तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७९ न्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति । | न तो और कुछ देखता है, न और | कुछ सुनता है और न और कुछ अन्यस्य ह्यन्यतो भयं भवति | जानता ही है । अन्यको ही अन्यसे | भय हुआ करता है, आत्मासे आत्मा- नात्मन एवात्मनो भयं युक्तम् । | को भय होना सम्भव नहीं है । तस्मादात्मैवात्मनोऽभयकारणम् । | अतः आत्मा ही आत्माके अभयका सर्वतो हि निर्भया ब्राह्मणा | कारण है । ब्राह्मण लोग ( ब्रह्मनिष्ठ | पुरुष ) भयके कारणोंके रहते हुए दृश्यन्ते सत्सु भयहेतुषु तच्चा- | भी सब ओरसे निर्भय दिखायी देते युक्तमसति भयत्राणे ब्रह्मणि । | हैं । किन्तु भयसे रक्षा करनेवाले | ब्रह्मके न होनेपर ऐसा होना तस्मात्तेषामभयदर्शनादस्ति तद्- | असम्भव था । अतः उन्हें निर्भय | देखनेसे यह सिद्ध होता है कि भयकारणं ब्रह्मेति । | अभयका हेतुभूत ब्रह्म है ही । कदासावभयं गतो भवति | यह साधक कब अभयको प्राप्त (भेददर्शनमेव भयहेतुः) साधको यदा ना- | होता है ? [ ऐसा प्रश्न होनेपर न्यत्पश्यत्यात्मनि | कहते हैं-] जिस समय यह अन्य चान्तरं भेदं न कुरुते तदाभयं | कुछ नहीं देखता और अपने आत्मामें गतो भवतीत्यभिप्रायः । यदा | किसी प्रकारका अन्तर-भेद नहीं पुनरविद्यावस्थायां हि यस्मा- | करता उस समय ही यह अभयको देषोऽविद्यावानविद्यया प्रत्युप- | प्राप्त होता है-यह इसका तात्पर्य स्थापितं वस्तु तैमिरिकद्वितीय- | है । किन्तु जिस समय अविद्यावस्था- चन्द्रवत्पश्यत्यात्मनि चैतस्मिन् | में यह अविद्याग्रस्त जीव तिमिररोगी- ब्रह्मणि उदपि, अरमल्पमप्यन्तरं | को दिखायी देनेवाले दूसरे चन्द्रमाके छिद्रं भेददर्शनं कुरुते। भेददर्शन- | समान अविद्याद्वारा प्रस्तुत किये हुए | पदार्थोंको देखता है तथा इस आत्मा | यानी ब्रह्ममें थोड़ा-सा भी अन्तर- | छिद्र अर्थात् भेददर्शन करता है-
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri