भारतकोश
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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

अनु० ६] शाङ्करभाष्यार्थ १५३ दधानतया नास्तित्वं प्रतिपद्यते- | असत्त्व प्रतिपादन करता है; ऽब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थत्वात्तस्य । अतो | क्योंकि वह भी ब्रह्मकी प्राप्तिके ही नास्तिकः सोऽसन्नसाधुरुच्यते | लिये है । अतः वह नास्तिक लोकमें लोके । तद्विपरीतः सन्योऽस्ति | असत्-असाधु कहा जाता है । ब्रह्मेति चेद्वेद स तद्ब्रह्मप्रतिपत्ति- | इसके विपरीत जो पुरुष 'ब्रह्म है' हेतुं सन्मार्गं वर्णाश्रमादिव्यव- | ऐसा जानता है वह 'सत्' है; स्थालक्षणं श्रद्दधानतया यथा- | क्योंकि वह उस ब्रह्मकी प्राप्तिके वत्प्रतिपद्यते यस्मात्ततस्तस्मात् | हेतुभूत वर्णाश्रमादिके व्यवस्थारूप सन्तं साधुमार्गस्थमेनं विदुः | सन्मार्गको श्रद्धापूर्वक ठीक-ठीक साधवः तस्मादस्तीत्येव ब्रह्म | जानता है । इसीलिये साधुलोग उसे प्रतिपत्तव्यमिति वाक्यार्थः । | सत् यानी शुभ मार्गमें स्थित जानते तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष | हैं । अतः 'ब्रह्म है' ऐसा ही एव शरीरे विज्ञानमये भवः | जानना चाहिये—यह इस वाक्यका शारीर आत्मा । कोऽसौ ? य एष | अर्थ है । आनन्दमयः । तं प्रति नास्त्या- | उस विज्ञानमयका यही शारीर— शङ्का नास्तित्वे । अपोढसर्व- | विज्ञानमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा विशेषत्वात्तु ब्रह्मणो नास्तित्वं | है । वह कौन ? यह जो आनन्दमय प्रत्याशङ्का युक्ता । सर्वसामा- | है उसके नास्तित्वमें तो कुछ भी न्याच्च ब्रह्मणः । यस्मादेवमत- | शंका नहीं है । किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण स्तस्मात्, अथानन्तरं श्रोतुः | विशेषणोंसे रहित है इसलिये उसके शिष्यस्यानुप्रश्ना आचार्योक्तिमनु | अस्तित्वके अभावमें शंका होना एते प्रश्ना अनुप्रश्नाः । | उचित ही है । इसके सिवा ब्रह्मकी | सबके साथ समानता होनेके कारण | भी [ऐसी शंका हो ही सकती है] । | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये अब— | इसके अनन्तर श्रवण करनेवाले | शिष्यके अनुप्रश्न हैं । आचार्यकी | इस उक्ति के पश्चात् किये जानेवाले | ये प्रश्न—अनुप्रश्न हैं—

१५४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१५४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

सामान्यं हि ब्रह्माकाशादि- | आकाशादिका कारण होनेसे [हाशिया: विद्वदविद्वद्भेदेन] कारणत्वाद्विदुषो- | ब्रह्म विद्वान् और अविद्वान् दोनों- [हाशिया: ब्रह्मप्राप्तावाक्षेपः] ऽविदुषश्च। तस्माद्- | हीके लिये समान है । इससे विदुषोऽपि ब्रह्मप्राप्तिराशङ्क्यते- | अविद्वान्को भी ब्रह्मकी प्राप्ति होती उत अपि अविद्वानमुं लोकं | है—ऐसी आशंका की जाती है— परमात्मानमितः प्रेत्य कश्चन, | क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस चनशब्दोऽप्यर्थे, अविद्वानपि | शरीरको छोड़नेके अनन्तर इस लोक गच्छति प्राप्नोति किं वा न गच्छ- | अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता तीति द्वितीयोऽपि प्रश्नो द्रष्ट- | है ?—'कश्चन' में 'चन' शब्द 'अपि व्योऽनुप्रश्ना इति बहुवचनात् । | (भी)' के अर्थमें है । 'अथवा | नहीं होता ?' यह इसके साथ | दूसरा प्रश्न भी समझना चाहिये; | क्योंकि यहाँ 'अनुप्रश्नाः' ऐसा बहु- | वचनका प्रयोग किया गया है । विद्वांसं प्रत्यन्यौ प्रश्नौ । यद्य- | विद्वान्सामान्यं कारणमपि ब्रह्म | अन्य दो प्रश्न विद्वान्के विषयमें न गच्छति ततो विदुषोऽपि | हैं—ब्रह्म सबका साधारण कारण है, ब्रह्मागमनमाशङ्क्यते । अतस्तं | तब भी यदि अविद्वान् उसे प्राप्त प्रति प्रश्न आहो विद्वानिति । | नहीं होता तो विद्वान्के भी ब्रह्मको उकारं च वक्ष्यमाणमधस्तादप- | प्राप्त न होनेकी आशंका होती है; कृष्य तकारं च पूर्व- | अतः उसके उद्देश्यसे पूछा जाता स्मादुतशब्दाद्व्यासज्याहो इत्ये- | है—'क्या विद्वान् भी' आदि । तस्मात्पूर्वमुतशब्दं संयोज्य | [मूल मन्त्रमें] आगे कहे जानेवाले पृच्छति—उताहो विद्वानिति । | 'उ' को आगेसे खींचकर और | पूर्वोक्त 'उत' शब्दसे उसमें 'त' | जोड़कर 'आहो' इस शब्दके पहले | 'उत' शब्द जोड़कर 'उताहो विद्वान्' | इत्यादि प्रकारसे पूछता है—क्या CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ विद्वान्ब्रह्मविदपि कश्चिदितः प्रे- | कोई विद्वान् अर्थात् ब्रह्मवेत्ता भी त्यामुं लोकं समश्नुते प्राप्नोति | इस शरीरको छोड़कर इस लोकको | प्राप्त कर लेता है ? यहाँ मूलमें समश्नुते उ इत्येवंस्थिते, | 'समश्नुते उ' ऐसा पद था । उसमें अयादेशे यलोपे च कृते- | 'अय्' आदेश करके [ ‘लोपः | शाकल्यस्य' इस सूत्रके अनुसार ] ऽकारस्य प्लुतिः समश्नुता ३ उ | 'य्' का लोप करनेपर 'समश्नुत उ' | ऐसा प्रयोग सिद्ध होता है । फिर इति । विद्वान्समश्नुतेऽमुं | 'त' के अकारको प्लुत करनेपर | 'समश्नुता ३ उ' ऐसा पाठ हुआ लोकम् । किं वा यथाविद्वानेवं | है । विद्वान् इस लोकको प्राप्त होता | है ? अथवा अविद्वान्‌के समान विद्वानपि न समश्नुत इत्यपरः | विद्वान् भी उसे प्राप्त नहीं होता ? प्रश्नः । | यह एक अन्य प्रश्न है । द्वावेव वा प्रश्नौ विद्वदविद्व- | अथवा विद्वान् और अविद्वान्‌से द्विषयौ । बहुवचनं तु सामर्थ्य- | सम्बन्धित ये केवल दो ही प्रश्न हैं । | इनकी सामर्थ्यसे प्राप्त एक और प्राप्तप्रश्नान्तरापेक्षया घटते । | प्रश्नकी अपेक्षासे ही बहुवचन हो 'असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति | गया है । 'ब्रह्म असत् है — यदि | ऐसा जानता है' तथा 'ब्रह्म है- ब्रह्मेति चेद्वेद' इति श्रवणादस्ति | यदि ऐसा जानता है' ऐसी श्रुति नास्तीति संशयस्ततोऽर्थप्राप्तः कि- | होनेसे 'ब्रह्म है या नहीं' ऐसा | सन्देह होता है । अतः 'ब्रह्म है या मस्ति नास्तीति प्रथमोऽनुप्रश्नः । | नहीं' यह अर्थतः प्राप्त पहला अनु- ब्रह्मणोऽपक्षपातित्वादविद्वान् | प्रश्न है । और ब्रह्म पक्षपाती है नहीं, गच्छति न गच्छतीति द्वितीयः । | इसलिये 'अविद्वान् उसे प्राप्त होता | है या नहीं ?' यह दूसरा अनुप्रश्न ब्रह्मणः समत्वेऽप्यविदुष इव | है तथा ब्रह्म समान है, इसलिये

