसके सिवा च गत्यन्तरमुपलभामहे 'तदे- | 'तदेवानुप्राविशत्' इस श्रुतिकी और