भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

अनु० ६] शाङ्करभाष्यार्थ १५३ दधानतया नास्तित्वं प्रतिपद्यते- | असत्त्व प्रतिपादन करता है; ऽब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थत्वात्तस्य । अतो | क्योंकि वह भी ब्रह्मकी प्राप्तिके ही नास्तिकः सोऽसन्नसाधुरुच्यते | लिये है । अतः वह नास्तिक लोकमें लोके । तद्विपरीतः सन्योऽस्ति | असत्-असाधु कहा जाता है । ब्रह्मेति चेद्वेद स तद्ब्रह्मप्रतिपत्ति- | इसके विपरीत जो पुरुष 'ब्रह्म है' हेतुं सन्मार्गं वर्णाश्रमादिव्यव- | ऐसा जानता है वह 'सत्' है; स्थालक्षणं श्रद्दधानतया यथा- | क्योंकि वह उस ब्रह्मकी प्राप्तिके वत्प्रतिपद्यते यस्मात्ततस्तस्मात् | हेतुभूत वर्णाश्रमादिके व्यवस्थारूप सन्तं साधुमार्गस्थमेनं विदुः | सन्मार्गको श्रद्धापूर्वक ठीक-ठीक साधवः तस्मादस्तीत्येव ब्रह्म | जानता है । इसीलिये साधुलोग उसे प्रतिपत्तव्यमिति वाक्यार्थः । | सत् यानी शुभ मार्गमें स्थित जानते तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष | हैं । अतः 'ब्रह्म है' ऐसा ही एव शरीरे विज्ञानमये भवः | जानना चाहिये—यह इस वाक्यका शारीर आत्मा । कोऽसौ ? य एष | अर्थ है । आनन्दमयः । तं प्रति नास्त्या- | उस विज्ञानमयका यही शारीर— शङ्का नास्तित्वे । अपोढसर्व- | विज्ञानमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा विशेषत्वात्तु ब्रह्मणो नास्तित्वं | है । वह कौन ? यह जो आनन्दमय प्रत्याशङ्का युक्ता । सर्वसामा- | है उसके नास्तित्वमें तो कुछ भी न्याच्च ब्रह्मणः । यस्मादेवमत- | शंका नहीं है । किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण स्तस्मात्, अथानन्तरं श्रोतुः | विशेषणोंसे रहित है इसलिये उसके शिष्यस्यानुप्रश्ना आचार्योक्तिमनु | अस्तित्वके अभावमें शंका होना एते प्रश्ना अनुप्रश्नाः । | उचित ही है । इसके सिवा ब्रह्मकी | सबके साथ समानता होनेके कारण | भी [ऐसी शंका हो ही सकती है] । | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये अब— | इसके अनन्तर श्रवण करनेवाले | शिष्यके अनुप्रश्न हैं । आचार्यकी | इस उक्ति के पश्चात् किये जानेवाले | ये प्रश्न—अनुप्रश्न हैं—