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१५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विदुषोऽप्यगमनमाशङ्क्यते किं | अविद्वान्‌के समान विद्वान्‌की भी विद्वान्समश्नुते न समश्नुत इति | ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें 'विद्वान् उसे प्राप्त | होता है या नहीं?' ऐसी शंका की तृतीयोऽनुप्रश्नः । | जाती है। यह तीसरा अनुप्रश्न है। एतेषां प्रतिवचनार्थमुत्तरग्रन्थ | आगेका ग्रन्थ इन प्रश्नोंका उत्तर [ब्रह्मणः सत्त्व-] आरभ्यते । तत्रा- | देनेके लिये ही आरम्भ किया जाता [रूपत्वस्थापनम्] स्तित्वमेव तावदु- | है । उसमें सबसे पहले ब्रह्मके | अस्तित्वका ही वर्णन किया जाता च्यते । यच्चोक्तम् 'सत्यं ज्ञान- | है । 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है', मनन्तं ब्रह्म' इति, तच्च कथं | ऐसा जो पहले कह चुके हैं सो सत्यत्वमित्येतद्वक्तव्यमितीदमु- | वह ब्रह्मकी सत्यता किस प्रकार | है—यह बतलाना चाहिये । इस- च्यते सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्यते । | पर कहते हैं—उसकी सत्ता उक्तं हि "सदेव सत्यम्" इति । | बतलानेसे ही उसके सत्यत्वका भी | प्रतिपादन हो जाता है । "सत् ही तस्मात्सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्य- | सत्य है" ऐसा अन्यत्र कहा भी ते । कथमेवमर्थतावगम्यतेऽस्य | है । अतः उसकी सत्ता बतलानेसे ग्रन्थस्य शब्दानुगमात् । अने- | ही उसका सत्यत्व भी बतला | दिया जाता है । किन्तु इस ग्रन्थ- नैव ह्यर्थेनान्वितान्युत्तराणि | का भी यही तात्पर्य है—यह कैसे वाक्यानि "तत्सत्यमित्याच- | जाना गया ? इसपर कहते हैं— क्षते" ( तै० उ० २ । ६ । १ ) | शब्दोंके अनुगमन ( अभिप्राय ) से; "यदेष आकाश आनन्दो न | क्योंकि "वह सत्य है—ऐसा कहते | हैं", "यदि यह आनन्दमय आकाश स्यात्" ( तै० उ० २ । ७ । १ ) | न होता" आदि आगेके वाक्य भी इत्यादीनि । | इसी अर्थसे युक्त हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७


तत्रासदेव ब्रह्मेत्याशङ्क्यते ।                |  इसमें यह आशंका की जाती है
कस्मात् ? यदस्ति तद्विशेषतो                |  कि ब्रह्म असत् ही है । ऐसा क्यों
|  है ? क्योंकि जो वस्तु होती है वह
गृह्यते यथा घटादि । यन्नास्ति                |  विशेषरूपसे उपलब्ध हुआ करती
|  है; जैसे कि घट आदि । और जो
तन्नोपलभ्यते यथा शशविषाणा-              |  नहीं होती उसकी उपलब्धि भी नहीं
|  होती; जैसे-शशशृंगादि । इसी
दि । तथा नोपलभ्यते ब्रह्म ।                 |  प्रकार ब्रह्मकी भी उपलब्धि नहीं
|  होती । अतः विशेषरूपसे ग्रहण न
तस्माद्विशेषतोऽग्रहणान्नास्तीति ।          |  किया जानेके कारण वह है ही नहीं ।
तन्न; आकाशादिकारणत्वा-                  |  ऐसी बात नहीं है; क्योंकि ब्रह्म
|  आकाशादिका कारण है । ब्रह्म नहीं
द्ब्रह्मणः । न नास्ति ब्रह्म । कस्मा-         |  है-ऐसी बात नहीं है । क्यों नहीं
दाकाशादि हि सर्वं कार्यं ब्रह्मणो          |  है ? क्योंकि ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ
|  आकाशादि सम्पूर्ण कार्यवर्ग
जातं गृह्यते । यस्माच्च जायते               |  देखनेमें आता है । जिससे किसी
किंचित्तदस्तीति दृष्टं लोके; यथा             |  वस्तुका जन्म होता है वह पदार्थ
|  होता ही है-ऐसा लोकमें देखा गया
घटाङ्कुरादिकारणं मृद्बीजादि ।             |  है; जैसे कि घट और अङ्कुरादिके
|  कारण मृत्तिका एवं बीज आदि ।
तस्मादाकाशादिकारणत्वादस्ति               |  अतः आकाशादिका कारण होनेसे
ब्रह्म ।                                     |  ब्रह्म है ही ।
न चासतो जातं किंचिद्                      |  लोकमें असत्से उत्पन्न हुआ
|  कोई भी पदार्थ नहीं देखा जाता ।
गृह्यते लोके कार्यम् । असतश्चेन्ना-        |  यदि नाम-रूपादि कार्यवर्ग असत्से
मरूपादि कार्यं निरात्मकत्वा-              |  उत्पन्न हुआ होता तो वह निराधार

१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु; होनेके कारण ग्रहण ही नहीं किया तस्मादस्ति ब्रह्म । असतश्चेत्कार्यं जा सकता था । किन्तु वह ग्रहण किया ही जाता है; इसलिये ब्रह्म है गृह्यमाणमप्यसदनुन्वितमेव तत् ही । यदि यह कार्यवर्ग असत्से स्यात् । न चैवम्; तस्मादस्ति उत्पन्न हुआ होता तो ग्रहण किये जानेपर भी असदात्मक ही ग्रहण ब्रह्म तत्र । “कथमसतः सज्जायेत” किया जाता । किन्तु ऐसी बात है नहीं । इसलिये ब्रह्म है ही । इसी ( छा० उ० ६ । २ । २ ) इति सम्बन्धमें “असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है” ऐसी एक अन्य श्रुत्यन्तरमसतः सज्जन्मासंभव- श्रुतिने युक्तिपूर्वक असत्से सत्का जन्म होना असम्भव बतलाया है । मन्वाचष्टे न्यायतः । तस्मात्सदेव इसलिये ब्रह्म सत् ही है—यही मत ब्रह्मेति युक्तम् । ठीक है । तद्यदि मृद्बीजादिवत्कारणं शङ्का—यदि ब्रह्म मृत्तिका और बीज आदिके समान [ जगत्का स्यादचेतनं तर्हि ? उपादान ] कारण है तो वह अचेतन होना चाहिये । न, कामयितृत्वात् । न हि समाधान—नहीं, क्योंकि वह कामना करनेवाला है । लोकमें कोई ब्रह्मगणश्चित्स्वरूपत्व- कामयित्रचेतनमस्ति भी कामना करनेवाला अचेतन नहीं विवेचनम् लोके । सर्वज्ञं हि हुआ करता । ब्रह्म सर्वज्ञ है—यह ब्रह्मेत्यवोचाम । अतः कामयि- हम पहले कह चुके हैं । अतः उसका कामना करना भी युक्त तृत्वोपपत्तिः । ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९ कामयितृत्वत्वादस्मदादिवदना- | शङ्का—कामना करनेवाला होनेसे | तो वह हमारी-तुम्हारी तरह अनाप्त- प्तकाममिति चेत् ? | काम (अपूर्ण कामनावाला) सिद्ध होगा। | न, स्वातन्त्र्यात् । यथारन्यान् | समाधान—ऐसी बात नहीं है, | क्योंकि वह स्वतन्त्र है। जिस प्रकार परवशीकृत्य कामादिदोषाः | काम आदि दोष अन्य जीवोंको | विवश करके प्रवृत्त करते हैं प्रवर्तयन्ति न तथा ब्रह्मणः | उस प्रकार वे ब्रह्मके प्रवर्तक नहीं | हैं। तो वे कैसे हैं ? वे सत्य-ज्ञान- प्रवर्तकाः कामाः । कथं तर्हि | स्वरूप एवं स्वात्मभूत होनेके | कारण विशुद्ध हैं। उनके द्वारा सत्यज्ञानलक्षणाः स्वात्मभूतत्वा- | ब्रह्म प्रवृत्त नहीं किया जाता; बल्कि | जीवोंके प्रारब्ध-कर्मोंकी अपेक्षासे द्विशुद्धा न तैर्ब्रह्म प्रवर्त्यते । | वह ब्रह्म ही उनका प्रवर्तक है। | अतः कामनाओंके करनेमें ब्रह्मकी तेषां तु तत्प्रवर्तकं ब्रह्म प्राणि- | स्वतन्त्रता है। इसलिये ब्रह्म अनाप्त- | काम नहीं है। कर्मापेक्षया । तस्मात्स्वातन्त्र्यं | | किन्हीं अन्य साधनोंकी अपेक्षा- कामेषु ब्रह्मणः । अतो नानाप्त- | वाला न होनेसे भी कामनाओंके | विषयमें ब्रह्मकी स्वतन्त्रता है। जिस कामं ब्रह्म । | प्रकार धर्मादि कारणोंकी अपेक्षा | रखनेवाली अन्य जीवोंकी अनात्मभूत साधनान्तरानपेक्षत्वाच्च । किं | कामनाएँ अपने आत्मासे अतिरिक्त | देह और इन्द्रियरूप अन्य साधनों- च यथान्येषामनात्मभूता धर्मा- | की अपेक्षावाली होती हैं उस प्रकार | ब्रह्मको निमित्त आदिकी अपेक्षा दिनिमित्तापेक्षाः कामाः स्वात्म- व्यतिरिक्तकार्यकरणसाधनान्त- रापेक्षाश्च न तथा ब्रह्मणो निमि-

१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ त्ताद्यपेक्षत्वम् । किं तर्हि स्वात्म- | नहीं होती । तो ब्रह्मकी कामनाएँ | कैसी होती हैं ? वे स्वात्मासे नोऽनन्याः । | अभिन्न होती हैं । तदेतदाह सोऽकामयत स | उसीके विषयमें श्रुति कहती है— ब्रह्मणो आत्मायस्मादाकाशः | उसने कामना की—उस आत्माने, बहुभवनसङ्कल्पः संभूतोऽकामयत | जिससे कि आकाश उत्पन्न हुआ | है, कामना की । किस प्रकार कामितवान् । कथम् ? बहु स्यां | कामना की ? मैं बहुत-अधिक बहु प्रभूतं स्यां भवेयम् । कथमे- | रूपमें हो जाऊँ। अन्य पदार्थमें प्रवेश | किये बिना ही एक वस्तुकी बहुलता कस्यार्थान्तराननुप्रवेशे बहुत्वं | कैसे हो सकती है ? इसपर कहते स्यादित्युच्यते । प्रजायेयोत्पद्येय । | हैं—'प्रजायेय' अर्थात् उत्पन्न होऊँ । न हि पुत्रोत्पत्त्येवार्थान्तरविषयं | यह ब्रह्मका बहुत होना पुत्रकी | उत्पत्तिके समान अन्य वस्तुविषयक बहुभवनम्, कथं तर्हि ? आत्म- | नहीं है । तो फिर कैसा है ? अपने- स्थानाभिव्यक्तनामरूपाभिव्य- | में अव्यक्तरूपसे स्थित नाम-रूपोंकी | अभिव्यक्तिके द्वारा ही [ यह अनेक क्त्या । यदात्मस्थे अनभि- | रूप होना है ] । जिस समय व्यक्ते नामरूपे व्याक्रियेते तदा | आत्मामें स्थित अव्यक्त नाम और नामरूपे आत्मस्वरूपापरित्यागे- | रूपोंको व्यक्त किया जाता है उस | समय वे अपने स्वरूपका त्याग किये नैव ब्रह्मणाप्रविभक्तदेशकाले | बिना ही समस्त अवस्थाओंमें ब्रह्मसे सर्वावस्थासु व्याक्रियेते तदा | अभिन्न देश और कालमें ही व्यक्त | किये जाते हैं । यह नाम-रूपका तन्नामरूपव्याकरणं ब्रह्मणो बहु- | व्यक्त करना ही ब्रह्मका बहुत होना भवनम् । नान्यथा निरवयवस्य | है । इसके सिवा और किसी प्रकार | निरवयव ब्रह्मका बहुत अथवा अल्प ब्रह्मणो बहुत्वपत्तिरुपपद्यतेऽल्प- | होना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१

त्वं वा । यथाकाशस्याल्पत्वं बहु- | कि आकाशका अल्पत्व और बहुत्व | भी अन्य वस्तुके ही अधीन है त्वं च वस्त्वन्तरकृतमेव । अतस्त- | [उसी प्रकार ब्रह्मका भी है] । अतः | उन (नाम-रूपों) के द्वारा ही ब्रह्म द्द्वारेणैवात्मा बहु भवति । | बहुत हो जाता है । न ह्यात्मनोऽन्यदनात्मभूतं | आत्मासे भिन्न अनात्मभूत, तथा | उससे भिन्न देश-कालमें रहनेवाली तत्प्रविभक्तदेशकालं सूक्ष्मं व्यव- | कोई भी सूक्ष्म, व्यवहित (ओटवाली), | दूरस्थ, अथवा भूत, वर्तमान या भविष्यकालीन हितं विप्रकृष्टं भूतं भवद्भविष्यद्वा | वस्तु नहीं है । अतः सम्पूर्ण वस्तु विद्यते । अतो नामरूपे | अवस्थाओंसे सम्बन्धित नाम और सर्वावस्थे ब्रह्मणैवात्मवती, न | रूप ब्रह्मसे ही आत्मवान् हैं, किन्तु ब्रह्म तदात्मकम् । ते तत्प्रत्या- | ब्रह्म तद्रूप नहीं है । ब्रह्मका निषेध ख्याने न स्त एवेति तदात्मके | करनेपर वे रह ही नहीं सकते, | इसीसे वे तद्रूप कहे जाते हैं । उन उच्येते । ताभ्यां चोपाधिभ्यां | उपाधियोंसे ही ब्रह्म ज्ञाता, ज्ञेय और | ज्ञान-इन शब्दोंका तथा इनके अर्थ ज्ञातृज्ञेयज्ञानशब्दार्थादिसर्वसं- | आदि सब प्रकारके व्यवहारका पात्र व्यवहारभाग्ब्रह्म । | बनता है । स आत्मैवंकामः संस्तपो- | उस आत्माने ऐसी कामनावाला ऽतप्यत । तप इति ज्ञानमुच्यते । | होकर तप किया । 'तप' शब्दसे | यहाँ ज्ञान कहा जाता है, जैसा कि “यस्य ज्ञानमयं तपः” ( मु० उ० | “जिसका ज्ञानरूप तप है” इस अन्य १ । १ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । | श्रुतिसे सिद्ध होता है । आप्तकाम | होनेके कारण आत्माके लिये अन्य आप्तकामताच्चेतरस्यासंभव एव | तप तो असम्भव ही हैं । 'उसने तपसः । तत्तपोऽतप्यत तप्तवान् । | तप किया' इसका तात्पर्य यह है तै० उ० २१-२२- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१६२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ सृज्यमानजगद्रचनादिविषयामा- कि आत्माने रचे जानेवाले जगत्की लोचनामकरोदात्मेत्यर्थः । रचना आदिके विषयमें आलोचना की । स एवमालोच्य तपस्तप्त्वा इस प्रकार आलोचना अर्थात् तप प्राणिकर्मादिनिमित्तानुरूपमिदं करके उसने प्राणियोंके कर्मादि निमित्तोंके अनुरूप इस सम्पूर्ण सर्वं जगद्देशतः कालतो नाम्ना जगत्को रचा, जो देश, काल, रूपेण च यथानुभवं सर्वैः नाम और रूपसे यथानुभव सारी प्राणिभिः सर्वावस्थैरनुभूयमानम- अवस्थाओंमें स्थित सभी प्राणियोंद्वारा अनुभव किया जाता है । यह जो सृजत सृष्टवान् । यदिदं किं च कुछ है अर्थात् सामान्यरूपसे यह यत्किं चेदमविशिष्टम् । तदिदं जो कुछ जगत् है इसे रचकर उसने जगत्सृष्ट्वा किमकरोदित्युच्यते- क्या किया, सो बतलाते हैं—वह उस रचे हुए जगत्में ही अनुप्रविष्ट तदेव सृष्टं जगदनुप्राविशदिति । हो गया । तत्रैतच्चिन्त्यं कथमनुप्राविश- अब यहाँ यह विचारना है कि उसने किस प्रकार अनुप्रवेश किया ? तस्य जगदनु- दिति । किं यः जो स्रष्टा था, क्या उसने स्वस्वरूपसे प्रवेशः स्रष्टा स तेनैवात्म- ही अनुप्रवेश किया अथवा किसी और रूपसे ? इनमें कौन-सा पक्ष नानुपाविशदुतान्येनेति, किं ता- समीचीन है ? श्रुतिमें [ 'सृष्ट्वा' इस क्रियामें ] 'क्त्वा' प्रत्यय होनेसे तो वद्युक्तम् ? क्त्वाप्रत्ययश्रवणाद्यः यही ठीक जान पड़ता है कि जो स्रष्टा स्रष्टा स एवानुप्राविशदिति । था उसीने पीछे प्रवेश भी किया । *

  • 'क्त्वा' प्रत्यय पूर्वकालिक क्रियामें हुआ करता है । हिन्दीमें इसी अर्थमें 'कर' या 'के' प्रत्यय होता है; जैसे—'रामने श्यामको बुलाकर [ या बुलाके ] धमकाया ।' इसमें यह नियम होता है कि पूर्वकालिक क्रिया और मुख्य क्रियाका कर्ता एक ही होता है; जैसे कि उपर्युक्त वाक्यमें पूर्वकालिक क्रिया 'बुलाकर' तथा मुख्य क्रिया 'धमकाया' इन दोनोंका कर्ता 'राम' ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६३

ननु न युक्तं मृद्वच्चेतत्कारणं पूर्व०-यदि ब्रह्म मृत्तिकाके ब्रह्म तदात्मकत्वात्कार्यस्य । का- समान जगत्का कारण है तो उसका कार्य तद्रूप होनेके कारण रणमेव हि कार्यात्मना परिणत- उसमें उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है। क्योंकि कारण ही कार्यरूप- मित्यतोऽप्रविष्ट इव कार्योत्पत्ते- से परिणत हुआ करता है, अतः किसी अन्य पदार्थके समान पहले रूर्ध्वं पृथक्कारणस्य पुनः प्रवेशो- बिना प्रवेश किये कार्यकी उत्पत्तिके ऽनुपपन्नः । न हि घटपरिणाम- अनन्तर उसमें कारणका पुनः प्रवेश करना सर्वथा असम्भव है। घटरूप- व्यतिरेकेण मृदो घटे प्रवेशो- में परिणत होनेके सिवा मृत्तिकाका घटमें और कोई प्रवेश नहीं हुआ ऽस्ति । यथा घटे चूर्णात्मना करता। हाँ, जिस प्रकार घटमें चूर्ण मृदोऽनुप्रवेश एवमन्येनात्मना (बालू) रूपसे मृत्तिकाका अनु- प्रवेश होता है उसी प्रकार किसी नामरूपकार्येऽनुप्रवेश आत्मन इति अन्य रूपसे आत्माका नाम-रूप कार्यमें चेच्छ्रुत्यन्तराच्च "अनेन जीवेना- भी अनुप्रवेश हो सकता है; जैसा कि "इस जीवरूपसे अनुप्रवेश करके" त्मनानुप्रविश्य" ( छा० उ० ६ । इस अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है ३ । २ ) इति । —यदि ऐसा मानें तो ?

नैवं युक्तमेकत्वाद्व्रह्मणः । मृ- सिद्धान्ती-ऐसा मानना उचित नहीं है; क्योंकि ब्रह्म तो एक ही दात्मनस्त्वनेकत्वात्सावयवत्वाच्च है। मृत्तिकारूप कारण तो अनेक और सावयव होनेके कारण उसका युक्तो घटे मृदश्चूर्णात्मनानु- घटमें चूर्णरूपसे अनुप्रवेश करना भी सम्भव है; क्योंकि मृत्तिकाके चूर्णका प्रवेशः । मृदश्चूर्णस्याप्रविष्टदेश- उस देशमें प्रवेश नहीं है; किन्तु वत्त्वाच्च । न त्वात्मन एकत्वे आत्मा तो एक है, अतः उसके

इसी प्रकार 'अनुप्राविशत्' और 'सृष्ट्वा' इन दोनों क्रियाओंका कर्ता भी ब्रह्म ही होना चाहिये ।

१६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१६४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ सति निरवयवत्वादप्रविष्टदेशा- | निरवयव और उससे अप्रविष्ट देशका भावाच्च प्रवेश उपपद्यते । कथं | अभाव होनेके कारण उसका प्रवेश करना सम्भव नहीं है । तो फिर उसका तर्हि प्रवेशः स्यात् ? युक्तश्च प्रवेशः | प्रवेश कैसे होना चाहिये ? तथा उसका प्रवेश होना उचित ही है; श्रुतत्वात्तदेवानुप्राविशदिति । | क्योंकि 'उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया' ऐसी श्रुति है । सावयवमेवास्तु तर्हि । साव- | पूर्व०-तब तो ब्रह्म सावयव ही यवत्वान्मुखे हस्तप्रवेशवन्नाम- | होना चाहिये । उस अवस्थामें, सावयव होनेके कारण मुखमें हाथका रूपकार्ये जीवात्मनानुप्रवेशो युक्त | प्रवेश होनेके समान उसका नाम-रूप कार्यमें जीवरूपसे प्रवेश होना ठीक एवेति चेत् ? | ही होगा-यदि ऐसा कहें तो ? नाशून्यदेशत्वात् । न हि | सिद्धान्ती-नहीं; क्योंकि उससे कार्यात्मना परिणतस्य नाम- | शून्य कोई देश नहीं है । कार्य-रूपमें परिणत हुए ब्रह्मका नाम-रूप रूपकार्यदेशव्यतिरेकेणात्मशून्यः | कार्यके देशसे अतिरिक्त और कोई अपनेसे शून्य देश नहीं है, जिसमें प्रदेशोऽस्ति यं प्रविशेज्जीवात्मना । | उसका जीवरूपसे प्रवेश करना सम्भव हो । और यदि यह मानो कारणमेव चेत्प्रविशेज्जीवात्मत्वं | कि जीवात्माने कारणमें ही प्रवेश किया तब तो वह अपने जीवत्वको जह्याद्यथा घटो मृत्प्रवेशे घटत्वं | ही त्याग देगा, जिस प्रकार कि घड़ा मृत्तिकामें प्रवेश करनेपर जहाति । तदेवानुप्राविशदिति | अपना घटत्व त्याग देता है । तथा 'उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया' इस च श्रुतेर्न कारणानुप्रवेशो युक्तः । | श्रुतिसे भी कारणमें अनुप्रवेश करना सम्भव नहीं है ।

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अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६५

[संस्कृत-मूल]
कार्यान्तरमेव स्यादिति चेत् ?
तदेवानुप्राविशदिति जीवात्मरूपं
कार्यं नामरूपपरिणतं कार्यान्तर-
मेवापद्यत इति चेत् ?
न; विरोधात् । न हि घटो
घटान्तरमापद्यते । व्यतिरेक-
श्रुतिविरोधाच्च । जीवस्य नाम-
रूपकार्यव्यतिरेकानुवादिन्यः
श्रुतयो विरुध्येरन् । तदापत्तौ
मोक्षासंभवाच्च । न हि यतो
मुच्यमानस्तदेवापद्यते । न हि
शृङ्खलापत्तिर्बद्धस्य तस्करादेः ।
बाह्यान्तर्भेदेन परिणतमिति
चेत्तदेव कारणं ब्रह्म शरीराद्या-
धारत्वेन तदन्तर्जीवात्मनाधेय-
त्वेन च परिणतमिति चेत् ?

  • अर्थात् जीवको तो नाम-रूपात्मक कार्यसे मुक्त होना इष्ट है, फिर वह उसीको क्यों प्राप्त होगा ?

१६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१६६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ न; बहिःष्ठस्य प्रवेशोपपत्तेः। न | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि प्रवेश हि यो यस्यानतःस्थः स एव | बाहर रहनेवाले पदार्थका ही हो सकता है । जो जिसके भीतर तत्प्रविष्ट उच्यते । बहिःष्ठस्यानु- | स्थित है वह उसमें प्रविष्ट हुआ नहीं कहा जाता । अनुप्रवेश प्रवेशः स्यात्प्रवेशशब्दार्थस्यैवं | तो बाहर रहनेवाले पदार्थका ही हो सकता है; क्योंकि 'प्रवेश' दृष्टत्वात् । यथा गृहं कृत्वा | शब्दका अर्थ ऐसा ही देखा गया प्राविशदिति । | है; जैसे कि 'घर बनाकर उसमें प्रवेश किया' इस वाक्यमें । जलसूर्यकादिप्रतिविम्बवत्प्र- | यदि कहो कि जलमें सूर्यके वेशः स्यादिति चेन्न; अपरिच्छि- | प्रतिबिम्ब आदिके समान उसका प्रवेश हो सकता है, तो ऐसा न्नत्वादमूर्तत्वाच्च । परिच्छिन्नस्य | कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि ब्रह्म अपरिच्छिन्न और अमूर्त है । परि- मूर्तस्यान्यस्यान्यत्र प्रसादस्व- | च्छिन्न और मूर्तरूप अन्य पदार्थोंका भावके जलादौ सूर्यकादिप्रतिवि- | ही स्वच्छस्वभाव जल आदि अन्य पदार्थोंमें सूर्यकादिरूप प्रतिबिम्ब म्बोदयः स्यात् । न त्वात्मनः, | पड़ा करता है; किन्तु आत्माका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता; क्योंकि अमूर्तत्वादाकाशादिकारणस्या- | वह अमूर्त है तथा आकाशादिका त्मनो व्यापकत्वात् । तद्विप्रकृष्ट- | कारणरूप आत्मा व्यापक भी है । उससे दूर देशमें स्थित प्रतिबिम्बकी देशप्रतिविम्बाधारवस्त्वन्तराभा- | आधारभूत अन्य वस्तुका अभाव वाच्च प्रतिविम्बवत्प्रवेशो न | होनेसे भी उसका प्रतिबिम्बके समान प्रवेश होना सम्भव नहीं है । युक्तः । एवं तर्हि नैवास्ति प्रवेशो न | पूर्व०-तब तो आत्माका प्रवेश होता ही नहीं-इसके सिवा च गत्यन्तरमुपलभामहे 'तदे- | 'तदेवानुप्राविशत्' इस श्रुतिकी और

[अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६७


[मूल/संस्कृत-स्तम्भः]

वानुप्राविशत्' इति श्रुतेः। श्रुतिश्च नोऽतीन्द्रियविषये विज्ञा- नोत्पत्तौ निमित्तम्। न चास्मा- द्वाक्याद्यत्नवतामपि विज्ञानमु- त्पद्यते। हन्त तर्ह्यनर्थकत्वादपो- ह्यमेतद्वाक्यम् 'तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत्' इति। न, अन्यार्थत्वात्। किमर्थ- मस्थाने चर्चा। प्रकृतो ह्यन्यो विवक्षितोऽस्य वाक्यस्यार्थोऽस्ति स स्मर्तव्यः। "ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै० उ० २।१।१) "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० उ० २।१।१) "यो वेद निहितं गुहायाम्" (तै० उ० २।१।१) इति तद्विज्ञानं च विवक्षितं प्रकृतं च तत्। ब्रह्मस्वरूपानुगमाय चाकाशाद्य- न्नमयान्तं कार्यं प्रदर्शितं ब्रह्मा- नुगमश्चारब्धः। तत्रान्नमयादा- त्मनोऽन्योऽन्तर आत्मा प्राण-


[हिन्दी-भाष्यार्थ-स्तम्भः]

कोई गति दिखायी नहीं देती। हमारे (मीमांसकोंके) सिद्धान्ता- नुसार इन्द्रियातीत विषयोंका ज्ञान होनेमें श्रुति ही कारण है। किन्तु इस वाक्यसे बहुत यत्न करनेपर भी किसी प्रकारका ज्ञान उत्पन्न नहीं होता। अतः खेद है कि 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' यह वाक्य अर्थशून्य होनेके कारण त्यागने ही योग्य है। सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि इस वाक्यका अर्थ अन्य ही है। इस प्रकार अप्रासङ्गिक चर्चा क्यों करते हो? इस प्रसंगमें इस वाक्य- को और ही अर्थ कहना अभीष्ट है। उसीको स्मरण करना चाहिये। "ब्रह्म- वेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता है" "ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है" "जो उसे बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ जानता है" इत्यादि वाक्योंद्वारा जिसका निरूपण किया गया है उस ब्रह्मका ही विज्ञान यहाँ बतलाना अभीष्ट है और उसीका यहाँ प्रसङ्ग भी है। ब्रह्मके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये ही आकाशसे लेकर अन्नमयकोशपर्यन्त सम्पूर्ण कार्य- वर्ग दिखलाया गया है तथा ब्रह्मा- नुभवका प्रसङ्ग भी चल ही रहा है। उसमें अन्नमय आत्मासे भिन्न दूसरा अन्तरात्मा प्राणमय है,

१६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१६८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ मयस्तदन्तर्मनोमयो विज्ञानमय | उसका अन्तर्वर्ती मनोमय और फिर इति विज्ञानगुहायां प्रवेशितस्तत्र | विज्ञानमय है । इस प्रकार आत्माका चानन्दमयो विशिष्ट आत्मा | विज्ञानगुहामें प्रवेश करा दिया गया प्रदर्शितः । | है और वहाँ आनन्दमय ऐसे विशिष्ट | आत्माको प्रदर्शित किया गया है । अतः परमानन्दमयलिङ्गाधि- | इसके आगे आनन्दमय-इस गमद्वारेणानन्दविवृद्ध्यवसान | लिङ्गके ज्ञानद्वारा आनन्दके उत्कर्ष- आत्मा ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा सर्व- | का अवसानभूत आत्मा जो सम्पूर्ण विकल्पास्पदो निर्विकल्पोऽस्या- | विकल्पका आश्रयभूत एवं निर्विकल्प मेव गुहायामधिगन्तव्य इति | ब्रह्म है तथा [ आनन्दमय कोशकी ] तत्प्रवेशः प्रकल्प्यते । न ह्यन्य- | पुच्छ प्रतिष्ठा है, वह इस गुहामें ही त्रोपलभ्यते ब्रह्म निर्विशेषत्वात् । | अनुभव किये जाने योग्य है- विशेषसंबन्धो ह्युपलब्धिहेतु- | इसलिये उसके प्रवेशकी कल्पना र्दृष्टः, यथा राहेश्चन्द्रार्कविशिष्ट- | की गयी है । निर्विशेष होनेके कारण संबन्धः । एवमन्तःकरणगुहात्म- | ब्रह्म [ बुद्धिरूप गुहाके सिवा ] और संबन्धो ब्रह्मण उपलब्धिहेतुः । | कहीं उपलब्ध नहीं होता; क्योंकि संनिकर्षादवभासात्मकत्वाच्चान्तः- | विशेषका सम्बन्ध ही उपलब्धिमें हेतु करणस्य । | देखा गया है, जिस प्रकार कि राहु- | की उपलब्धिमें चन्द्रमा अथवा सूर्य- | रूप विशेषका सम्बन्ध । इस प्रकार | अन्तःकरणरूप गुहा और आत्मा- | का सम्बन्ध ही ब्रह्मकी उपलब्धिका | हेतु है; क्योंकि अन्तःकरण उसका | समीपवर्ती और प्रकाशस्वरूप* है । ※ जिस प्रकार अन्धकार और प्रकाश दोनों ही जड हैं, तथापि प्रकाश अन्धकाररूप आवरणको दूर करनेमें समर्थ है, इसी प्रकार यद्यपि अज्ञान और अन्तःकरण दोनों ही समानरूपसे जड हैं तो भी प्रत्यय ( विभिन्न प्रतीतियोंके ) रूपमें परिणत हुआ अन्तःकरण अज्ञानका नाश करनेमें समर्थ है और इस प्रकार वह आत्माका प्रकाशक ( ज्ञान करानेवाला ) है । इसी बातको आगेके भाष्यसे स्पष्ट करते हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६९ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ यथा चालोकविशिष्टा घटा- | जिस प्रकार कि प्रकाशयुक्त द्युपलब्धिरेवं बुद्धिप्रत्ययालोक- | घटादिकी उपलब्धि होती है उसी विशिष्टात्मोपलब्धिः स्यात्तस्मा- | प्रकार बुद्धिके प्रत्ययरूप प्रकाशसे दुपलब्धिहेतौ गुहायां निहित- | युक्त आत्माका अनुभव होता है । मिति प्रकृतमेव । तद्वृत्तिस्थ्या- | अतः उपलब्धिकी हेतुभूत गुहामें नीये त्विह पुनस्तत्सृष्ट्वा तदेवा- | वह निहित है—इसी बातका यह नुप्राविशदित्युच्यते । | प्रसङ्ग है । उसकी वृत्ति (व्याख्या) | के रूपमें ही श्रुतिद्वारा 'उसे रचकर | वह पीछेसे उसीमें प्रवेश कर गया' | ऐसा कहा गया है । तदेवेदमाकाशादिकारणं कार्यं | इस प्रकार इस कार्यवर्गको सृष्ट्वा तदनुप्रविष्टमिवान्तर्गुहायां | रचकर इसमें अनुप्रविष्ट-सा हुआ बुद्धौ द्रष्टृ श्रोतॄ मन्तृ विज्ञातृत्वेनेवं | आकाशादिका कारणरूप वह ब्रह्म विशेषवदुपलभ्यते । स एव तस्य | ही बुद्धिरूप गुहामें द्रष्टा, श्रोता, प्रवेशस्तस्मादस्ति तत्कारणं ब्रह्म । | मन्ता और विज्ञाता—ऐसा सविशेष- | रूप-सा जान पड़ता है । यही | उसका प्रवेश करना है । अतः | वह ब्रह्म कारण है; इसलिये उसका | अस्तित्व होनेके कारण उसे 'है' अतोऽस्तित्वादस्तीत्येवोपलब्धव्यं | इस प्रकार ही ग्रहण करना चाहिये । तत् । | तत्कार्यमनुप्रविश्य, किम् ? | उसने कार्यमें अनुप्रवेश करके | फिर क्या किया ? वह सत्—मूर्त तस्य सच्च मूर्तं त्यच्चामूर्त- | और असत्—अमूर्त हो गया । जिन- सर्वात्म्यम् मभवत् । मूर्तामूर्ते | के नाम और रूपकी अभिव्यक्ति ह्यव्याकृतनामरूपे आत्मस्थे | नहीं हुई है, वे मूर्त और अमूर्त तो | आत्मामें ही रहते हैं । उन 'मूर्त' अन्तर्गतैनात्मना व्याक्रियेते | एवं 'अमूर्त' शब्दवाच्य पदार्थोंको | उनका अन्तर्वर्ती आत्मा केवल व्याकृते मूर्तामूर्तशब्दवाच्ये । ते | अभिव्यक्त कर देता है । उनके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ आत्मना त्वप्रविभक्तदेशकाले | देश और काल आत्मासे अभिन्न हैं इति कृत्वात्मा ते अभवदित्यु- | —इसीलिये ‘आत्मा ही मूर्त और च्यते । | अमूर्त हुआ’ ऐसा कहा जाता है । किं च निरुक्तं चानिरुक्तं च । | तथा वही निरुक्त और अनिरुक्त | भी हुआ । निरुक्त उसे कहते हैं निरुक्तं नाम निष्कृष्य समाना- | जिसे सजातीय और विजातीय समानजातीयेभ्यो देशकाल- | पदार्थोंसे अलग करके देश-काल- | विशिष्टरूपसे ‘वह यह है’ ऐसा विशिष्टतयेदं तदित्युक्तमनिरुक्तं | कहा जाय । इससे विपरीत लक्षणों- तद्विपरीतं निरुक्तानिरुक्ते अपि | वालेको ‘अनिरुक्त’ कहते हैं । | निरुक्त और अनिरुक्त भी मूर्त और मूर्तामूर्तयोरेव विशेषणे । यथा | अमूर्तके ही विशेषण हैं । जिस | प्रकार ‘सत्’ और ‘त्यत्’ क्रमशः सच्च त्यच्च प्रत्यक्षपरोक्षे, तथा | ‘प्रत्यक्ष’ और ‘परोक्ष’ को कहते हैं निलयनं चानिलयनं च । निल- | उसी प्रकार ‘निलयन’ और ‘अनि- | लयन’ भी समझने चाहिये । यनं नीडमाश्रयो मूर्तस्यैव धर्मः । | निलयन-—नीड अर्थात् आश्रय अनिलयनं तद्विपरीतममूर्तस्यैव | मूर्तका ही धर्म है और उससे | विपरीत अनिलयन अमूर्तका ही धर्मः । | धर्म है । त्यदनिरुक्तानिलयनान्यमूर्त- | त्यत्, अनिरुक्त और अनिलयन— धर्मत्वेऽपि व्याकृतविषयाण्येव । | ये अमूर्तके धर्म होनेपर भी व्याकृत | ( व्यक्त ) से ही सम्बन्ध रखनेवाले सर्गोत्तरकालभावश्रवणात् । त्य- | हैं; क्योंकि इनकी सत्ता सृष्टिके दिति प्राणाद्यनिरुक्तं तदेवानि- | अनन्तर ही सुनी गयी है । त्यत्— | यह प्राणादि अनिरुक्तका नाम है; लयनं च । अतो विशेषणान्य- | वही अनिलयन भी है । अतः ये CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७१ मूर्तस्य व्याकृतविषयाण्येवैतानि । | अमूर्तके विशेषण व्याकृतविषयक | ही हैं । विज्ञानं चेतनमविज्ञानं | विज्ञान यानी चेतन, अविज्ञान- तद्रहितमचेतनं पाषाणादि सत्यं | उससे रहित अचेतन पाषाणादि | और सत्य-व्यवहारसम्बन्धी सत्य; च व्यवहारविषयमधिकारात्न | क्योंकि यहाँ व्यवहारका ही प्रसंग परमार्थसत्यम् । एकमेव हि | है, परमार्थ सत्य नहीं; परमार्थ सत्य | तो एकमात्र ब्रह्म ही है; यहाँ तो परमार्थसत्यं ब्रह्म । इह पुन- | केवल व्यवहारविषयक आपेक्षिक | सत्यसे ही तात्पर्य है, जैसे कि र्व्यवहारविषयमापेक्षिकं सत्यम्, | मृगतृष्णा आदि असत्यकी अपेक्षासे मृगतृष्णिकाद्यनृतापेक्षयोदकादि | जल आदिको सत्य कहा जाता है सत्यमुच्यते । अनृतं च तद्विप- | तथा अनृत-उस (व्यावहारिक | सत्य ) से विपरीत । सो फिर रीतम्। किं पुनः ? एतत्सर्वमभवत्, | क्या ? ये सब वह सत्य--परमार्थ सत्यं परमार्थसत्यम् । किं | सत्य ही हो गया । वह परमार्थ पुनस्तत् ? ब्रह्म, सत्यं ज्ञानमनन्तं | सत्य है क्या ? वह ब्रह्म है; क्योंकि | 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान एवं अनन्त है' ब्रह्मेति प्रकृतत्वात् । | इस प्रकार उसीका प्रकरण है । यस्मात्सच्चदादिकं मूर्तामूर्त- | क्योंकि सत्-त्यत् आदि जो कुछ धर्मजातं यत्किंचेदं सर्वमविशिष्टं | मूर्त-अमूर्त धर्मजात है वह सामान्य- | रूपसे सारा ही विकार एकमात्र विकारजातमेकमेव सच्छब्दवाच्यं | 'सत्' शब्दवाच्य ब्रह्म ही हुआ है- ब्रह्माभवत्तद्व्यतिरेकेणाभावान्ना- | क्योंकि उससे भिन्न नाम-रूप विकार- | का सर्वथा अभाव है-इसलिये ब्रह्म- मरूपविकारस्य, तस्मात्तद्ब्रह्म | वादीलोग उस ब्रह्मको 'सत्य' ऐसा सत्यमित्याचक्षते ब्रह्मविदः । | कहकर पुकारते हैं । अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नः प्रकृत- | 'ब्रह्म है या नहीं' इस अनुप्रश्नका स्तस्य प्रतिवचनविषय एतदुक्त- | यहाँ प्रसंग था । उसके उत्तरमें यह CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१७२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


