तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[मूल संस्कृत (शाङ्करभाष्य)]
रम्भणमात्रेऽस्तित्वभाविता बुद्धि- स्तद्विपरीते व्यवहारातीते नास्ति- त्वमपि प्रतिपद्यते । यथा घटा- दिर्व्यवहारविषयतयोपपन्नः सं- स्तद्विपरीतोऽसन्निति प्रसिद्धम् । एवं तत्सामान्यादिहापि स्याद्ब्रह्म- णो नास्तित्वप्रत्याशङ्का । तस्मा- दुच्यते—अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेदेति ।
किं पुनः स्यात्तदस्तीति वि- जानतस्तदाह—सन्तं विद्यमान- ब्रह्मस्वरूपेण परमार्थसदात्मापन्न- मेनमेवंविदं विदुर्ब्रह्मविदस्तत- स्तस्मादस्तित्ववेदनात्सोऽन्येषां ब्रह्मवद्विज्ञेयो भवतीत्यर्थः ।
अथवा यो नास्ति ब्रह्मेति मन्यते स सर्वस्यैव सन्मार्गस्य वर्णाश्रमादिव्यवस्थालक्षणस्याश्र-
[हिन्दी अनुवाद]
में ही, जो कि केवल वाणीसे ही उच्चारण किये जानेवाले हैं, अस्तित्व- की भावनासे भावित हुई बुद्धि उनसे विपरीत व्यवहारातीत पदार्थों- में अस्तित्वका भी अनुभव नहीं करती; जैसे कि [ जल लाना आदि ] व्यवहारके विषयरूपसे उपपन्न हुआ घट आदि पदार्थ 'सत्' और उससे विपरीत [ वन्ध्यापुत्रादि ] 'असत्' होता है—इस प्रकार प्रसिद्ध है । उसी प्रकार उसकी समानताके कारण यहाँ भी ब्रह्मके अविद्यमानत्व- के विषयमें शंका हो सकती है । इसीलिये कहा है—'ब्रह्म है-ऐसा यदि कोई जानता है' इत्यादि ।
किन्तु ‘वह ( ब्रह्म ) है’ ऐसा जाननेवाले पुरुषको क्या फल मिलता है ? इसपर कहते हैं—ब्रह्मवेत्तालोग इस प्रकार जाननेवाले इस पुरुषको सत्—विद्यमान अर्थात् ब्रह्मरूपसे परमार्थ सत्स्वरूपको प्राप्त हुआ समझते हैं । तात्पर्य यह है कि इस कारणसे ब्रह्मके अस्तित्वको जाननेके कारण वह दूसरोंके लिये ब्रह्मके समान जाननेयोग्य हो जाता है ।
अथवा जो पुरुष ‘ब्रह्म नहीं है’ ऐसा मानता है वह अश्रद्धालु होनेके कारण, वर्णाश्रमादि व्यवस्था-रूप सारे ही शुभमार्गका,