तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
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१८० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
मेव हि भयकारणमल्पमपि भेदं | भेददर्शन ही भयका कारण है, अतः पश्यतीत्यर्थः । अथ तस्माद्भेद्दर्श- | तात्पर्य यह है कि यदि यह थोड़ा-सा नाद्धेतोरस्य भेददर्शिन आत्मनो | भी भेद देखता है—तो उस आत्माके भयं भवति । तस्मादात्मैवात्मनो | भेददर्शनरूप कारणसे उसे भय होता भयकारणमविदुषः । | है । अतः अज्ञानीके लिये आत्मा ही | आत्माके भयका कारण है । तदेतदाह । तद्ब्रह्म त्वेव भयं | यहाँ श्रुति इसी बातको कहती भेददर्शिनो विदुष ईश्वरोऽन्यो | है—भेददर्शी विद्वान्के लिये वह ब्रह्म | ही भयरूप है । मुझसे भिन्न ईश्वर मत्तोऽहमन्यः संसारी इत्येवं | और है तथा मैं संसारी जीव और | हूँ इस प्रकार उसमें थोड़ा-सा भी | अन्तर करनेवाले उसे एकरूपसे विदुषो भेददृष्टमीश्वराख्यं तदेव | न माननेवाले विद्वान् ( भेदज्ञानी ) | के लिये वह भेदरूपसे देखा गया ब्रह्माल्पमप्यन्तरं कुर्वतो भयं | ईश्वरसंज्ञक ब्रह्म ही भयरूप हो भवत्येकत्वेनामन्वानस्य । तस्मा- | जाता है । अतः जो पुरुष एक | अभिन्न आत्मतत्त्वको नहीं देखता द्विद्वानप्यविद्वानेवासौ योऽयमे- | वह विद्वान् होनेपर भी अविद्वान् कमभिन्नमात्मतत्त्वं न पश्यति । | ही है । उच्छेदहेतुदर्शनाद्धयुच्छेद्या- | अपनेको उच्छेद्य (नाशवान्) | माननेवालेको ही उच्छेदका कारण भिमतस्य भयं भवति । अनु- | देखनेसे भय हुआ करता है । | उच्छेदका कारण तो अनुच्छेद्य च्छेद्यो ह्युच्छेदहेतुस्तत्रासत्युच्छेद- | ( अविनाशी ) ही होता है । अतः | यदि कोई उच्छेदका कारण न होता हेतावुच्छेद्ये न तद्दर्शनकार्यं भयं | तो उच्छेद्य पदार्थोंमें उसके देखनेसे
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri