तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
सप्तम अनुवाक
ब्रह्मकी सुकृतता एवं आनन्दरूपताका तथा ब्रह्मवेत्ताकी अभयप्राप्तिका वर्णन असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानँस्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति । यद्वै तत्सुकृतं रसो वै सः । रसँह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति । को ह्येवान्यात्कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति । यदा ह्येवैष एत- स्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदर- मन्तरं कुरुते । अथ तस्य भयं भवति । तत्त्वेव भयं विदुषो मन्वानस्य । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ पहले यह [ जगत् ] असत् (अव्याकृत ब्रह्मरूप) ही था । उसीसे सत् (नाम-रूपात्मक व्यक्त) की उत्पत्ति हुई । उस असत्ने स्वयं अपनेको ही [ नाम-रूपात्मक जगद्रूपसे ] रचा । इसलिये वह सुकृत (स्वयं रचा हुआ) कहा जाता है । वह जो प्रसिद्ध सुकृत है सो निश्चय रस ही है । इस रसको पाकर पुरुष आनन्दी हो जाता है । यदि हृदयाकाशमें स्थित यह आनन्द (आनन्दस्वरूप आत्मा) न होता तो कौन व्यक्ति अपान-क्रिया करता और कौन प्राणन-क्रिया करता ? यही तो उन्हें आनन्दित करता है । जिस समय यह साधक इस अदृश्य अशरीर, अनिर्वाच्य और निराधार ब्रह्ममें अभय-स्थिति प्राप्त करता है उस
१७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१७४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ समय यह अभयको प्राप्त हो जाता है; और जब यह इसमें थोड़ा-सा भी भेद करता है तो इसे भय प्राप्त होता है। वह ब्रह्म ही भेददर्शी विद्वान्के लिये भयरूप है। इसी अर्थमें यह श्लोक है ॥ १ ॥
[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]
असद्वा इदमग्र आसीत् । (टिप्पणी: असच्छब्दवाच्याव्याकृताज्जगदुत्पत्तिः) असदिति व्याकृत- नामरूपविशेषविप- रीतरूपमव्याकृतं ब्रह्मोच्यते । न पुनरत्यन्तमेवा- सत् । न ह्यसतः सज्जन्मास्ति इदमिति नामरूपविशेषवद्व्याकृतं जगदग्रे पूर्वं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मैवास- च्छब्दवाच्यमासीत् । ततोऽसतो वै सत्प्रविभक्तनामरूपविशेष- मजायतोत्पन्नम् । किं ततः प्रविभक्तं कार्यमिति पितुरिव पुत्रः, नेत्याह । तदस- च्छब्दवाच्यं स्वयमेवात्मानमेवा- कुरुत कृतवत् । यस्मादेवं तस्मा- द्ब्रह्मैव सुकृतं स्वयंकर्तृच्यते । स्वयंकर्तृ ब्रह्मेति प्रसिद्धं लोके सर्वकारणत्वात् ।
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद एवं व्याख्या]
पहले यह [ जगत् ] असत् ही था। 'असत्' इस शब्दसे, जिनके नाम-रूप व्यक्त हो गये हैं उन विशेष पदार्थोंसे विपरीत स्वभाववाला अव्याकृत ब्रह्म कहा जाता है। इससे [ वन्ध्यापुत्रादि ] अत्यन्त असत् पदार्थ बतलाये जाने अभीष्ट नहीं हैं; क्योंकि असत्से सत्का जन्म नहीं हो सकता । 'इदम्' अर्थात् नाम-रूप विशेषसे युक्त व्याकृत जगत् अग्रे—पहले अर्थात् उत्पत्तिसे पूर्व 'असत्' शब्दवाच्य ब्रह्म ही था । उस असत्से ही सत् यानी जिसके नाम-रूपका विभाग हो गया है उस विशेषकी उत्पत्ति हुई । तो क्या पितासे पुत्रके समान यह कार्यवर्ग उस [ ब्रह्म ] से विभिन्न है ? इसपर श्रुति कहती है—नहीं; उस 'असत्' शब्दवाच्य ब्रह्मने स्वयं अपनेको ही रचा । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये वह ब्रह्म ही सुकृत अर्थात् स्वयंकर्ता कहा जाता है; सबका कारण होनेसे ब्रह्म स्वयं कर्ता है—यह बात लोकमें प्रसिद्ध है ।
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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७५ यस्माद्वा स्वयमकरोत्सर्वं अथवा, क्योंकि सर्वरूप होने- से ब्रह्मने स्वयं ही इस सम्पूर्ण सर्वात्मना तस्मात्पुण्यरूपेणापि जगत्की रचना की है, इसलिये पुण्यरूपसे भी उसका कारणरूप तदेव ब्रह्म कारणं सुकृतमुच्यते । वह ब्रह्म 'सुकृत' कहा जाता है। लोकमें जो कार्य [ पुण्य अथवा सर्वथापि तु फलसंबन्धादि- पाप ] किसी भी प्रकारसे फलके कारणं सुकृतशब्दवाच्यं प्रसिद्धं सम्बन्ध आदिका कारण होता है वही 'सुकृत' शब्दके वाच्यरूपसे प्रसिद्ध लोके । यदि पुण्यं यदि वान्यत्तसा होता है। वह प्रसिद्धि चाहे पुण्य- रूपा हो और चाहे पापरूपा किसी प्रसिद्धिर्नित्ये चेतनवत्कारणे नित्य और सचेतन कारणके होनेपर ही हो सकती है । अतः उस सत्युपपद्यते । तस्मादस्ति तद्ब्रह्म सुकृतरूप प्रसिद्धिकी सत्ता होनेसे यह सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म है। सुकृतप्रसिद्धेः । इतश्चास्ति । ब्रह्म इसलिये भी है; किस लिये ? रस- स्वरूप होनेके कारण । ब्रह्मकी कुतः ? रसत्वात् । कुतो रसत्व- रसरूपताकी प्रसिद्धि किस कारण- से है-इसपर श्रुति कहती है— सिद्धिर्ब्रह्मण इत्यत आह— यद्वै तत्सुकृतम् । रसो वै जो भी वह प्रसिद्ध सुकृत है वह ब्रह्मगो सः । रसो नाम निश्चय रस ही है । खट्टा-मीठा रसरूपत्वम् तृप्तिहेतुरानन्दकरो आदि तृप्तिदायक और आनन्दप्रद पदार्थ लोकमें 'रस' नामसे प्रसिद्ध मधुराम्लादिः प्रसिद्धो लोके है ही । इस रसको ही पाकर पुरुष रसमेवायं लब्ध्वा प्राप्यानन्दी आनन्दी अर्थात् सुखी हो जाता है। लोकमें किसी असत् पदार्थकी सुखी भवति । नासत आनन्द- आनन्दहेतुता कभी नहीं देखी गयी । हेतुत्वं दृष्टं लोके । बाह्यानन्द- ब्रह्मनिष्ठ निरीह और निरपेक्ष विद्वान् साधनरहिता अप्यनीहा निरषणा बाह्यसुखके साधनसे रहित होनेपर
१७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१७६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ ब्राह्मणा बाह्यरसलाभादिव सा- | भी बाह्य रसके लाभसे आनन्दित नन्दा दृश्यन्ते विद्वांसः; नूनं | होनेके समान आनन्दयुक्त देखे जाते | हैं । निश्चय उनका रस ब्रह्म ही है । ब्रह्मैव रसस्तेषाम् । तस्मादस्ति | अतः रसके समान उनके आनन्दका तत्तेषामानन्दकारणं रसवद्ब्रह्म । | कारणरूप वह ब्रह्म है ही । इतश्चास्ति; कुतः ? प्राणनादि- | इसलिये भी ब्रह्म है; किसलिये ? | प्राणनादि क्रियाके देखे जानेसे । क्रियादर्शनात् । अयमपि हि | जीवित पुरुषका यह पिण्ड भी प्राणकी | सहायतासे प्राणन करता है और पिण्डो जीवतः प्राणेन प्राणित्य- | अपान वायुके द्वारा अपानक्रिया | करता है । इसी प्रकार संघातको पानेनापानिति । एवं वायवीया | प्राप्त हुए इन शरीर और इन्द्रियोंके | द्वारा निष्पन्न होती हुई और भी ऐन्द्रियकाश्च चेष्टाः संहतैः कार्य- | वायु और इन्द्रियसम्बन्धिनी चेष्टाएँ | देखी जाती हैं । वह वायु आदि करणैर्निर्वर्त्यमाना दृश्यन्ते । | अचेतन पदार्थोंका एक ही उद्देश्यकी तच्चैकार्थवृत्तित्वेन संहननं नान्त- | सिद्धिके लिये परस्पर संहत ( अनु- | कूल ) होना किसी असंहत ( किसी- रेण चेतनमसंहतं संभवति । | से भी न मिले हुए ) चेतनके बिना | नहीं हो सकता; क्योंकि और कहीं अन्यत्रादर्शनात् । | ऐसा देखा नहीं जाता । तदाह-तद्यदि एष आकाशे | इसी बातको श्रुति कहती है- परमे व्योम्नि गुहायां निहित | यदि आकाश-परमाकाश अर्थात् आनन्दो न स्यान्न भवेत्को ह्येव | बुद्धिरूप गुहामें छिपा हुआ यह | आनन्द न होता तो लोकमें कौन लोकेऽन्यादपानचेष्टां कुर्यादि- | अपान-क्रिया करता और कौन त्यर्थः । कः प्राण्यात्प्राणनं वा | प्राणन कर सकता; इसलिये वह कुर्यात्तस्मादस्ति तद्ब्रह्म । यदर्थाः | ब्रह्म है ही, जिसके लिये कि शरीर
अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७
कार्यकरणप्राणनादिचेष्टास्तत्कृत | और इन्द्रियकी प्राणन आदि चेष्टाएँ एव चानन्दो लोकस्य । | हो रही हैं; और उसीका किया हुआ | लोकका आनन्द भी है । कुतः ? एष ह्येव पर आत्मा | ऐसा क्यों है ? क्योंकि यह आनन्दयात्यानन्दयति सुखयति | परमात्मा ही लोकको उसके धर्मा- लोकं धर्मानुरूपम् । स एवात्मा- | नुसार आनन्दित-सुखी करता है । नन्दरूपोऽविद्यया परिच्छिन्नो | तात्पर्य यह है कि वह आनन्दरूप विभाव्यते प्राणिभिरित्यर्थः । | आत्मा ही प्राणियोंद्वारा अविद्यासे भयाभयहेतुत्वाद्विद्वदविदुषोरस्ति | परिच्छिन्न भावना किया जाता है । तद्ब्रह्म । सद्द्वस्त्वाश्रयेण ह्यभयं | अविद्वान्के भय और विद्वान्के भवति । नासद्वस्त्वाश्रयेण | अभयका कारण होनेसे भी ब्रह्म है; भयनिवृत्तिरुपपद्यते । | क्योंकि किसी सत्य पदार्थके आश्रयसे | ही अभय हुआ करता है, असद्वस्तुके | आश्रयसे भयकी निवृत्ति होनी सम्भव | नहीं है । कथमभयहेतुत्वमित्युच्यते— | ब्रह्मका अभयहेतुत्व किस प्रकार [ब्रह्मणोऽभय-हेतुत्वम्] यदा ह्येव यस्मादेष साधक एतस्मिन्न- | है, सो बतलाया जाता है—क्योंकि | जिस समय भी यह साधक इस ह्मणि किंविशिष्टेऽदृश्ये दृश्यं नाम | ब्रह्ममें [ प्रतिष्ठा-स्थिति अर्थात् | आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ।] द्रष्टव्यं विकारो दर्शनार्थत्वाद्धि- | किन विशेषणोंसे युक्त ब्रह्ममें ? | अदृश्यमें—दृश्य देखे जानेवाले अर्थात् कारस्य । न दृश्यमदृश्यमविकार | विकारका नाम है; क्योंकि विकार | देखे जानेके ही लिये है; जो दृश्य न इत्यर्थः । एतस्मिन्नदृश्येऽविकारे- | हो उसे अदृश्य अर्थात् अविकार | कहते हैं । इस अदृश्य-अविकारी ऽविषयभूते अनात्म्येऽशरीरे । | अर्थात् अविषयभूत, अनात्म्य-अ- | शरीरमें । क्योंकि वह अदृश्य है यस्माददृश्यं तस्मादनात्म्यं | इसलिये अशरीर भी है और क्योंकि तै० उ० २३—२४—
१७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१७८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ यस्मादनात्म्यं तस्मादनिरुक्तम् । | अशरीर है इसलिये अनिरुक्त है । विशेषो हि निरुच्यते विशेषश्च | निरूपण विशेषका ही किया जाता विकारः । अविकारं च ब्रह्म, | है और विशेष विकार ही होता है; सर्वविकारहेतुत्वात्तस्मादनिरुक्तम्। | किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण विकारका कारण यत एवं तस्मादनिलयनं | होनेसे स्वयं अविकार ही है, इसलिये निलयनं नीड आश्रयो न | वह अनिरुक्त है । क्योंकि ऐसा है इसलिये वह अनिलयन है; निलयन निलयनमनिलयनमनाधारं तस्मि- | आश्रयको कहते हैं; जिसका निलयन न्नेतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्ते- | न हो वह अनिलयन यानी अनाश्रय ऽनिलयने सर्वकार्यधर्मविलक्षणे | है । उस इस अदृश्य, अनात्म्य, ब्रह्मणीति वाक्यार्थः । अभयमिति | अनिरुक्त और अनिलयन अर्थात् क्रियाविशेषणम् । अभयामिति वा | सम्पूर्ण कार्यधर्मोंसे विलक्षण ब्रह्ममें लिङ्गान्तरं परिणम्यते । प्रतिष्ठां | अभय प्रतिष्ठा-स्थिति यानी आत्म- स्थितिमात्मभावं विन्दते लभते । | भावको प्राप्त करता है । उस समय अथ तदा स तस्मिन्नानात्वस्य | उसमें भयके हेतुभूत नानात्वको न देखनेके कारण अभयको प्राप्त हो भयहेतोरविद्याकृतस्यादर्शनाद- | जाता है । मूलमें 'अभयम्' यह भयं गतो भवति । | क्रियाविशेषण है* अथवा इसे | 'अभयाम्' इस प्रकार अन्य (स्त्री) | लिङ्गके रूपमें परिणत कर लेना | चाहिये । स्वरूपप्रतिष्ठो ह्यसौ यदा | जिस समय यह अपने स्वरूपमें भवति तदा नान्यत्पश्यति ना- | स्थित हो जाता है उस समय यह
- अर्थात् अभयरूपसे प्रतिष्ठा-स्थिति यानी आत्मभाव प्राप्त कर लेता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
सर्वतो हि निर्भया ब्राह्मणा | कारण है । ब्राह्मण लोग ( ब्रह्मनिष्ठ
अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९ न्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति । | न तो और कुछ देखता है, न और | कुछ सुनता है और न और कुछ अन्यस्य ह्यन्यतो भयं भवति | जानता ही है । अन्यको ही अन्यसे | भय हुआ करता है, आत्मासे आत्मा- नात्मन एवात्मनो भयं युक्तम् । | को भय होना सम्भव नहीं है । तस्मादात्मैवात्मनोऽभयकारणम् । | अतः आत्मा ही आत्माके अभयका सर्वतो हि निर्भया ब्राह्मणा | कारण है । ब्राह्मण लोग ( ब्रह्मनिष्ठ | पुरुष ) भयके कारणोंके रहते हुए दृश्यन्ते सत्सु भयहेतुषु तच्चा- | भी सब ओरसे निर्भय दिखायी देते युक्तमसति भयत्राणे ब्रह्मणि । | हैं । किन्तु भयसे रक्षा करनेवाले | ब्रह्मके न होनेपर ऐसा होना तस्मात्तेषामभयदर्शनादस्ति तद्- | असम्भव था । अतः उन्हें निर्भय | देखनेसे यह सिद्ध होता है कि भयकारणं ब्रह्मेति । | अभयका हेतुभूत ब्रह्म है ही । कदासावभयं गतो भवति | यह साधक कब अभयको प्राप्त (भेददर्शनमेव भयहेतुः) साधको यदा ना- | होता है ? [ ऐसा प्रश्न होनेपर न्यत्पश्यत्यात्मनि | कहते हैं-] जिस समय यह अन्य चान्तरं भेदं न कुरुते तदाभयं | कुछ नहीं देखता और अपने आत्मामें गतो भवतीत्यभिप्रायः । यदा | किसी प्रकारका अन्तर-भेद नहीं पुनरविद्यावस्थायां हि यस्मा- | करता उस समय ही यह अभयको देषोऽविद्यावानविद्यया प्रत्युप- | प्राप्त होता है-यह इसका तात्पर्य स्थापितं वस्तु तैमिरिकद्वितीय- | है । किन्तु जिस समय अविद्यावस्था- चन्द्रवत्पश्यत्यात्मनि चैतस्मिन् | में यह अविद्याग्रस्त जीव तिमिररोगी- ब्रह्मणि उदपि, अरमल्पमप्यन्तरं | को दिखायी देनेवाले दूसरे चन्द्रमाके छिद्रं भेददर्शनं कुरुते। भेददर्शन- | समान अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये हुए | पदार्थोंको देखता है तथा इस आत्मा | यानी ब्रह्ममें थोड़ा-सा भी अन्तर- | छिद्र अर्थात् भेददर्शन करता है-
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१८० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
मेव हि भयकारणमल्पमपि भेदं | भेददर्शन ही भयका कारण है, अतः पश्यतीत्यर्थः । अथ तस्माद्भेद्दर्श- | तात्पर्य यह है कि यदि यह थोड़ा-सा नाद्धेतोरस्य भेददर्शिन आत्मनो | भी भेद देखता है—तो उस आत्माके भयं भवति । तस्मादात्मैवात्मनो | भेददर्शनरूप कारणसे उसे भय होता भयकारणमविदुषः । | है । अतः अज्ञानीके लिये आत्मा ही | आत्माके भयका कारण है । तदेतदाह । तद्ब्रह्म त्वेव भयं | यहाँ श्रुति इसी बातको कहती भेददर्शिनो विदुष ईश्वरोऽन्यो | है—भेददर्शी विद्वान्के लिये वह ब्रह्म | ही भयरूप है । मुझसे भिन्न ईश्वर मत्तोऽहमन्यः संसारी इत्येवं | और है तथा मैं संसारी जीव और | हूँ इस प्रकार उसमें थोड़ा-सा भी | अन्तर करनेवाले उसे एकरूपसे विदुषो भेददृष्टमीश्वराख्यं तदेव | न माननेवाले विद्वान् ( भेदज्ञानी ) | के लिये वह भेदरूपसे देखा गया ब्रह्माल्पमप्यन्तरं कुर्वतो भयं | ईश्वरसंज्ञक ब्रह्म ही भयरूप हो भवत्येकत्वेनामन्वानस्य । तस्मा- | जाता है । अतः जो पुरुष एक | अभिन्न आत्मतत्त्वको नहीं देखता द्विद्वानप्यविद्वानेवासौ योऽयमे- | वह विद्वान् होनेपर भी अविद्वान् कमभिन्नमात्मतत्त्वं न पश्यति । | ही है । उच्छेदहेतुदर्शनाद्धयुच्छेद्या- | अपनेको उच्छेद्य (नाशवान्) | माननेवालेको ही उच्छेदका कारण भिमतस्य भयं भवति । अनु- | देखनेसे भय हुआ करता है । | उच्छेदका कारण तो अनुच्छेद्य च्छेद्यो ह्युच्छेदहेतुस्तत्रासत्युच्छेद- | ( अविनाशी ) ही होता है । अतः | यदि कोई उच्छेदका कारण न होता हेतावुच्छेद्ये न तद्दर्शनकार्यं भयं | तो उच्छेद्य पदार्थोंमें उसके देखनेसे
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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८१ युक्तम् । सर्वं च जगद्भयवद् | होनेवाला भय सम्भव नहीं था । | किन्तु सारा ही संसार भययुक्त दृश्यते । तस्माज्जगतो भयदर्श- | देखा जाता है । अतः जगत्को | भय होता देखनेसे जाना जाता है नाद्गम्यते नूनं तदस्ति भयकारण- | कि उसके भयका कारण उच्छेदका मुच्छेदहेतुरनुच्छेद्यात्मकं यतो | हेतुभूत किन्तु स्वयं अनुच्छेद्यरूप | ब्रह्म है, जिससे कि जगत् भय जगद्विभेतीति । तदेतस्मिन्नप्यर्थ | मानता है । इसी अर्थमें यह श्लोक एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ | भी है ॥ १ ॥ इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥
अष्टम अनुवाक ब्रह्मानन्दके निरतिशयत्वकी मीमांसा भीषास्माद्वा॒तः पवते । भीषोदे॒ति सूर्यः॑ । भीषास्मा॒- द॒ग्निश्चेन्द्र॑श्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति । सैषानन्दस्य मीमाꣳसा भवति । युवा स्यात्साधुयु॒वाध्या॑यक आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठस्तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्दः । ते ये शतं मानुषा आनन्दाः ॥ १ ॥ स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामह- तस्य । ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां देवानामानन्दः ॥ २ ॥ श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमाजानजानां देवानामानन्दाः । स एकः कर्मदे॒वानां॑ देवानामानन्दः । ये कर्म॑णा दे॒वानपि॒यन्ति॑ । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं कर्मदे॒वानां॑ देवानामानन्दाः । स एको देवा- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८३ <br/> नामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः ॥ ३ ॥ श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमिन्द्रस्या- नन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाका- महतस्य । ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजा- पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ४ ॥ इसके भयसे वायु चलता है, इसीके भयसे सूर्य उदय होता है तथा इसीके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है । अब यह [ इस ब्रह्मके ] आनन्दकी मीमांसा है—साधु स्वभाववाला नवयुवक, वेद पढ़ा हुआ, अत्यन्त आशावान् [ कभी निराश न होनेवाला ] तथा अत्यन्त दृढ़ और बलिष्ठ हो एवं उसीकी यह धन-धान्यसे पूर्ण सम्पूर्ण पृथिवी भी हो । [ उसका जो आनन्द है ] वह एक मानुष आनन्द है; ऐसे जो सौ मानुष आनन्द हैं ॥ १ ॥ वही मनुष्य-गन्धर्वोंका एक आनन्द है तथा वह अकामहत ( जो कामनासे पीड़ित नहीं है उस ) श्रोत्रियको भी प्राप्त है । मनुष्य-गन्धर्वोंके जो सौ आनन्द हैं वही देवगन्धर्वका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है । देवगन्धर्वोंके जो सौ आनन्द हैं वही नित्यलोकमें रहनेवाले पितृगणका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है । चिरलोक- निवासी पितृगणके जो सौ आनन्द हैं वही आजानज देवताओंका एक आनन्द है ॥ २ ॥ और वह अकामहत श्रोत्रियोंको भी प्राप्त है । आजानज देवताओंके जो सौ आनन्द हैं वही कर्मदेव देवताओंका, जो कि [ अग्निहोत्रादि ] कर्म करके देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है और
१८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। कर्मदेव देवताओंके जो सौ आनन्द हैं वही देवताओंका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। देवताओंके जो सौ आनन्द हैं वही इन्द्रका एक आनन्द है ॥ ३ ॥ तथा वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। इन्द्रके जो सौ आनन्द हैं वही बृहस्पतिका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। बृहस्पतिके जो सौ आनन्द हैं वही प्रजापतिका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। प्रजापतिके जो सौ आनन्द हैं वही ब्रह्माका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है ॥ ४ ॥ भीषा भयेनास्माद्वातः पवते । इसकी भीति अर्थात् भयसे वायु चलता है, इसीकी भीतिसे सूर्य भीषोदेति सूर्यः ब्रह्मानुशासनम् उदित होता है और इसके भयसे भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च ही अग्नि, इन्द्र तथा पाँचवाँ¹ मृत्यु मृत्युर्धावति पञ्चम इति । वाता- दौड़ता है । वायु आदि देवगण परमपूजनीय और स्वयं समर्थ होने- दयो हि महार्हाः स्वयमीश्वराः पर भी अत्यन्त श्रमसाध्य चलने सन्तः पवनादिकार्येष्वनायासबहु- आदिके कार्यमें नियमानुसार प्रवृत्त हो रहे हैं । यह बात उनका कोई लेषु नियताः प्रवर्तन्ते । तद्युक्तं शासक होनेपर ही सम्भव है । प्रशास्तरि सति; यस्मान्नियमेन क्योंकि उनकी नियमसे प्रवृत्ति होती है इसलिये उनके भयका कारण और तेषां प्रवर्तनम् । तस्मादस्ति भय- उनपर शासन करनेवाला ब्रह्म है । कारणं तेषां प्रशास्तृ ब्रह्म । जिस प्रकार राजाके भयसे सेवक लोग अपने-अपने कामोंमें लगे रहते यतस्ते भृत्या इव राज्ञोऽस्मा- हैं उसी प्रकार वे इस ब्रह्मके भयसे द्ब्रह्मणो भयेन प्रवर्तन्ते । तच्च प्रवृत्त होते हैं, वह उनके भयका भयकारणमानन्दं ब्रह्म । कारण ब्रह्म आनन्दस्वरूप है । १. पूर्वोक्त वायु आदिके क्रमसे गणना किये जानेपर पाँचवाँ होनेके कारण मृत्युको पाँचवाँ कहा है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
तस्यास्य ब्रह्मण आनन्दस्यैषा | उस इस ब्रह्मके आनन्दकी यह ब्रह्मानन्दा-लोचनम् मीमांसा विचारणा | मीमांसा—विचारणा है । उस भवति । किमान- | आनन्दकी क्या बात विचारणीय है, न्दस्य मीमांस्यमित्युच्यते । | इसपर कहते हैं—‘क्या वह किमानन्दो विषयविषयिसंबन्ध- | आनन्द लौकिक सुखकी भाँति जनितो लौकिकानन्दवदाहोस्चित् | विषय और विषयको ग्रहण करने- स्वाभाविक इत्येवमेषानन्दस्य | वालेके सम्बन्धसे होनेवाला है अथवा स्वाभाविक ही है ?’ इस प्रकार यही मीमांसा । | उस आनन्दकी मीमांसा है । तत्र लौकिक आनन्दो बाह्या- | उसमें जो लौकिक आनन्द बाह्य ध्यात्मिकसाधनसंपत्तिनिमित्त | और शारीरिक साधन-सम्पत्तिके कारण उत्कृष्ट गिना जाता है उत्कृष्टः । स य एष निर्दिश्यते | ब्रह्मानन्दके ज्ञानके लिये यहाँ ब्रह्मानन्दानुगमार्थम् । अनेन हि | उसीका निर्देश किया जाता है । प्रसिद्धेनानन्देन व्यावृत्तविषय- | इस प्रसिद्ध आनन्दके द्वारा ही जिसकी बुद्धि विषयोंसे हटी हुई बुद्धिगम्य आनन्दोऽनुगन्तुं | है उस ब्रह्मवेत्ताको अनुभव होनेवाले शक्यते । | आनन्दका ज्ञान हो सकता है । लौकिकोऽप्यानन्दो ब्रह्मानन्द- | लौकिक आनन्द भी ब्रह्मानन्दका स्यैव मात्रा अविद्या तिरस्क्रिय- | ही अंश है । अविद्यासे विज्ञानके माणे विज्ञान उत्कृष्यमाणायां | तिरस्कृत हो जानेपर और अविद्याका चाविद्यायां ब्रह्मादिभिः कर्म- | उत्कर्ष होनेपर प्राक्तन कर्मवश विषयादि साधनोंके सम्बन्धसे ब्रह्मा वशाद्यथाविज्ञानं विषयादिसा- | आदि जीवोंद्वारा अपने-अपने विज्ञाना- धनसंबन्धवशाच्च विभाव्यमानश्च | नुसार भावना किया जानेके कारण लोकेऽनवस्थितो लौकिकः संप- | ही वह लोकमें अस्थिर और लौकिक
१८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[संस्कृत-मूल/भाष्य] द्यते । स एवाविद्याकामकर्मोप- कर्षेण मनुष्यगन्धर्वाद्युत्तरोत्तर- भूमिष्वकामहतविद्वच्छ्रोत्रियप्र- त्यक्षो विभाव्यते शतगुणोत्तरो- त्तरोत्कर्षेण यावद्धिरण्यगर्भस्य ब्रह्मण आनन्द इति । निरस्ते त्वविद्याकृते विषयविषयिविभागे विद्यया स्वाभाविकः परिपूर्ण एक आनन्दोऽद्वैतो भवतीत्येत- मर्थं विभावयिष्यन्नाह । युवा प्रथमवयाः साधुयुवेति साधुश्चासौ युवा चेति यूनो विशेषणम् । युवाप्यसाधुर्भवति साधुरप्ययुवातो विशेषणं युवा स्यात्साधुयुवेति । अध्यापको- ऽधीतवेदः । आशिष्ठ आशास्तृ- तमः । द्रढिष्ठो दृढतमः । बलिष्ठो बलवत्तमः । एवमाध्यात्मिक- साधनसंपन्नः । तस्येयं पृथिव्युर्वी
[हिन्दी-अनुवाद] आनन्द हो जाता है । कामनाओंसे पराभूत न होनेवाले विद्वान् श्रोत्रिय- को प्रत्यक्ष अनुभव होनेवाला वह ब्रह्मानन्द ही मनुष्य-गन्धर्व आदि आगे-आगेकी भूमियोंमें हिरण्यगर्भ- पर्यन्त अविद्या, कामना और कर्मका ह्रास होनेसे उत्तरोत्तर सौ-सौ गुने उत्कर्षसे आविर्भूत होता है । तथा विद्याद्वारा अविद्याजनित विषय-विषयी- विभागके निवृत्त हो जानेपर वह स्वाभाविक परिपूर्ण एक और अद्वैत आनन्द हो जाता है--इसी अर्थको समझानेके लिये श्रुति कहती है- जो युवा अर्थात् पूर्ववयस्क, साधुयुवा अर्थात् जो साधु भी हो और युवा भी—इस प्रकार साधुयुवा शब्द 'युवा' का विशेषण है; लोकमें युवा भी असाधु हो सकता है और साधु भी अयुवा हो सकता है, इसीलिये 'जो युवा हो—साधुयुवा हो' इस प्रकार विशेषणरूपसे कहा है। तथा अध्यापक—वेद पढ़ा हुआ, आशिष्ठ—अत्यन्त आशावान्, द्रढिष्ठ—अत्यन्त दृढ और बलिष्ठ— अति बलवान् हो; इस प्रकार जो इन आध्यात्मिक साधनोंसे सम्पन्न हो; और उसीकी, यह धनसे अर्थात्
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
सर्वा वित्तस्य वित्तेनोपभोगसाध- | उपभोगके साधनसे तथा लौकिक नेन दृष्टार्थेनादृष्टार्थेन च कर्म- | और पारलौकिक कर्मके साधनसे साधनेन संपन्ना पूर्णा राजा | सम्पन्न सम्पूर्ण पृथिवी हो—अर्थात् पृथिवीपतिरित्यर्थः । तस्य च य | जो राजा यानी पृथिवीपति हो; आनन्दः स एको मानुषो मनु- | उसका जो आनन्द है वह एक ष्याणां प्रकृष्ट एक आनन्दः । | मानुष आनन्द यानी मनुष्योंका एक प्रकृष्ट आनन्द है। ते ये शतं मानुषा आनन्दाः | ऐसे जो सौ मानुष आनन्द हैं स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। | वही मनुष्य-गन्धर्वोंका एक आनन्द मानुषानन्दाच्छतगुणेनोत्कृष्टो | है। मानुष आनन्दसे मनुष्य-गन्धर्वों- मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दो भवति । | का आनन्द सौ गुना उत्कृष्ट होता मनुष्याः सन्तः कर्मविद्याविशेषा- | है। जो पहले मनुष्य होकर फिर द्वन्धर्वत्वं प्राप्ता मनुष्यगन्धर्वाः । | कर्म और उपासनाकी विशेषतासे ते ह्यन्तर्धानादिशक्तिसंपन्नाः | गन्धर्वत्वको प्राप्त हुए हैं वे मनुष्य- सूक्ष्मकार्यकरणाः । तस्मात्प्रति- | गन्धर्व कहलाते हैं। वे अन्तर्धानादि- घाताल्पत्वं तेषां द्वन्द्वप्रतिघात- | की शक्तिसे सम्पन्न तथा सूक्ष्म शरीर शक्तिसाधनसंपत्तिश्च । ततो- | और इन्द्रियोंसे युक्त होते हैं, इसलिये ऽप्रतिहन्यमानस्य प्रतीकारवतो | उन्हें [शीतोष्णादि द्वन्द्वोंका] थोड़ा मनुष्यगन्धर्वस्य स्याच्चित्तप्रसादः। | प्रतिघात होता है तथा वे तत्प्रसादविशेषात्सुखविशेषाभि- | द्वन्द्वोंका सामना करनेवाले सामर्थ्य | और साधनसे सम्पन्न होते हैं। | अतः उस शीतोष्णादि द्वन्द्वसे | प्रतिहत न होनेवाले तथा [उसका | आघात होनेपर] उसका प्रतीकार | करनेमें समर्थ मनुष्यगन्धर्वको चित्त- | प्रसाद प्राप्त होता है और उस | प्रसादविशेषसे उसके सुखविशेषकी
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१८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ व्यक्तिः । एवं पूर्वस्याः पूर्वस्या | अभिव्यक्ति होती है । इस प्रकार भूमेरुत्तरस्यामुत्तरस्यां भूमौ | पूर्व-पूर्व भूमिकी अपेक्षा आगे-आगे- प्रसादविशेषतः शतगुणेनानन्दो- | की भूमिमें प्रसादकी विशेषता होने- त्कर्ष उपपद्यते । | से सौ-सौ गुने आनन्दका उत्कर्ष | होना सम्भव ही है । प्रथमं त्वकामहताग्रहणं मनु- | [ आगेके सब वाक्योंके साथ | रहनेवाला ] 'श्रोत्रियस्य चाकामह- ष्यविषयभोगकामानभिहतस्य | तस्य' यह वाक्य पहले [ मानुष | आनन्दके साथ ] इसलिये ग्रहण श्रोत्रियस्य मनुष्यानन्दाच्छत- | नहीं किया गया कि विषय-भोग | और कामनाओंसे व्याकुल न रहने- गुणेनानन्दोत्कर्षो मनुष्यगन्धर्वेण | वाले श्रोत्रियके आनन्दका उत्कर्ष | मानुष आनन्दकी अपेक्षा सौ गुना | अर्थात् मनुष्यगन्धर्वके आनन्दके तुल्यो वक्तव्य इत्येवमर्थम् । | तुल्य बतलाना है । श्रुतिमें 'साधु- | युवा' और 'अध्यायक' ये दो विशेषण साधुयुवाध्यायक इति श्रोत्रिय- | [ सार्वभौम राजाका ] श्रोत्रियत्व | और निष्पापत्व प्रदर्शित करनेके त्वावृजिनत्वे गृह्येते । ते ह्यवि- | लिये ग्रहण किये जाते हैं । इन्हें | आगे भी सबके साथ समानभावसे शिष्टे सर्वत्र । अकामहतत्वं तु | समझना चाहिये । विषयके उत्कर्ष | और अपकर्षसे सुखका भी उत्कर्ष | और अपकर्ष होता है [ किन्तु विषयोत्कर्षापकर्षतः सुखोत्कर्षा- | कामनारहित पुरुषके लिये सुखका | उत्कर्ष या अपकर्ष हुआ नहीं पकर्षाय विशेष्यते । अतोऽकाम- | करता ] इसीलिये अकामहतत्वकी | विशेषता है । और इसीसे | 'अकामहत' पद ग्रहण किया गया हतग्रहणम्, तद्विशेषतः शतगुण- | है । अतः उससे विशिष्ट पुरुषके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८९ सुखोत्कर्षोपलब्धेरकामहतत्वस्य | सुखका सौगुना उत्कर्ष देखा जाता | है; अतः अकामहतत्वको परमानन्द- परमानन्दप्राप्तिसाधनत्वविधाना- | की प्राप्तिका साधन बतलानेके लिये | 'अकामहत' विशेषण ग्रहण किया र्थम् । व्याख्यातमन्यत् । | है । और सबक़ी व्याख्या पहले की | जा चुकी है । देवगन्धर्वा जातित एव । | देवगन्धर्व—जो जन्मसे ही गन्धर्व चिरलोकलोकानामिति पितॄणां | हों 'चिरलोकलोकानाम्' ( चिरस्थायी विशेषणम् । चिरकालस्थायी | लोकमें रहनेवाले ) यह पितृगणका लोको येषां पितॄणां ते चिर- | विशेषण है । जिन पितृगणका लोकलोका इति । आजान इति | चिरस्थायी लोक है वे चिरलोक- देवलोकस्तस्मिन्नाजाने जाता आ- | लोक कहे जाते हैं । 'आजान' जानजा देवाः स्मार्तकर्मविशेषतो | देवलोकका नाम है, उस आजानमें देवस्थानेषु जाताः । | जो उत्पन्न हुए हैं वे देवगण | 'आजानज' हैं, जो कि स्मार्त्त कर्म- | विशेषके कारण देवस्थानमें उत्पन्न | हुए हैं । कर्मदेवा ये वैदिकेन कर्मणा- | जो केवल अग्निहोत्रादि वैदिक ग्निहोत्रादिना केवलेन देवान- | कर्मसे देवभावको प्राप्त हुए हैं वे पियन्ति । देवा इति त्रयस्त्रिंश- | 'कर्मदेव' कहलाते हैं । जो तैंतीस द्धविर्भुजः । इन्द्रस्तेषां स्वामी | देवगण यज्ञमें हविर्भाग लेनेवाले हैं तस्याचार्यो बृहस्पतिः । प्रजा- | वे ही यहाँ 'देव' शब्दसे कहे गये हैं । पतिर्विराट् । त्रैलोक्यशरीरो ब्रह्मा | उनका स्वामी इन्द्र है और इन्द्रका समष्टिव्यष्टिरूपः संसारमण्डल- | गुरु बृहस्पति है । 'प्रजापति' का व्यापी । | अर्थ विराट् है, तथा त्रैलोक्यशरीर- | धारी ब्रह्मा है जो समष्टि-व्यष्टिरूप | और समस्त संसारमण्डलमें व्याप्त है । यत्रैत आनन्दभेदा एकतां | जहाँ ये आनन्दके भेद एकताको | प्राप्त होते हैं [ अर्थात् एक गच्छन्ति धर्मश्च तन्निमित्तो ज्ञानं | ही गिने जाते हैं ] तथा जहाँ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ च तद्विषयमकामहतत्वं च नि- | उससे होनेवाले धर्म एवं ज्ञान तथा | तद्विषयक अकामहतत्व सबसे बढ़े रतिशयं यत्र स एष हिरण्यगर्भो | हुए हैं वह यह हिरण्यगर्भ ही ब्रह्मा ब्रह्मा, तस्यैष आनन्दः श्रोत्रि- | है। उसका यह आनन्द श्रोत्रिय, | निष्पाप और अकामहत पुरुषद्वारा येणावृजिनेनाकामहतेन च सर्वतः | सर्वत्र प्रत्यक्ष उपलब्ध किया जाता | है। इससे यह जाना जाता है कि प्रत्यक्षमुपलभ्यते । तस्मादेतानि | [ निष्पापत्व, अकामहतत्व और | श्रोत्रियत्व ] ये तीन उसके साधन त्रीणि साधनानीत्यवगम्यते । | हैं। इनमें श्रोत्रियत्व और निष्पापत्व तत्र श्रोत्रियत्वावृजिनत्वे | तो नियत ( न्यूनाधिक न होनेवाले ) | धर्म हैं किन्तु अकामहतत्वका नियते अकामहतत्वं तूत्कृष्यत | उत्तरोत्तर उत्कर्ष होता है; इसलिये | यह प्रकृष्ट-साधनरूपसे जाना इति प्रकृष्टसाधनतावगम्यते । | जाता है। तस्याकामहतत्वप्रकर्षतश्चोपल- | उस अकामहतत्वके प्रकर्षसे भ्यमानः श्रोत्रियप्रत्यक्षो ब्रह्मण | उपलब्ध होनेवाला तथा श्रोत्रियको | प्रत्यक्ष अनुभव होनेवाला वह ब्रह्माका आनन्दो यस्य परमानन्दस्य | आनन्द जिस परमानन्दकी मात्रा मात्रैकदेशः । “एतस्यैवानन्द- | अर्थात् केवल एकदेशमात्र है, जैसा स्यान्यानि भूतानि मात्रामुप- | कि “इस आनन्दके लेशसे ही अन्य | प्राणी जीवित रहते हैं” इस अन्य जीवन्ति” ( बृ० उ० ४ । ३। | श्रुतिसे सिद्ध होता है, वह यह ३२ ) इति श्रुत्यन्तरात् । स एष | हिरण्यगर्भका आनन्द, जिस- | की मात्राएँ ( लेशमात्र आनन्द ) आनन्दो यस्य मात्राः समुद्राम्भस | समुद्रके जलकी बूँदोंके समान इव विप्रुषः प्रविभक्ता यत्रैकतां | विभक्त हो पुनः उसमें एकत्वको
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१ गताः स एष परमानन्दः स्वा- | प्राप्त हुई हैं वही अद्वैतरूप होने- भाविकोऽद्वैतत्वादानन्दानन्दि- | से स्वाभाविक परमानन्द है । इसमें आनन्द और आनन्दीका अभेद नोश्चाविभागोऽत्र ॥ १-४ ॥ | है ॥ १-४ ॥ ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिका उपसंहार तदेतन्मीमांसाफलमुपसंह्रियते— | अब इस मीमांसाके फलका उपसंहार किया जाता है— स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः । स य एवंविद्वस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं मनोमयमात्मान- मुपसंक्रामति । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति । एत- मानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । तदप्येष श्लोको भवति ॥ ५ ॥ वह, जो कि इस पुरुष (पञ्चकोशात्मक देह) में है और जो यह आदित्यके अन्तर्गत है, एक है । वह, जो इस प्रकार जाननेवाला है, इस लोक (दृष्ट और अदृष्ट विषयसमूह) से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्माको प्राप्त होता है [अर्थात् विषयसमूहको अन्नमय कोशसे पृथक् नहीं देखता] । इसी प्रकार वह इस प्राणमय आत्माको प्राप्त होता है, इस मनोमय आत्माको प्राप्त होता है, इस विज्ञानमय आत्माको प्राप्त होता है एवं इस आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है । उसीके विषयमें यह श्लोक है ॥ ५ ॥ यो गुहायां निहितः परमे | जो आकाशसे लेकर अन्नमय कोशपर्यन्त कार्यकी रचना करके ब्रह्मात्मैक्योप- व्योम्न्याकाशादि- | उसमें अनुप्रविष्ट हुआ परमाकाशके संहारः कार्यं सृष्ट्वान्नमया- | भीतर बुद्धिरूप गुहामें स्थित है CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१९२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[मूल/भाष्य - वाम भाग] न्तं तदेवानुप्रविष्टः स य इति निर्दिश्यते । कोऽसौ ? अयं पुरुषे, यश्चासावादित्ये यः परमानन्दः श्रोत्रियप्रत्यक्षो निर्दिष्टो यस्यैक- देशं ब्रह्मादीनि भूतानि सुखा- र्हाण्युपजीवन्ति स यश्चासावा- दित्य इति निर्दिश्यते । स एको भिन्नप्रदेशस्थघटाकाशैकत्ववत् । ननु तन्निर्देशे स यश्चायं पुरुष इत्यविशेषतोऽध्यात्मं न युक्तो निर्देशः, यश्चायं दक्षिणे- ऽक्षन्निति तु युक्तः, प्रसिद्धत्वात् । न, पराधिकारात् । परो ह्यात्मात्राधिकृतोऽदृश्येऽनात्म्ये भीषास्माद्वातः पवते सैषानन्दस्य मीमांसेति । न ह्यकस्मादप्रकृतो
[अनुवाद - दक्षिण भाग] उसीका 'स यः' ( वह जो ) इन पदोंद्वारा निर्देश किया जाता है । वह कौन है ? जो इस पुरुषमें है और जो श्रोत्रियके लिये प्रत्यक्ष बतलाया हुआ परमानन्द आदित्यमें है; जिसके एक देशके आश्रयसे ही सुखके पात्रीभूत ब्रह्मा आदि जीव जीवन धारण करते हैं उसी आनन्द- को 'स यश्चासावादित्ये' इन पदों- द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है । भिन्न-प्रदेशस्थ घटाकाश और महाकाशके एकत्वके समान [ उन दोनों उपाधियोंमें स्थित ] वह आनन्द एक है । शङ्का—किन्तु उस आनन्दका निर्देश करनेमें 'वह जो इस पुरुषमें है' इस प्रकार सामान्यरूपसे अध्यात्म पुरुषका निर्देश करना उचित नहीं है, बल्कि 'जो इस दक्षिण नेत्रमें है' इस प्रकार कहना ही उचित है; क्योंकि ऐसा ही प्रसिद्ध है । समाधान--नहीं, क्योंकि यहाँपर आत्माका अधिकरण है । 'अदृश्ये- ऽनात्म्ये' 'भीषास्माद्वातः पवते' तथा 'सैषानन्दस्य मीमांसा' आदि वाक्यों- के अनुसार यहाँ परमात्माका ही प्रकरण है । अतः जिसका कोई प्रसङ्ग नहीं है उस [ दक्षिणनेत्रस्थ
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