मात्माकामयत बहु स्यामिति । स | कहा गया था—'आत्माने कामना की यथाकामं चाकाशादिकार्यं सच्च- | कि मैं बहुत हो जाऊँ' । वह अपनी दादिलक्षणं सृष्ट्वा तदनु प्रविश्य | कामनाके अनुसार सत् त्यत् आदि पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन् | लक्षणोंवाले आकाशादि कार्यवर्गको बहुभवत्तस्मात्तदेवेदमाकाशादि- | रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हो द्रष्टा, कारणं कार्यस्थं परमे व्योमन् | श्रोता, मन्ता और विज्ञातारूपसे हृदयगुहायां निहितं तत्प्रत्ययाव- | बहुत हो गया । अतः आकाशादि- भासविशेषेणोपलभ्यमानमस्ति | के कारण, कार्यवर्गमें स्थित, इत्येवं विजानीयादित्युक्तं भवति । | परमाकाशके भीतर बुद्धिरूप गुहामें छिपे हुए और उसके कर्त्ता-भोक्तादि- तदेतस्मिन्नर्थे ब्राह्मणोक्त एष | रूप जो प्रत्ययावभास हैं उनके द्वारा श्लोको मन्त्रो भवति । यथा | विशेषरूपसे उपलब्ध होनेवाले उस पूर्वेषु अन्नमयाद्यात्मप्रकाशकाः | ब्रह्मको ही 'वह है' इस प्रकार जाने- पञ्चस्वप्येवं सर्वान्तरतमात्मास्ति- | ऐसा कहा गया । त्वप्रकाशकोऽपि मन्त्रः कार्य- | उस इस ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही द्वारेण भवति ॥ १ ॥ | यह श्लोक यानी मन्त्र है । जिस प्रकार पूर्वोक्त पाँच पर्यायोंमें अन्नमय आदि कोशोंके प्रकाशक श्लोक थे उसी प्रकार सबकी अपेक्षा आन्तरतम आत्माके अस्तित्वको उसके कार्यद्वारा प्रकाशित करनेवाला भी यह मन्त्र है ॥ १ ॥


इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥ ६ ॥